नशा और जीवन-यापन एक साथ नहीं चल सकते — यह वाक्य सदन में न कहा गया हो, लेकिन इसे नीति में उतारने की जिम्मेदारी उन्हीं की है जो सदन चलाते हैं।
रायपुर, 26 फरवरी 2026
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के तीसरे दिन बुधवार को एक ऐसा सवाल उठा, जिसका जवाब सरकारी आंकड़ों से नहीं, जमीनी हकीकत से मिलता है — प्रदेश में नशे की लत अब किसी एक तबके या इलाके तक सीमित नहीं रही, यह एक सामाजिक संकट का रूप ले चुकी है।
बीजेपी विधायक अजय चंद्राकर ने सदन में AIIMS और सामाजिक न्याय मंत्रालय के राष्ट्रीय सर्वेक्षण का हवाला देते हुए जो तस्वीर पेश की, वह चिंताजनक से कहीं ज्यादा है। प्रदेश में नशीले ड्रग यूजरों की संख्या डेढ़ लाख से बढ़कर दो लाख हो चुकी है। गांजा सेवन करने वालों की तादाद चार लाख के करीब पहुंच रही है। और सबसे भयावह यह है कि दस से सत्रह साल के चालीस हजार से अधिक बच्चे और किशोर इन्हेलेंट्स और कफ सिरप के नशे के शिकार हो चुके हैं।
विधायक धरमलाल कौशिक ने भी प्रशासन की विफलता पर सवाल उठाए। चंद्राकर ने सीधे कहा — रायपुर में हर जगह नशीले पदार्थ सुलभ हैं, नशे की लत से मानसिक तनाव बढ़ रहा है और सुसाइड के मामले 250 से 300 तक जा पहुंचे हैं।
गृहमंत्री विजय शर्मा ने जवाब में आंकड़े गिनाए — 2026 में जनवरी तक 146 प्रकरणों में 257 गिरफ्तारियां, 2025 में 16 आरोपियों की 13.29 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त या फ्रीज। टास्क फोर्स और विशेष अभियानों का भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कहा — “यह कहना गलत है कि प्रशासन फेल रहा है।”
लेकिन सवाल यह है कि गिरफ्तारियां होती हैं, संपत्तियां जब्त होती हैं — फिर भी नशे का जाल फैलता क्यों जा रहा है? संख्याएं हर बार बढ़ती हुई क्यों मिलती हैं?
इस बहस में एक और विरोधाभास भी उभरा, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। एक ओर सरकार नशाबंदी की बात करती है, दूसरी ओर सुबह दस बजे से शराब की दुकानें खुलवाती है। पुलिस नशे में वाहन चलाने वालों पर कार्रवाई करती है, और सरकार खुद उसी नशे की आपूर्तिकर्ता बनी रहती है। यह नीतिगत विरोधाभास नहीं, नीतिगत विफलता है। जानकार मानते हैं कि यदि शराब की बिक्री दोपहर बाद सुनिश्चित की जाए, तो कम से कम दिन के समय नशे में होने वाली दुर्घटनाओं और युवाओं की पहुंच पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
विधानसभा में उठे ये सवाल महज प्रश्नकाल की औपचारिकता नहीं हैं। ये उस समाज की आवाज हैं जो अपने बच्चों को धीरे-धीरे नशे की गिरफ्त में जाते देख रहा है। सरकार के पास आंकड़े हैं, टास्क फोर्स है, अभियान हैं — लेकिन अगर संख्याएं फिर भी बढ़ रही हैं, तो यह मानना होगा कि रणनीति में कहीं न कहीं बुनियादी खामी है।


