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Tuesday, October 27, 2026
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ससुर की हत्या के मामले में बहू और प्रेमी को उम्रकैद, करंट लगाकर ली थी जान

बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में ससुर की हत्या के मामले में अदालत ने बहू और उसके प्रेमी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दोनों पर बिजली का करंट लगाकर हत्या करने और वारदात को छिपाने के लिए लोगों को गुमराह करने का आरोप था। यह मामला डौंडीलोहारा थाना क्षेत्र के खड़ेनाडी गांव का है, जहां जुलाई 2025 में मनोहर निर्मलकर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी।

अंतिम संस्कार से पहले ग्रामीणों को हुआ संदेह

घटना 16 जुलाई 2025 की है। मनोहर निर्मलकर की मौत के बाद परिजन शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले गए थे। इसी दौरान उनके चेहरे और माथे पर चोट के निशान देखकर ग्रामीणों को संदेह हुआ। लोगों ने मामले की जानकारी पुलिस को दी, जिसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की।

पोस्टमार्टम में हत्या की पुष्टि

पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया। रिपोर्ट और जांच में मौत सामान्य नहीं, बल्कि हत्या का मामला सामने आया। इसके बाद पुलिस ने संदेह के आधार पर मृतक की बहू गीता बाई निर्मलकर (30) और उसके प्रेमी लेखराम निषाद (25) को गिरफ्तार किया। लेखराम हारमोनियम सिखाने का काम करता था और बड़गांव का निवासी बताया गया है।

अवैध संबंध का विरोध करने पर हत्या की साजिश

जांच के मुताबिक, लेखराम हारमोनियम सिखाने के लिए गीता के घर आता था। इसी दौरान दोनों के बीच संबंध बन गए। पुलिस के अनुसार, मनोहर को इस रिश्ते की जानकारी हो गई थी और उन्होंने इसका विरोध किया था। आरोप है कि इसी बात को लेकर गीता और लेखराम ने मनोहर की हत्या की योजना बनाई।

अभियोजन के मामले के अनुसार, 16 जुलाई 2025 की रात जब मनोहर सो रहे थे, तब दोनों ने बिस्तर पर बिजली का करंट लगाकर उनकी जान ले ली।

हत्या को हादसा बताने की कोशिश

जांच में यह भी सामने आया कि वारदात के बाद आरोपियों ने मौत की असली वजह छिपाने का प्रयास किया। मृतक के चेहरे पर आई चोटों को साइकिल से गिरने के कारण लगी चोट बताया गया। चोट के निशान पर हल्दी, गुलाल और तेल लगाए जाने की बात भी सामने आई।

इसके बाद शव के अंतिम संस्कार की तैयारी की गई, लेकिन ग्रामीणों ने चोट के निशान देखकर सवाल उठाए और पुलिस को सूचना दे दी। इसी संदेह के चलते मामले की जांच आगे बढ़ी और हत्या का खुलासा हुआ।

अदालत ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा

मामले की सुनवाई के बाद बालोद की एडीजे अदालत ने बहू गीता बाई निर्मलकर और उसके प्रेमी लेखराम निषाद को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह फैसला ससुर की हत्या से जुड़े मामले में आया है।

घोटिया गांव में कपड़ा दुकान में भीषण आग, 7 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान

खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के घोटिया गांव में कपड़े और फैंसी सामान की दुकान में अचानक आग लगने से भारी नुकसान हुआ है। आग ने दुकान में रखे कपड़ों और अन्य सामान को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे बड़ी मात्रा में स्टॉक जलकर नष्ट हो गया। शुरुआती आकलन के मुताबिक, नुकसान सात लाख रुपये से अधिक का है। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी के घायल होने या जान जाने की सूचना नहीं मिली है।

आग की खबर फैलते ही गांव के लोग घटनास्थल पर पहुंच गए। ग्रामीणों ने आग बुझाने का प्रयास शुरू किया। बाद में डायल 112 की टीम ने भी मौके पर पहुंचकर स्थिति नियंत्रित करने में मदद की। हालांकि, आग पर काबू पाने तक दुकान का काफी सामान जल चुका था।

झरना फैशन दुकान में अचानक भड़की आग

जानकारी के अनुसार, घोटिया गांव में झरना भोंडेकर की झरना फैशन कपड़ा एवं फैंसी दुकान संचालित होती है। दुकान में कपड़ों के साथ कई तरह के फैंसी सामान का स्टॉक रखा हुआ था। अचानक आग लगने से दुकान में अफरा-तफरी मच गई और आग तेजी से फैलने लगी।

आग की लपटें देखकर आसपास के लोग मदद के लिए पहुंचे। स्थानीय ग्रामीणों ने अपने स्तर पर आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन तब तक दुकान में रखा काफी सामान इसकी चपेट में आ चुका था।

ग्रामीणों और डायल 112 की टीम ने संभाली स्थिति

घटना की जानकारी मिलने के बाद ग्रामीणों ने मिलकर आग पर काबू पाने का प्रयास किया। डायल 112 की टीम भी मौके पर पहुंची और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर राहत कार्य में सहयोग किया। काफी मशक्कत के बाद आग को नियंत्रित किया जा सका।

इस दौरान किसी के हताहत होने की जानकारी सामने नहीं आई। हालांकि, दुकान में रखे कपड़ों और दूसरे सामान के जलने से संचालक परिवार को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।

दुकान संचालिका और उनके पति को भारी नुकसान

आगजनी से दुकान संचालिका झरना भोंडेकर और उनके पति जयकिशन भोंडेकर के कारोबार को बड़ा झटका लगा है। शुरुआती अनुमान के अनुसार, सात लाख रुपये से अधिक का सामान जलकर नष्ट हुआ है।

फिलहाल यह नुकसान का प्रारंभिक आकलन है। वास्तविक राशि का पता दुकान में मौजूद स्टॉक, खरीद संबंधी बिल और अन्य दस्तावेजों की जांच के बाद ही चल सकेगा। आग के कारण दुकान का कारोबार प्रभावित हुआ है और उसे फिर से शुरू करना संचालक परिवार के लिए चुनौती बन गया है।

आग लगने की वजह अभी साफ नहीं

घोटिया गांव में दुकान में आग किस कारण लगी, इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है। बिजली के शॉर्ट सर्किट समेत अन्य संभावित कारणों की जांच की जा सकती है, लेकिन फिलहाल किसी एक वजह को जिम्मेदार ठहराने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

खैरागढ़ पुलिस मामले की जांच कर रही है। जांच के दौरान आग शुरू होने की जगह, उसके फैलने की वजह और नुकसान से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की जाएगी।

छोटी दुकानों में अग्नि सुरक्षा पर फिर उठे सवाल

इस घटना के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित दुकानों की अग्नि सुरक्षा को लेकर भी ध्यान देने की जरूरत सामने आई है। कपड़े और अन्य ज्वलनशील सामान रखने वाले प्रतिष्ठानों में सुरक्षित बिजली वायरिंग, स्विच बोर्ड की नियमित जांच और अग्निशामक यंत्र जैसी व्यवस्थाएं नुकसान कम करने में सहायक हो सकती हैं।

हालांकि, घोटिया गांव की दुकान में आग किसी तकनीकी खराबी के कारण लगी या इसकी कोई दूसरी वजह थी, इसका पता जांच पूरी होने के बाद ही चलेगा। फिलहाल दुकान संचालक परिवार को हुए आर्थिक नुकसान का आकलन और आग लगने के कारणों की जांच महत्वपूर्ण बनी हुई है।

28 साल पुराने शिक्षाकर्मी भर्ती मामले में बड़ा एक्शन, 22 आरोपियों के खिलाफ 1000 पन्नों की चार्जशीट

कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के पंडरिया में करीब 28 साल पहले हुई शिक्षाकर्मी वर्ग-3 भर्ती का मामला एक बार फिर चर्चा में है। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने इस मामले में 22 आरोपियों के खिलाफ लगभग 1000 पन्नों का आरोपपत्र विशेष न्यायालय में पेश किया है। आरोपियों में छह तत्कालीन लोकसेवक और भर्ती में चयनित 16 अभ्यर्थी शामिल हैं।

यह मामला वर्ष 1998 में 320 शिक्षाकर्मी पदों पर हुई नियुक्तियों से जुड़ा है। भर्ती प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार और नियमों के उल्लंघन को लेकर 25 दिसंबर 1998 को शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके बाद वर्ष 2000 में प्राथमिकी दर्ज हुई और लंबे समय तक जांच चली। जांच एजेंसी ने 26 अक्टूबर 2026 को कवर्धा स्थित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायालय में आरोपपत्र प्रस्तुत किया।

320 पदों पर भर्ती, चयन प्रक्रिया पर उठे थे सवाल

पंडरिया जनपद पंचायत में वर्ष 1998 के दौरान शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के 320 पदों को भरने के लिए चयन प्रक्रिया आयोजित की गई थी। तत्कालीन जनपद पंचायत अध्यक्ष अर्जुन तिवारी ने भर्ती में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी।

शिकायत में मेरिट सूची तैयार करने, साक्षात्कार में दिए गए अंकों, अध्यापन अनुभव के आधार पर अतिरिक्त अंक देने और आरक्षण के नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए गए थे। इन्हीं बिंदुओं के आधार पर जांच शुरू हुई, जिसमें भर्ती से संबंधित दस्तावेजों और चयन प्रक्रिया की पड़ताल की गई।

करीब 26 साल की जांच के बाद दाखिल हुआ आरोपपत्र

जांच एजेंसियों ने भर्ती के अभिलेख, उम्मीदवारों की मेरिट सूची, अनुभव प्रमाणपत्र, साक्षात्कार प्रक्रिया और चयन समिति की भूमिका की जांच की। इस दौरान दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य जुटाए गए।

एजेंसी का दावा है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर छह तत्कालीन लोकसेवकों और 16 चयनित अभ्यर्थियों के खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार मिला। हालांकि, आरोपपत्र दाखिल होने का अर्थ आरोपियों का दोषी साबित होना नहीं है। मामले में आरोपों की पुष्टि और अंतिम निर्णय न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही होगा।

चयन समिति के सदस्यों के रिश्तेदारों को लाभ देने का आरोप

जांच के दौरान चयन समिति के तत्कालीन अध्यक्ष शंकरलाल चंद्रवंशी और सदस्यों की भूमिका भी जांच के दायरे में रही। एजेंसी के मुताबिक, समिति से जुड़े कुछ सदस्यों के रिश्तेदार भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए थे।

आरोप है कि कुछ सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों के साक्षात्कार में भाग लिया और उन्हें अंक भी दिए। जांच एजेंसी ने इसे हितों के टकराव और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना है।

इस संदर्भ में उग्रसेन चंद्रवंशी, नीरा चंद्रवंशी, विनीता वैष्णव, देवेश वैष्णव, स्वर्णा वैष्णव, कौशल्या वैष्णव और शैल तिवारी के नाम जांच में सामने आए। इन आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों की समीक्षा के बाद लिया जाएगा।

आरोपपत्र में शामिल छह तत्कालीन लोकसेवक

विशेष न्यायालय में प्रस्तुत आरोपपत्र में छह तत्कालीन लोकसेवकों के नाम शामिल हैं:

  1. एम.एल. भारती — तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी
  2. अंबिका प्रसाद शांडिल्य — तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी
  3. एन.एल. वस्त्रकार — तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी
  4. एन.आर. वर्मा — तत्कालीन उप संचालक, लोक शिक्षण
  5. शंकरलाल चंद्रवंशी — तत्कालीन शिक्षा स्थायी समिति अध्यक्ष
  6. हरिराम घृतलहरे — तत्कालीन समिति सदस्य

इनके अलावा भर्ती प्रक्रिया में चयनित 16 अभ्यर्थियों को भी आरोपपत्र में शामिल किया गया है।

जांच के दौरान तीन आरोपियों की मौत

लंबे समय से चल रहे इस प्रकरण की जांच के दौरान तीन आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है। इनमें तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी एम.एल. बढ़ई तथा शिक्षा स्थायी समिति के सदस्य बृज बिहारी वैष्णव और अंबिकादत्त शर्मा के नाम बताए गए हैं। आरोपपत्र में इनकी मृत्यु का उल्लेख भी किया गया है।

मेरिट सूची और अनुभव प्रमाणपत्रों में कथित गड़बड़ी

जांच एजेंसी के अनुसार, भर्ती के दौरान उम्मीदवारों की मेरिट सूची तैयार करने और साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों को बुलाने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किए जाने के आरोप हैं। चयन प्रक्रिया में मध्य प्रदेश पंचायत शिक्षाकर्मी भर्ती एवं सेवा शर्तें नियम, 1997 लागू थे।

आरोप है कि अध्यापन अनुभव के नाम पर अतिरिक्त अंक जोड़ने से उम्मीदवारों की योग्यता सूची प्रभावित हुई। जांच में कुछ अभ्यर्थियों के अनुभव प्रमाणपत्रों पर भी सवाल उठाए गए। एजेंसी के मुताबिक, ऐसे उम्मीदवारों को अनुभव का लाभ दिए जाने का आरोप है, जो संबंधित अवधि में नियमित रूप से महाविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे थे।

जांच एजेंसी ने आशंका जताई कि इन अनियमितताओं के चलते अन्य पात्र अभ्यर्थियों के चयन की संभावनाएं प्रभावित हुई होंगी।

महिला आरक्षण के तहत चयन प्रक्रिया भी जांच के घेरे में

भर्ती में सामान्य महिला वर्ग के 49 पदों के लिए 160 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने का विवरण भी जांच में सामने आया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें सामान्य वर्ग की 130, अन्य पिछड़ा वर्ग की 26, अनुसूचित जाति की तीन और अनुसूचित जनजाति की एक अभ्यर्थी शामिल थीं।

एजेंसी ने आरोप लगाया कि अंतिम चयन के दौरान क्षैतिज आरक्षण और विभिन्न वर्गों के समायोजन से जुड़े नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। इन बिंदुओं को भी भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच का हिस्सा बनाया गया।

दिव्यांग वर्ग के पदों पर भी उठे सवाल

अनुसूचित जाति के दिव्यांग वर्ग के चार पदों के लिए 15 आवेदकों में से केवल 10 को साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने का मामला भी जांच के दायरे में रहा। जांच एजेंसियों ने यह पता लगाने का प्रयास किया कि अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए चुनने में किन नियमों और मानकों का पालन किया गया था।

भर्ती से संबंधित दस्तावेजों और चयन सूची में सामने आई कथित विसंगतियों को आरोपपत्र में शामिल किया गया है।

भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी धाराएं

जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों की कथित भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) और 13(2) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 420, 467, 468 और 471 के तहत आरोपपत्र पेश किया गया है।

इन धाराओं में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और दस्तावेजों में कथित जालसाजी जैसे आरोप शामिल हैं। अब न्यायालय में आरोपपत्र और साक्ष्यों की जांच के साथ आगे की कानूनी प्रक्रिया चलेगी।

अब अदालत में तय होगी आरोपों की दिशा

पंडरिया की शिक्षाकर्मी भर्ती से जुड़ा यह मामला शिकायत के करीब 28 साल बाद महत्वपूर्ण न्यायिक चरण में पहुंचा है। जांच में मेरिट सूची, साक्षात्कार के अंक, अनुभव प्रमाणपत्र और आरक्षण व्यवस्था से संबंधित कई आरोप सामने आए हैं।

फिलहाल, ये आरोप जांच एजेंसी की ओर से लगाए गए हैं। आरोपियों की जिम्मेदारी और मामले के अंतिम निष्कर्ष का निर्धारण न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों तथा सुनवाई के आधार पर होगा।

रायपुर में 16 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों की APAAR ID अधूरी, निजी स्कूलों में सबसे अधिक पेंडेंसी

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विद्यार्थियों की APAAR ID बनाने का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। शिक्षा विभाग की ओर से स्कूलों को करीब 20 दिन पहले लंबित आईडी तीन दिन के भीतर तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद जिले में 16 हजार से अधिक विद्यार्थियों की आईडी बनना बाकी है। समीक्षा में निजी स्कूलों में सबसे ज्यादा मामले लंबित होने की जानकारी सामने आई है। अब शिक्षा विभाग विशेष शिविरों के जरिए इस काम को पूरा कराने की तैयारी कर रहा है।

6 अक्टूबर को जारी हुए थे निर्देश, फिर भी लक्ष्य अधूरा

रायपुर जिला शिक्षा कार्यालय ने 6 अक्टूबर 2026 को सभी संबंधित स्कूलों को लंबित APAAR ID बनाने का निर्देश दिया था। उस समय जिले में 54,180 विद्यार्थियों की आईडी तैयार होना बाकी थी। विभाग ने स्कूल प्रबंधन को तीन दिन के भीतर यह काम पूरा करने के लिए कहा था।

निर्देश जारी होने के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की आईडी बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन सभी मामलों का निपटारा नहीं हो सका। ताजा उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब भी 16 हजार से ज्यादा विद्यार्थी इस प्रक्रिया के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं।

निजी स्कूलों में सबसे ज्यादा मामले लंबित

शिक्षा विभाग की समीक्षा में पता चला है कि APAAR ID नहीं बन पाने वाले विद्यार्थियों में निजी स्कूलों की संख्या अधिक है। इसे देखते हुए विभाग ने संबंधित स्कूल प्रबंधन को प्रक्रिया में तेजी लाने और विद्यार्थियों के रिकॉर्ड का सत्यापन प्राथमिकता से करने को कहा है।

अधिकारियों के मुताबिक, APAAR ID विद्यार्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में व्यवस्थित रखने में मदद करती है। ऐसे में जरूरी जानकारी समय पर उपलब्ध कराना और रिकॉर्ड में मौजूद गलतियों को सुधारना महत्वपूर्ण है।

स्कूलों में शिविर लगाकर पूरी होगी प्रक्रिया

समग्र शिक्षा के अधिकारी अरुण शर्मा के अनुसार, लंबित आईडी तैयार करने के लिए स्कूल स्तर पर काम तेज किया जा रहा है। तय समय में लक्ष्य पूरा नहीं होने पर प्रशासन और शिक्षा विभाग की टीमें संबंधित स्कूलों में विशेष शिविर लगाएंगी।

शिविरों में विद्यार्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड, जरूरी जानकारियों और अभिभावकों की सहमति से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी कराई जाएंगी। इसका उद्देश्य रिकॉर्ड में गड़बड़ी और तकनीकी दिक्कतों को दूर कर आईडी बनाने की प्रक्रिया आसान करना है।

क्या है APAAR ID और विद्यार्थियों को इससे क्या लाभ मिलेगा?

APAAR का पूरा नाम Automated Permanent Academic Account Registry है। इसके तहत विद्यार्थियों को 12 अंकों की एक विशिष्ट शैक्षणिक पहचान दी जाती है। यह केंद्र सरकार की वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी पहल का हिस्सा है।

इस आईडी की मदद से विद्यार्थी की अंकसूची, प्रमाणपत्र, शैक्षणिक क्रेडिट और अन्य उपलब्धियों को डिजिटल रूप में व्यवस्थित रखने में सहायता मिलती है। इसे डिजिलॉकर से भी जोड़ा जा सकता है, जिससे संबंधित शैक्षणिक दस्तावेजों तक डिजिटल माध्यम से पहुंचना और उनका सत्यापन करना सुविधाजनक हो सकता है।

स्कूल बदलने और उच्च शिक्षा में भी मिलेगी मदद

APAAR ID का उद्देश्य विद्यार्थी के शैक्षणिक रिकॉर्ड को एक डिजिटल पहचान से जोड़ना है। स्कूल बदलने या आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे संस्थान में प्रवेश लेने के दौरान रिकॉर्ड प्राप्त करने और उसकी पुष्टि करने में इससे मदद मिल सकती है।

इसके अलावा, शैक्षणिक उपलब्धियों के सत्यापन और क्रेडिट ट्रांसफर जैसी प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने में भी यह उपयोगी हो सकती है।

आईडी नहीं बनने पर क्या पढ़ाई या परीक्षा पर पड़ेगा असर?

APAAR ID नहीं बनने का अर्थ यह नहीं है कि विद्यार्थी को स्वतः स्कूल की पढ़ाई, बोर्ड परीक्षा या हर तरह की छात्रवृत्ति से वंचित कर दिया जाएगा। हालांकि, कुछ डिजिटल शैक्षणिक प्रक्रियाओं में दस्तावेजों की अतिरिक्त जांच या सत्यापन की जरूरत पड़ सकती है।

अभिभावकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नाबालिग विद्यार्थियों की APAAR ID बनाने के लिए उनकी सहमति आवश्यक है। इसलिए स्कूलों को रिकॉर्ड का सत्यापन करने के साथ निर्धारित सहमति प्रक्रिया भी पूरी करनी होती है।

अभिभावक कैसे बनवा सकते हैं बच्चे की APAAR ID?

बच्चे की APAAR ID बनवाने के लिए अभिभावक संबंधित स्कूल से संपर्क कर सकते हैं। इसके लिए कुछ जरूरी कदम पूरे करने होते हैं:

  • विद्यार्थी के शैक्षणिक रिकॉर्ड की जांच और सत्यापन।
  • आधार और स्कूल रिकॉर्ड में नाम जैसी जानकारियों का मिलान।
  • नाबालिग विद्यार्थी के मामले में अभिभावक की सहमति।
  • रिकॉर्ड में कोई अंतर होने पर जरूरी सुधार।
  • निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद आईडी तैयार करना।

आईडी बनने के बाद उसे डिजिलॉकर के माध्यम से देखा जा सकता है। अभिभावकों को सलाह दी जा रही है कि वे स्कूल के संपर्क में रहकर जरूरी जानकारी समय पर उपलब्ध कराएं।

शिक्षा विभाग की नजर अब लंबित मामलों पर

रायपुर में 16 हजार से अधिक विद्यार्थियों की APAAR ID लंबित रहने के बाद विभाग ने स्कूल प्रबंधन को प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। विशेष शिविरों के जरिए शेष मामलों को पूरा करने की तैयारी की जा रही है।

अब यह देखना होगा कि शिविरों और स्कूल स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया से लंबित आईडी बनाने का लक्ष्य कितनी जल्दी पूरा हो पाता है।

तीन साल से भुगतान नहीं मिलने पर भड़के जल जीवन मिशन के ठेकेदार, रायपुर में कटोरा लेकर करेंगे प्रदर्शन

 छत्तीसगढ़ :  जल जीवन मिशन के तहत निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदारों का भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है। बकाया राशि नहीं मिलने से कई ठेकेदार आर्थिक दबाव में आ गए है। अपनी मांगों को लेकर 27 अक्टूबर को करीब दो हजार ठेकेदार रायपुर में अर्धनग्न होकर और हाथों में कटोरा लेकर विरोध प्रदर्शन करेंगे। ठेकेदारों का कहना है कि सरकार और संबंधित विभागों के सामने कई बार अपनी समस्या रखने के बाद भी उन्हें राहत नहीं मिली है।

5 हजार करोड़ रुपए का भुगतान तीन साल से लंबित

जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण इलाकों में घर-घर नल से स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लिए पानी की टंकियों, पाइपलाइन, नलकूप और सौर ऊर्जा आधारित जल योजनाओं से जुड़े काम कराए गए है।

ठेकेदारों के मुताबिक, इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी बचत लगाने के साथ बैंकों से कर्ज लिया और दूसरे स्रोतों से भी रकम जुटाई। इसके बावजूद करीब 5 हजार करोड़ रुपए का भुगतान तीन साल से लंबित है। लगातार देरी के कारण ठेकेदारों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है।

कर्ज की किस्तों और मजदूरी का भुगतान करना मुश्किल

ठेकेदारों का कहना है कि समय पर रकम नहीं मिलने से बैंक ऋण की मासिक किस्तें चुकाना कठिन हो गया है। निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों की मजदूरी और निर्माण सामग्री उपलब्ध कराने वाले सप्लायर्स की रकम भी बकाया है।

छत्तीसगढ़ कांट्रैक्टर्स एसोसिएशन के अनुसार, कई ठेकेदारों की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि उनके सामने बैंक डिफॉल्टर होने का खतरा पैदा हो गया है। इसी परेशानी को लेकर ठेकेदार अब सामूहिक प्रदर्शन के जरिए सरकार तक अपनी बात पहुंचाना चाहते है।

विभागों के बीच समन्वय की कमी का आरोप

एसोसिएशन के अध्यक्ष बीरेश शुक्ला ने भुगतान में देरी के पीछे केंद्र और राज्य सरकार की वित्तीय प्रक्रियाओं तथा पंचायतों और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के बीच तालमेल की कमी को जिम्मेदार बताया है।

उनके मुताबिक, ठेकेदार मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और अधिकारियों को कई बार ज्ञापन सौंप चुके है। इसके बावजूद भुगतान को लेकर कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। एसोसिएशन की मांग है कि लंबित राशि जल्द जारी की जाए, ताकि ठेकेदार अपने कर्ज और अन्य देनदारियां चुका सके।

अधूरे कामों से ग्रामीणों को भी परेशानी

भुगतान में देरी का असर जल जीवन मिशन के कामकाज पर भी पड़ने की बात कही जा रही है। ठेकेदारों के अनुसार, कई गांवों में पानी की टंकियां और पाइपलाइन तैयार होने के बावजूद जलापूर्ति शुरू नहीं हो पाई है।

उनका कहना है कि बकाया राशि जारी होने से रुके हुए निर्माण कार्यों को पूरा करने और जल योजनाओं को चालू करने में मदद मिलेगी। इससे ग्रामीणों को घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य हासिल करने में भी सहूलियत होगी।

CEC की कार्यप्रणाली पर याचिका: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने रखी दलीलें, SIR के फैसलों को बताया सर्वसम्मत

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 Election Commission SC Response:  मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया है। आयोग ने अपनी दलीलों में कहा कि याचिका एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए थे।

आयोग के मुताबिक, जवाबी हलफनामे को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में जारी SIR से जुड़े तीनों आदेश भी सामूहिक सहमति से पारित किए गए थे। आयोग ने कहा कि फाइल पर अधिकारियों या आयुक्तों की टिप्पणियों, सवालों और सुझावों को आयोग का आधिकारिक निर्णय नहीं माना जा सकता।

अधिकारों से बाहर जाकर आदेश देने पर कार्रवाई का प्रावधान

चुनाव आयोग ने बताया कि किसी फाइल को मंजूरी के लिए पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास भेजा जाता है। तत्काल मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी मंजूरी ली जाती है, जिसे बाद में संबंधित फाइल पर दर्ज किया जाता है।

आयोग ने कहा कि यदि कोई अधिकारी अपने निर्धारित अधिकारों से बाहर जाकर आदेश जारी करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। हलफनामे के अनुसार, संबंधित आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए एक अतिरिक्त सचिव ने जारी किया था। अगले दिन दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा। आयोग ने बताया कि 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद उस आदेश को लागू नहीं किया गया।

फॉर्म-6 में संशोधन नहीं, ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था बदलेगी

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। उसके मुताबिक, इस फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। SIR के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला घोषणा-पत्र इससे अलग दस्तावेज है।

हालांकि, आयोग ने माना कि ऑनलाइन आवेदन की मौजूदा प्रस्तुति को फॉर्म-6 में बदलाव के रूप में समझा जा सकता था। इसी वजह से 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था में बदलाव कर फॉर्म-6 और घोषणा-पत्र को अलग-अलग दिखाने का निर्णय लिया गया।

मैपिंग नहीं होने पर हर मतदाता को सुनवाई में आना जरूरी नहीं

आयोग ने कहा कि जिन मतदाताओं की मैपिंग नहीं हुई है, उन्हें अनिवार्य रूप से सुनवाई में उपस्थित होने की जरूरत नहीं है। बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे। सुनवाई केवल विशेष परिस्थितियों में होगी और संभव होने पर इसे ऑनलाइन कराया जाएगा।

हलफनामे में यह भी कहा गया कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम सूची में न जोड़ा जा सकता है और न हटाया जा सकता है। नियमों के पालन की जांच के लिए IIT और IISc के विशेषज्ञों की एक समिति गठित किए जाने की जानकारी भी दी गई।

गोवा में 97 मतदाताओं को लेकर आयोग की सफाई

गोवा में मतदाता सूची से कथित तौर पर छूटे 97 लोगों के मामले में चुनाव आयोग ने बताया कि इनमें से 88 लोग पहले ही मतदाता सूची में शामिल थे। छह लोग विदेश में थे, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ अपीलों पर आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दायर की थीं। आयोग के मुताबिक, ये मामले उसके संज्ञान में नहीं लाए गए थे।

CEC को पद से रोकने की याचिका पर भी आयोग की दलील

चुनाव आयोग ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से जुड़े कार्य करने से रोकने की मांग वाली याचिका विचारणीय नहीं है। आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी प्रक्रिया अपनानी होती है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने कोई आंतरिक नोट या फाइल मीडिया को जारी नहीं की और न ही ऐसा करने की अनुमति दी। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही ऐसे मामलों को खारिज कर चुका है।

दशहरा अवकाश के कारण आयोग ने फिलहाल संक्षिप्त जवाब दाखिल किया है। अब उसने सुप्रीम कोर्ट से मामले के प्रत्येक बिंदु पर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी है।

रायपुर और दुर्ग में ED की कार्रवाई, सुबह 4 बजे पंडरी और रविनगर में पहुंची टीम

रायपुर :  छत्तीसगढ़ में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई की खबर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक, ईडी की टीम ने रायपुर और दुर्ग में छापेमारी की है। रायपुर में सुबह करीब 4 बजे पंडरी और रविनगर इलाके में अधिकारी पहुंचे। रविनगर स्थित डागा निवास पर भी टीम के पहुंचने की जानकारी मिली है।

दो गाड़ियों में पहुंचे अधिकारी

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कार्रवाई में दो गाड़ियों से पहुंचे छह से अधिक अधिकारी शामिल है। बताया जा रहा है कि जांच का संबंध जमीन के लेन-देन और ज्वेलरी कारोबार से हो सकता है। डागा परिवार के ज्वेलरी व्यवसाय से जुड़े होने की जानकारी भी सामने आई है।

सूत्रों के अनुसार, ईडी की टीम जमीन के सौदों से जुड़े दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल कर रही है। हालांकि, जांच के दायरे और कार्रवाई के पीछे की वजह को लेकर अभी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

कार्रवाई के कारण और बरामदगी की जानकारी का इंतजार

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि रायपुर और दुर्ग में की गई कार्रवाई किस मामले से संबंधित है। तलाशी के दौरान अधिकारियों को कोई दस्तावेज, नकदी या अन्य सामग्री मिली है या नहीं, इसकी भी पुष्टि नहीं हुई है। मामले में ईडी की आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही कार्रवाई की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

महू SDM राकेश परमार पर हाईकोर्ट ने लगाया 50 हजार रुपए का जुर्माना

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मध्य प्रदेश : हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महू के एसडीएम राकेश परमार पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। बारडिया गांव में जमीन के कब्जे से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह कदम उठाया। एसडीएम की ओर से तय समय सीमा में शपथपत्र के जरिए जवाब पेश नहीं किए जाने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। साथ ही जुर्माने की राशि सात दिन के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कर उसकी रसीद अदालत में पेश करने का आदेश दिया।

एक हेक्टेयर जमीन के कब्जे को लेकर विवाद

मामला महू तहसील के बारडिया गांव में स्थित करीब एक हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। सर्वे नंबर 3/4 की इस जमीन पर कब्जे को लेकर विवाद चल रहा है। लीलाबाई, विद्या, राधा, महेश सहित अन्य लोगों ने इस मामले में हाईकोर्ट का रुख किया था।

विवाद की शुरुआत 23 अप्रैल 2026 को तहसीलदार के आदेश से हुई। इसमें जमीन से कब्जा हटाकर संदीप सिंह सरजू को कब्जा सौंपने के निर्देश दिए गए थे। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने महू एसडीएम के समक्ष अपील दायर की।

अपील पर सुनवाई के दौरान एसडीएम राकेश परमार ने जमीन से कब्जा हटाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी, जो 28 मई तक प्रभावी रही। इसके बाद 9 जून को उन्होंने रोक हटाने का आदेश जारी कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि रोक हटाने के लिए किसी पक्ष ने आवेदन नहीं दिया था। इसके बावजूद आदेश जारी कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने एसडीएम से मांगा था जवाब

मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर न्यायमूर्ति संदीप भट्ट की अदालत ने 24 जून को एसडीएम के 9 जून के आदेश पर रोक लगा दी। साथ ही एसडीएम को शपथपत्र के जरिए यह बताने का निर्देश दिया कि पहले लगाई गई रोक किस कानूनी आधार पर हटाई गई थी।

अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए 25 सितंबर तक का समय दिया था, लेकिन निर्धारित अवधि में जवाब पेश नहीं हुआ। इसके बाद एसडीएम की ओर से अतिरिक्त समय मांगा गया। 9 अक्टूबर को फिर सुनवाई हुई, लेकिन उस दिन भी जवाब दाखिल नहीं किया गया। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए एसडीएम को 16 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया।

16 अक्टूबर को अदालत में पेश हुए एसडीएम

निर्धारित तारीख पर राकेश परमार अदालत में पेश हुए। उन्होंने बताया कि जमीन के मामले में रोक 28 मई तक ही प्रभावी थी। हाईकोर्ट के आदेश की जानकारी मिलने के बाद 27 जुलाई को आगे की कार्रवाई रोक दी गई थी।

9 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं होने के बारे में उन्होंने बताया कि वे इंदौर पहुंचे थे, लेकिन हाईकोर्ट पहुंचने तक सुनवाई समाप्त हो चुकी थी।

समय पर जवाब दाखिल नहीं किए जाने को अदालत ने गंभीरता से लिया और एसडीएम पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने सात दिन के भीतर राशि जमा कर रसीद पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही आदेश का पालन नहीं होने की स्थिति में अगली सुनवाई पर आगे की कार्रवाई पर विचार करने की बात कही।

आज साय कैबिनेट की अहम बैठक, धान खरीदी और कर्मचारियों की मांगों पर टिकी निगाहें

 रायपुर। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में मंगलवार, 27 अक्टूबर को मंत्रिपरिषद की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित होने जा रही है। नवा रायपुर स्थित महानदी भवन मंत्रालय में सुबह 11:30 बजे होने वाली इस बैठक को लेकर प्रदेशभर में चर्चा है। आगामी धान खरीदी सीजन, राज्योत्सव की तैयारियों और सरकारी कर्मचारियों की लंबित मांगों के बीच कैबिनेट के संभावित फैसलों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

हालांकि, बैठक का आधिकारिक एजेंडा फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में किन प्रस्तावों पर मुहर लगेगी और किन मुद्दों पर चर्चा होगी, इसकी स्पष्ट जानकारी बैठक के बाद ही सामने आएगी।

धान खरीदी सीजन को लेकर हो सकता है विचार-विमर्श

छत्तीसगढ़ में धान खरीदी किसानों और कृषि व्यवस्था से जुड़ा प्रमुख विषय है। खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए तैयारियों के बीच किसान सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं।

संभावना है कि कैबिनेट में धान खरीदी केंद्रों की व्यवस्था, धान के उपार्जन, परिवहन और भंडारण से जुड़े विषयों पर चर्चा हो सकती है। हालांकि, इन मुद्दों पर किसी विशेष प्रस्ताव को बैठक में रखे जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

धान खरीदी शुरू होने से पहले सरकार की ओर से लिए जाने वाले निर्णय किसानों की सुविधाओं और उपार्जन व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। इसी वजह से इस बैठक को कृषि क्षेत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

एक नवंबर से राज्योत्सव, तैयारियों पर भी नजर

छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस के अवसर पर एक नवंबर से राज्योत्सव 2026 का आयोजन होना है। ऐसे में आयोजन से पहले होने वाली कैबिनेट बैठक में तैयारियों और विभागीय समन्वय से जुड़े विषयों पर चर्चा की संभावना जताई जा रही है।

राज्योत्सव के दौरान होने वाले कार्यक्रमों, व्यवस्थाओं और विभिन्न विभागों की जिम्मेदारियों को लेकर सरकार के संभावित फैसलों पर भी नजर रहेगी। हालांकि, इस संबंध में बैठक के आधिकारिक एजेंडे या किसी निश्चित प्रस्ताव की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

सरकारी कर्मचारियों की मांगों पर क्या होगा फैसला?

कैबिनेट बैठक को लेकर सरकारी कर्मचारी संगठनों में भी उत्सुकता बनी हुई है। कर्मचारियों की विभिन्न मांगों और लंबित विषयों पर सरकार के रुख को लेकर चर्चा हो रही है।

फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि कर्मचारी हितों से जुड़ा कोई विशेष प्रस्ताव मंत्रिपरिषद के सामने रखा जाएगा या नहीं। ऐसे में किसी नई घोषणा या मांग पर निर्णय होने की बात को अभी केवल संभावना के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

बैठक के बाद स्पष्ट होगी फैसलों की स्थिति

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में विभिन्न विभागों के प्रशासनिक और नीतिगत प्रस्तावों पर विचार किया जा सकता है। धान खरीदी, राज्योत्सव और कर्मचारियों से जुड़े विषयों के अलावा अन्य मुद्दे भी चर्चा में आ सकते हैं।

सुबह 11:30 बजे प्रस्तावित बैठक के बाद सरकार के आधिकारिक फैसलों की जानकारी सामने आने की उम्मीद है। फिलहाल, प्रदेश के किसानों, सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों को कैबिनेट के निर्णयों का इंतजार है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सरकार ने नियुक्त किए 23 नए पैनल लॉयर, दो साल तक संभालेंगे पैरवी की जिम्मेदारी

 रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने न्यायालयीन मामलों में शासन का पक्ष रखने के लिए महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम उठाया है। विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पैरवी करने के लिए 23 अधिवक्ताओं को पैनल लॉयर नियुक्त किया है। मंत्रालय महानदी भवन, नवा रायपुर से जारी आदेश के अनुसार, सभी अधिवक्ताओं का कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित किया गया है। इन नियुक्तियों के बाद राज्य शासन से जुड़े विभिन्न मामलों में न्यायालय के समक्ष सरकारी पक्ष रखने के लिए अतिरिक्त विधिक सहयोग मिलेगा।

कार्यभार संभालने की तारीख से शुरू होगा कार्यकाल

विधि एवं विधायी कार्य विभाग के आदेश के अनुसार, सभी 23 अधिवक्ताओं की नियुक्ति दो साल के लिए की गई है। इस अवधि की गणना नियुक्ति आदेश जारी होने की तारीख से नहीं, बल्कि संबंधित अधिवक्ता के कार्यभार ग्रहण करने के दिन से होगी।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पैनल लॉयर्स को निर्धारित नियमों के अनुसार फीस दी जाएगी। उनके कामकाज, जिम्मेदारियों और दायित्वों का निर्धारण छत्तीसगढ़ विधि विभाग मैनुअल के संबंधित प्रावधानों के तहत किया जाएगा।

हाईकोर्ट में सरकारी मामलों की करेंगे पैरवी

नवनियुक्त पैनल लॉयर बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राज्य शासन से जुड़े न्यायिक मामलों में सरकार का पक्ष प्रस्तुत करेंगे। विभिन्न सरकारी विभागों से संबंधित प्रकरणों में उन्हें पैरवी की जिम्मेदारी सौंपी जा सकेगी।

इसमें न्यायालय के समक्ष शासन का विधिक पक्ष रखना, जरूरी दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत करना तथा संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित करना शामिल हो सकता है। हालांकि, प्रत्येक अधिवक्ता को कौन से विभाग या विशिष्ट मामले सौंपे जाएंगे, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध आदेश के विवरण में नहीं दी गई है।

नियुक्ति, फीस और जिम्मेदारियों के लिए तय नियम

विधि विभाग ने पैनल अधिवक्ताओं के कार्यकाल और भुगतान व्यवस्था के साथ उनकी कार्यप्रणाली को भी निर्धारित नियमों से जोड़ा है। इससे उनके दायित्वों का निर्वहन विभागीय प्रावधानों के अनुरूप होगा।

हाईकोर्ट में राज्य सरकार से जुड़े अनेक मामले अलग-अलग विभागों की ओर से प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे मामलों में प्रभावी पैरवी के लिए अधिवक्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। 23 नए पैनल लॉयर नियुक्त किए जाने से सरकार को न्यायालयीन मामलों में अपना पक्ष रखने के लिए अतिरिक्त विधिक सहायता मिल सकेगी।

कौन हैं नियुक्त किए गए 23 अधिवक्ता?

विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने 23 अधिवक्ताओं की नियुक्ति का आदेश जारी किया है। हालांकि, उपलब्ध कराए गए विवरण में सभी अधिवक्ताओं के नाम शामिल नहीं हैं। इसलिए पूरी सूची की पुष्टि के लिए विभाग का मूल आदेश देखना जरूरी है।

फिलहाल, आदेश के अनुसार सभी नियुक्तियां दो वर्ष की अवधि के लिए की गई हैं और कार्यभार ग्रहण करने के बाद अधिवक्ता निर्धारित नियमों के तहत अपनी जिम्मेदारियां संभालेंगे।