डिजिटल डेस्क/18/04/2026
संसद की सीढ़ियों पर टकराते दो विचारों के बीच, क्या वाकई लोकतंत्र की शुचिता दम तोड़ रही है? आइए जानते हैं ज्योति और ज्वाला के बीच की इस तीखी बहस के आईने में।
संसद का ‘विशेष सत्र’ या महज़ एक राजनीतिक बिसात?
ज्वाला: “ज्योति पति जी, आखिर तीन दिन का वह विशेष सत्र बुलाकर सरकार क्या साबित करना चाहती थी? क्या यह महिलाओं की सुरक्षा और आरक्षण के प्रति उनकी ‘पूर्ण प्रतिबद्धता’ का प्रमाण था, या फिर महज एक दिखावा?”
ज्योतिपति: “ज्वाला, यह कोई प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘राजनीतिक खेल’ है। आजकल की राजनीति का मूलमंत्र है—सामने वाले को पस्त और परास्त करना। वोट बैंक की फसल काटने के लिए आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ धर्म और नैतिकता भी सत्ता के दास बनकर खड़े नजर आते हैं।”
जब ‘संसद’ में मर्यादाएं तार-तार होती हैं।
ज्वाला: “बिल्कुल सही कहा। जिस संसद में देश का भविष्य तय होना चाहिए, वहां अक्सर नेताओं के आचरण पर सवाल उठते हैं। कभी पोर्न देखने की खबरें, तो कभी बहस के नाम पर अमर्यादित टिप्पणियां—क्या यही हमारे ‘लोकप्रहरी’ हैं? उन्हें लगता है कि वे भगवान हैं और जनता उनकी प्रजा, जिसे वे अपनी सुविधानुसार खुश करने का ढोंग करते हैं।”
ज्योतिपति: “हाँ, ज्वाला! जुबानी तीर छोड़कर एक-दूसरे को घायल करना ही आज की राजनीति है। सबसे दुखद यह है कि जनता भी अब मूकदर्शक बनी बैठी है। मुफ्त योजनाओं के जाल में फंसी जनता भीष्म, द्रोण और कर्ण की तरह उस दुर्योधन के सामने शरणागत है, जो लोकतंत्र को अपनी जागीर समझता है।”
जादूगरी का खेल और महिला अस्मिता
ज्वाला: “सच कहूं तो, वहां बहस कम और अपनी कमजोरी को ताकत बताने की होड़ ज्यादा है। कोई कहता है, ‘यहाँ कोई जादू नहीं चलने वाला’, तो कोई अपनी जीत को ‘जादू’ बताकर जनता को मंत्रमुग्ध करने का दावा करता है।
लेकिन कुछ भी हो, ज्योति पति जी, महिलाएं जननी हैं, गृहस्वामिनी हैं। इन्हें सुरक्षा और आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, चाहे तरीका कोई भी हो। अफसोस कि बहसें तो बहुत हुईं, पर यह बुनियादी अधिकार आज भी कागजों में ही उलझा हुआ है। संसद केवल बहस या आरामगाह न बने, यहां लोकतंत्र के विकास की बातें होनी चाहिए।”
क्या चाणक्य का नाम लेना, चाणक्य का अपमान है?
ज्योति: “बिल्कुल! आज हर कोई खुद को ‘चाणक्य’ कहता है, लेकिन मुझे तो यह उस महान आचार्य का अपमान लगता है! वे दरबारी चारण हो सकते हैं, चाणक्य नहीं। चाणक्य वह शिक्षक था जिसने एक सम्राट को चुनौती दी थी, जो अर्थशास्त्र का प्रकांड विद्वान था।संसद को देश निर्माण की आधारशिला बनना था, न कि भड़ास निकालने का अड्डा।”
ज्वाला: “राजनीतिक शुचिता की बात पर मुझे फिर चाणक्य का ध्यान आता है। एक बार जब एक व्यक्ति उनसे मिलने आया, तो उन्होंने राजकार्य के लिए जल रहे दीपक को बुझा दिया और निजी खर्च से जलने वाला दूसरा दीपक जलाया। उन्होंने कहा—’अब मैं निजी काम कर रहा हूँ, अतः राजकीय कोष के दीपक का उपयोग पाप है।'”
ज्योतिपति “वही तो शुचिता है, ज्वाला! आज का नेता राजकोष तो क्या, पूरे देश की अस्मिता को अपने स्वार्थ की खातिर जलाने को तैयार है। हम उस युग में हैं जहाँ दीपक तो बहुत हैं, पर प्रकाश कहीं नहीं है।”
ज्वाला और ज्योति यह विचार रख शांत हो जाते है संसद केवल एक ईमारत नहीं, राष्ट्र की आत्मा का प्रतिबिम्ब है। क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की कल्पना कर सकते हैं जहाँ ‘शुचिता’ सिर्फ एक शब्द न होकर एक व्यवहार हो?संसद को देश निर्माण की आधारशिला बनना चाहिए था, लेकिन वह केवल भड़ास निकालने का अड्डा बन गई है। चाणक्य ने तो वेश्यालयों जैसी संस्थाओं को भी राजकीय संरक्षण देकर टैक्स वसूला था ताकि समाज की बुराइयों को नियंत्रित किया जा सके, लेकिन आज की राजनीति में तो स्वयं संसद ही उन बुराइयों का केंद्र बनती दिख रही है।”
आपकी क्या राय है? क्या वाकई हम एक ऐसे ‘चाणक्य’ के बिना अंधेरे की ओर बढ़ रहे हैं?


