राजनीतिक चर्चा लेख – 29 अक्टूबर 2026
MLC चुनाव बैलेट पेपर से ही होते हैं।”सोशल मीडिया पर ‘कांग्रेस का खाता नहीं खुला’ का दावा किया जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस ने नागपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट जीतकर अपना खाता खोला है।”
भारतीय राजनीति के बदलते परिदृश्य में जब भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मुकाबले का आकलन होता है, तो अक्सर महाभारत के ‘कौरव सेना बनाम एकल योद्धा’ का द्वंद्व मानस पटल पर कौंध जाता है।
आज की राजनीति में यह चर्चा बेहद प्रासंगिक हो गई है कि क्या कांग्रेस का अस्तित्व मुख्य रूप से राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमट गया है, जबकि उनके सामने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का एक विशाल कुनबा है, जिसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का अनुशासित और अजेय माना जाने वाला सांगठनिक तंत्र खड़ा है।
इस मुकाबले की जमीनी हकीकत को समझने के लिए हाल ही में चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक) में हुए विधान परिषद (MLC) के द्विवार्षिक चुनाव और पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं।
MLC चुनाव: ‘सुपर शून्य’ के नैरेटिव का सच और भाजपा के गढ़ों में सेंध
हालिया MLC चुनावों के नतीजों के बाद मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह नैरेटिव बनता दिखा कि कांग्रेस पूरी तरह सिमट गई है। लेकिन निष्पक्ष चुनावी विश्लेषण दिखाता है कि सिक्के का दूसरा पहलू भाजपा के लिए भी गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
कांग्रेस का नफा-नुकसान: यह सच है कि इन राज्यों की अधिकांश सीटों पर कांग्रेस उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी और उसने कर्नाटक व बिहार में अपनी कुछ पारंपरिक शिक्षक सीटें गंवा दीं।
लेकिन यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि कांग्रेस का खाता नहीं खुला। सच यह है कि उसका आंकड़ा 2 से 1 हुआ।
भाजपा के मजबूत गढ़ों का ढहना: RSS के विशाल कैडर और मजबूत सांगठनिक कुनबे के बावजूद भाजपा को इन चुनावों में कुछ ऐसे झटके लगे, जिसने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। भाजपा अपने सबसे मजबूत और पारंपरिक गढ़ों को बचाने में नाकाम रही।
प्रतिष्ठा की सीटों पर हार: इसमें सबसे चौंकाने वाली हार RSS के मुख्यालय और नितिन गडकरी व देवेंद्र फडणवीस के गृह क्षेत्र नागपुर स्नातक सीट पर हुई, जहाँ कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके अलावा, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी (काशी) शिक्षक सीट और पिछले तीन दशक से भाजपा का गढ़ रही पटना शिक्षक सीट पर भी भाजपा को शिकस्त झेलनी पड़ी।
यह साफ दिखाता है कि जहाँ कांग्रेस के लिए हर स्तर पर अभी लंबी सांगठनिक लड़ाई बाकी है, वहीं भाजपा का अभेद्य माना जाने वाला तंत्र भी अपने सबसे सुरक्षित किलों में सामना करते दिखा है।
मीडिया और बड़े आंकड़ों की गवाही: 44 से 100+ और 303 से 240 का सफर
पिछले एक दशक में देश की दोनों बड़ी पार्टियों के ग्राफ में आया बदलाव इस बात का गवाह है कि लोकतंत्र में कोई भी लहर हमेशा के लिए अमर नहीं होती।
कांग्रेस का पुनरुत्थान: साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट गई थी, तब आलोचकों ने इसे पार्टी का अंत मान लिया था। 2019 में भी पार्टी केवल 52 सीटों तक ही पहुंच सकी।
लेकिन 2024 के आम चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जोरदार वापसी करते हुए न सिर्फ 99 सीटें जीतीं, बल्कि बाद में उपचुनावों में जीत के साथ यह आंकड़ा 100 के पार पहुंच गया। यह उछाल दिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी विपक्ष ने अपनी जमीन वापस हासिल की है।
भाजपा का घटता संख्या बल: दूसरी तरफ, 2019 में अपने दम पर 303 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली भाजपा 2024 में 240 सीटों पर सिमट गई। RSS जैसी मजबूत रीढ़ और ‘पन्ना प्रमुखों’ के विशाल कैडर के बावजूद भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत के आंकड़े से पीछे रहना पड़ा और सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा।
आम चर्चा में क्या यह ‘कौरव सेना’ बनाम ‘एकल योद्धा’ की लड़ाई है?
राजनीतिक चर्चा में तो भाजपा के पास जो सांगठनिक मशीनरी है, उसका मुकाबला करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। RSS का कैडर-आधारित नेटवर्क चुनाव के समय भाजपा के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच का काम करता है।
खबर विश्लेषण की स्थिति में सत्ता पक्ष को एक विशाल ‘सांगठनिक सेना’ कहना गलत नहीं होगा, जिसके सामने विपक्ष की ओर से राहुल गांधी एक मुख्य लड़ाके के रूप में वैचारिक मोर्चा संभाले हुए हैं।
कांग्रेस अपनी 2 पारंपरिक सीटों पर काबिज थी और इस बार उसने कुल 12 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से वह केवल 1 प्रतिष्ठित सीट (महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट) जीतने में सफल रही।
संक्षेप में: कांग्रेस ने 1 खोया, भाजपा के हाथ से 4 निकले।
दूसरी ओर, भाजपा इन सभी 28 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरी थी और उसने कुल 13 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन इस प्रक्रिया में उसके हाथ से 4 सबसे मजबूत और पारंपरिक गढ़ (जैसे नागपुर, वाराणसी और पटना) निकल गए।
सब कुछ मीडिया जानकारी है जहाँ कांग्रेस 12 में से केवल 1 सीट जीतकर अपने सांगठनिक बिखराव से जूझती नजर आई, वहीं भाजपा का सभी 28 सीटों पर लड़कर 4 प्रतिष्ठित सीटें गंवाना उसके लिए एक बड़ा रणनीतिक और प्रतीकात्मक झटका साबित हुआ है।






