सवाल जंतर_मंतर: सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और जंतर-मंतर से हटाए जाने पर बवाल
डिजिटल डेस्क/नई दिल्ली-19 जुलाई 2026
लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में हैं। जंतर-मंतर पर चल रही उनकी 21 दिन की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के बाद पुलिस द्वारा उन्हें हटाए जाने की खबर से एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक बहस छिड़ गई है।
आंदोलन क्यों है?
प्रसिद्ध इंजीनियर सोनम वांगचुक 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन को समर्थन देते हुए अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं। CJP केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजे की मांग कर रही है।
20 जुलाई को संसद मार्च का ऐलान
स्वास्थ्य बिगड़ने के बीच वांगचुक ने सोशल मीडिया पर भावुक अपील की है। उन्होंने कहा, “मेरी भूख हड़ताल खत्म करने के लिए आपके संदेशों का शुक्रिया, लेकिन इससे उन 20 छात्रों को कोई मदद नहीं मिलेगी जिन्होंने आत्महत्या की… अगर आप सच में चाहते हैं कि मैं जिंदा रहूं, तो सोफे से उठिए और 20 जुलाई को मेरे साथ संसद तक शांतिपूर्ण मार्च करिए।”
CJP ने भी ऐलान किया है कि 20 जुलाई को मानसून सत्र के पहले दिन जंतर-मंतर से संसद तक शांतिपूर्ण मार्च निकाला जाएगा, जिसमें वांगचुक शामिल होंगे।
समर्थकों का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें जबरन हटाया और भारी बारिश में भी प्रदर्शन स्थल पर तिरपाल लाने से रोका गया। CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने इसका वीडियो भी शेयर किया था।
समर्थकों का आरोप बनाम सरकार का पक्ष
समर्थकों का आरोप: यह शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार (अनुच्छेद 19) का हनन है। पुलिस ने बिना मेडिकल इमरजेंसी के उन्हें हटाया।
प्रशासन का तर्क (सामान्य प्रोटोकॉल): दिल्ली पुलिस ऐसे मामलों में अक्सर BNSS की धारा 163 (पहले CrPC 144) के तहत “जीवन रक्षा के लिए एहतियाती हिरासत” का हवाला देती है। डॉक्टरों की राय में अगर अनशनकारी की जान को खतरा है, तो उसे अस्पताल शिफ्ट करना सरकार की जिम्मेदारी बन जाता है।
क्या कहता है कानून? क्या सरकार जबरदस्ती खाना खिला सकती है?
इस सवाल पर भारत में कानून की स्थिति बहुत स्पष्ट है:उपलब्ध जानकारी अनुसार
भूख हड़ताल अपराध नहीं है: सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि लोकतांत्रिक मांग के लिए भूख हड़ताल करना आत्महत्या का प्रयास नहीं है।
जबरन हटाना – हिरासत नहीं, मेडिकल प्रोटेक्शन: अगर मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि व्यक्ति की जान को खतरा है, तो पुलिस उसे हिरासत में लेकर अस्पताल ले जा सकती है। अदालतें इसे गिरफ्तार करना नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) की रक्षा मानती हैं।
जबरदस्ती खाना खिलाने पर मनाही है: भारतीय चिकित्सा परिषद और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, होश में बैठे किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ नली से खाना नहीं खिलाया जा सकता। यह यातना की श्रेणी में आता है। डॉक्टर तभी हस्तक्षेप कर सकते हैं जब व्यक्ति बेहोश हो जाए या मेडिकल बोर्ड उसे निर्णय लेने में असमर्थ घोषित कर दे।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका: लद्दाख आंदोलन के दौरान जब वांगचुक को जोधपुर जेल में NSA के तहत बंद किया गया था, तब भी सुप्रीम कोर्ट में उनकी मेडिकल जांच को लेकर सुनवाई हुई थी। तब केंद्र ने कहा था कि उनकी 24 बार मेडिकल जांच हुई है और वे स्वस्थ हैं।
अब अगली नजर 20 जुलाई के प्रस्तावित संसद मार्च से पहले सरकार और वांगचुक के बीच कोई बातचीत शुरू होती है या यह आंदोलन और तेज होता है पर है।
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