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Monday, July 20, 2026

ईश्वर का स्वरूप अनुभूति में है दिखावे में नहीं ज्ञान और तर्क में भी नहीं

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रविवारीय – 19/07/2026

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ” यह अध्यात्म है अनुभूति है।अनुभूति से अनुभव है ईश्वर की वास्तविक अनुभूति वह गूढ़, आंतरिक अनुभव है जो मनुष्य की साधारण इंद्रियों और शब्दों से परे होती है। इसे शब्दों और सोच के माध्यम से व्यक्त करना कठिन इसलिए होता है क्योंकि यह अनुभूति ज्ञान या तर्क से नहीं, बल्कि एक गहरी भावना या आंतरिक चेतना से जुड़ी होती है। यह अनुभूति हमारे मन और हृदय की गहराइयों में होती है, जहां शब्द सीमित और अनुभव असीमित होता है।

अनुभूति के लिए आवश्यक है मन की शांति, एकाग्रता और अंदर की तरफ झांकने की क्षमता। जब मन सभी बाहरी विचारों, भावनाओं और मानसिक हलचल से मुक्त होता है, तभी वह उस गहन अनुभूति को महसूस कर पाता है जिसे हम ईश्वर की अनुभूति कहते हैं। यह ऐसी स्थिति होती है जहां न तो सोच की कोई बाधा रहती है और न ही शब्दों की जरूरत होती है।

इस प्रकार, ईश्वर की अनुभूति कोई बाहरी वस्तु या विचारधारा नहीं है बल्कि एक सहज, आंतरिक अनुभव है जो मन और भावनाओं की सीमा को पार करके होती है। इसे महसूस करना ‘मन की छठी इंद्रिय’ या ‘भावना की अनुभूति’ जैसा होता है, जो हृदय की गहराई में होती है और जिसका कोई सटीक वर्णन शब्दों में संभव नहीं होता।

साधारण उदाहरण दें तो जैसे प्रकाश को हम आंखों से देख पाते हैं लेकिन उसकी प्रकृति को पूरी तरह समझाना शब्दों में मुश्किल होता है, उसी तरह ईश्वर की अनुभूति भी मन और हृदय की गहन संवेदना है, जिसका अनुभव केवल अनुभव के द्वारा ही संभव है, न कि केवल शब्दों या सोच के माध्यम से।
यह कहा जाता है कि ईश्वर को “देखना” नहीं बल्कि “अनुभव करना” होता है, क्योंकि ईश्वर कोई बाहरी वस्तु नहीं जिसे नेत्रों से निहारा जा सके, बल्कि वह चेतना का वह सूक्ष्मतम स्तर है जो शब्दों, रूपों और सीमाओं से परे है। जिस प्रकार वायु को स्पर्श किया जा सकता है पर देखा नहीं जा सकता, उसी प्रकार परमात्मा को केवल भीतर की गहराई में उतरकर ही अनुभूत किया जा सकता है। यह अनुभव बाहरी आँखों का नहीं, अपितु अंतर्दृष्टि का विषय है — जब मन की चंचलता शांत होती है और अहंकार का पर्दा हटता है, तभी उस दिव्य उपस्थिति की झलक भीतर ही भीतर प्रकट होने लगती है।

यह उच्चतम चेतना की अवस्था अचानक प्राप्त नहीं होती, बल्कि निरंतर साधना, गहन ध्यान और आत्म-मंथन की सुदीर्घ यात्रा से फलित होती है। साधक जब श्वास और विचारों के परे जाकर अपने वास्तविक स्वरूप की खोज में तल्लीन होता है, तब धीरे-धीरे बाहरी संसार का शोर मौन में परिवर्तित होने लगता है, और उसी मौन में ईश्वर की उपस्थिति का बोध जागृत होता है। यह अनुभव न तो शब्दों में बाँधा जा सकता है, न ही किसी तर्क से सिद्ध किया जा सकता है — यह तो हृदय की गहराई में घटित होने वाला वह परम सत्य है, जिसे केवल वही जान पाता है जो सच्ची लगन से भीतर की ओर यात्रा करता है।

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