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Friday, June 5, 2026

प्राकृतिक आवरण और युद्धक शोर: प्रकृति के वस्त्र को तार-तार करता मानव

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जीवन और प्रकृति – 05/06/2026

जीवन एक मुकम्मल दर्शन है जहां “प्रकृति जीवन का पूर्ण आवरण है, लेकिन मानव इस आवरण को फाड़ कर नंगा होना चाहता है।यह लेख उस “जीवन और युद्ध उलझन को सुलझाने की एक मजबूत चाबी (Master Key) हो सकती है।

संपूर्ण आवरण और मनुष्य का नंगापन
एक विचार (आवरण और मनुष्य की अज्ञानता) के तहत आपस में जोड़ना होगा तभी संसार नहीं भटकेगा, जब तक हम इंसान को प्रकृति की देयता समझ नहीं रहेगा तब तक हम यूं ही विनाश करते रहेंगे।हमने क्या दिया यह महत्वपूर्ण नहीं है हमने किसी से क्या लिया इसका आभार प्रकट करना चाहिए।

प्रकृति इस जीवन का पूर्ण आवरण है। वह हमें अपने भीतर समेटे हुए है, हमारा पोषण करती है और एक शाश्वत सुरक्षा कवच की तरह हमें ढके रहती है। लेकिन विडंबना देखिए, आधुनिक मानव अपनी तथाकथित बुद्धि के अहंकार में इस पवित्र आवरण को फाड़ कर नंगा हो जाना चाहता है। वह समझ नहीं पा रहा है कि इस आवरण के हटते ही उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

इस आवरण के फटने की शुरुआत तब होती है, जब मनुष्य प्रकृति के संवाद को सुनना बंद कर देता है और केवल अपने बनाए कृत्रिम शोर में जीने लगता है।


भाषा का अहंकार और मूक चेतना से अलगाव

जब हम इस प्रकृति में पैदा हुए थे, तब हमारे पास कोई शब्द नहीं था, कोई भाषा नहीं थी। फिर भी हम जीवित थे। मनुष्य ने तरकीबें निकालीं, अपने भीतर के शोर को शब्द दिए, व्याकरण रचा और बोलने लग गया। हमें लगा कि हम समृद्ध हो गए, लेकिन वास्तव में यहीं से हमने प्रकृति के आवरण को फाड़ना शुरू किया।

हम अपनी बनाई भाषा के जाल में ऐसे कैद हुए कि ८४ लाख योनियों वाली इस विशाल सृष्टि की आदिम भाषा को ही भूल गए। हम सागर तट पर जाते हैं, लहरों के शोर को सुनते हैं, पर उसे केवल पानी का टकराना मान लेते हैं। हम यह नहीं समझ पाते कि वह शोर दरअसल एक भाषा है।

सपने
क्या लहरें समुद्र के देखे गए अंतहीन सपने हैं, जो बार-बार साकार होने के लिए छटपटाते हैं? क्या वे किनारों से टकराकर लगातार जो शोर मचाती हैं, वह इस मूक सृष्टि का संवाद है जिसे सुनने वाला कोई नहीं है?

मानव जन्म
मनुष्य का प्रजनन और विकास बाह्य सहयोग और सामाजिक शोर पर टिका है, जबकि पेड़-पौधे और जीव-जंतु बिना किसी शोर-शराबे के, प्रकृति के मौन नियम से अपना सृजन कर जाते हैं। मनुष्य इस मौन आवरण को समझ ही नहीं पा रहा है।

विश्व पर्यावरण दिवस के इस मोड़ पर आज जब ईरान, इजरायल और अमेरिका जैसी महाशक्तियां युद्ध की आग में झुलस रही हैं और समुद्र के सीने पर बारूद बरसाया जा रहा है, तब यह साफ हो जाता है कि युद्ध और प्राकृतिक विनाश दोनों ही मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को गहरे स्तर पर निगल रहे हैं। बमबारी और सैन्य गतिविधियों के कारण जहां एक तरफ जान-माल की भारी हानि और इंसानी विस्थापन हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ‘इकोसाइट’ (पर्यावरण की क्रूर हत्या) जैसी भयावह स्थिति पैदा हो रही है; यह तबाही चीख-चीख कर कह रही है कि मनुष्य अपनी ही बनाई सरहदों के शोर में प्रकृति के उस जीवनदायी आवरण को तार-तार कर खुद को नग्न और असहाय कर रहा है।

मेरा विचार मेरा दर्शनना कोई दार्शनिक, ना कोई कवि, ना कोई आध्यात्मिक प्रणेता…”
— दीपक पांडेय



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