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Friday, June 5, 2026

आत्म चेतना – चेतना मौन है या मुखर, मौन’ का चक्रव्यूह में प्रवेश करना ही चेतना की गुप्त यात्रा है

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लेख – 04 जून 2026

अंतहीन संघर्षों में आज के मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष किसी दृश्य युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि उसके भीतर के एक अदृश्य, शांत अंधेरे मानसिक अंतर्द्वंद्व में चल रहा है। वह बाहर से जितना सुव्यवस्थित दिखता है, भीतर से उतना ही खंडित है। वह हर रोज दुनिया के सामने मुस्कुराता है, जिम्मेदारियों को कंधा देता है, और ‘धैर्य’ का मुखौटा पहने रहता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लगातार सहते-सहते उस धैर्य के पीछे क्या घटित हो रहा है?

धैर्य का अभ्यास करते-करते, बिना किसी शोर के, उसकी चेतना भीतर ही भीतर थकने लगती है। एक समय था जब मन में आकांक्षाओं की एक चंचल, उफनती हुई नदी बहती थी। सब कुछ मुट्ठी में कर लेने का साहस था, आसमान को छूने की जिद थी।

पर अचानक, न जाने किस मोड़ पर, उस जीवंतता की जगह एक गहरा, रहस्यमयी मौन उतर आया। नदी का वेग अचानक एक ठहरे हुए, डरावने जलाशय में बदल गया।

अब ऐसा लगता है मानो हम जीवन को जी नहीं रहे, बल्कि एक भारी, अदृश्य बोझ को धीरे-धीरे ढो रहे हैं। जो धैर्य कभी हमारा सबसे बड़ा आत्मबल था, वह परिस्थितियों के सामने निरंतर झुकते-झुकते एक मूक पीड़ा में बदल चुका है।

मनुष्य अपने ही बनाए इस चक्रव्यूह में फंसकर, अपने भीतर की उस दिव्य उजास (प्रकाश) को खोता चला जाता है।

टूटन से रूपांतरण: महाविज्ञान का रहस्य

लेकिन ठहरिए! क्या यह अंत है? या किसी बहुत बड़े रहस्य की शुरुआत?

दर्शन – हमें केवल इस पीड़ा का अंधेरा नहीं दिखाता, बल्कि उस अंधेरे को चीरने वाली एक गुप्त दृष्टि देता है। जीवन की कठोरताओं के सामने घुटने टेककर सब कुछ सह जाना अंतिम सत्य हो ही नहीं सकता।

असली रहस्य इस प्रश्न में छिपा है कि—सहने के इस अत्यंत गहरे अनुभव से हमारी चेतना भीतर ही भीतर क्या सीख रही है? क्या वह सचमुच टूट रही है, या किसी नए स्वरूप में ढलने के लिए पिघल रही है?

यही वह बिंदु है जहाँ गीता की ‘समता-बुद्धि’ का रहस्यमयी विज्ञान काम आता है। यह बुद्धि हमें सिखाती है कि सुख-दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय—इन सबको एक साधारण मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि एक द्रष्टा की व्यापक दृष्टि से देखा जाए।

जब आप परिस्थितियों से ऊपर उठकर उन्हें देखना शुरू करते हैं, तो मन उनका दास बनना बंद कर देता है।

जो भीषण चोट आज आपको बाहर से तोड़ती हुई प्रतीत हो रही है, वह वास्तव में आपको नष्ट नहीं कर रही। यदि उसे गहरे आत्मनिरीक्षण और आंतरिक विज्ञान के साथ जिया जाए, तो वही टूटन अंततः आपके भीतर एक ऐसी अभेद्य, वज्र जैसी दृढ़ता को जन्म देती है, जिसे संसार की कोई भी परिस्थिति कभी दोबारा हिला नहीं सकती। आप टूटते नहीं हैं, आप रूपांतरित हो जाते हैं!

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