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शक्कर कारखाना में भारतीय मजदूर संघ का टूल डाउन आंदोलन, मांगें पूरी न होने पर ‘चक्का जाम’ की चेतावनी

पंडरिया, छत्तीसगढ़ दिनांक: 11 अगस्त 2026

पंडरिया स्थित लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल सहकारी शक्कर कारखाना में श्रमिकों की जायज मांगों और प्रबंधन के अड़ियल रवैये के विरोध में भारतीय मजदूर संघ (BMS) के बैनर तले टूल डाउन आंदोलन का प्रथम दिवस शांतिपूर्ण लेकिन रोषपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। आंदोलन के पहले ही दिन श्रमिकों में प्रबंधन के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिला।

प्रमुख समस्याएं और लंबित मांगें:

  • 7 माह का लंबित वेतन: कारखाने के श्रमिकों का पिछले 7 महीनों से लगातार भुगतान रुका हुआ है, जिससे उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट पैदा हो गया है।
  • हड़ताल अवधि का भुगतान: पिछली हड़ताल अवधि का पारिश्रमिक आज तक श्रमिकों को नहीं दिया गया है।
  • कर्मचारियों की बहाली: संगठन के महामंत्री श्री ललित चन्द्रवंशी सहित अन्य कार्य से वंचित श्रमिकों को तत्काल प्रभाव से काम पर वापस लिया जाए।

प्रबंधन की तानाशाही पर सवाल:

भारतीय मजदूर संघ का कहना है कि समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रबंधन तानाशाहीपूर्ण रवैया अपना रहा है। श्रमिकों की आवाज उठाने वाले संगठन के महामंत्री श्री ललित चन्द्रवंशी की आईडी डिलीट कर दी गई है।

भारतीय मजदूर संघ (BMS) इकाई: लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल सहकारी शक्कर कारखाना, पंडरिया संघ ने कड़े शब्दों में सवाल उठाया है.—

  • क्या श्रमिक अपने ही मेहनत के पैसे के लिए सवाल नहीं पूछ सकता?
  • क्या अपने अधिकारों की बात करना अपराध है?

श्री ललित चन्द्रवंशी ने किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि सैकड़ों श्रमिकों के लंबित भुगतान और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी, जिसके तहत उनपर यह कार्रवाई की गई है।

उग्र आंदोलन की चेतावनी:

भारतीय मजदूर संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि श्रमिकों की आवाज को दबाने और संगठन को कमजोर करने की हर साजिश का डटकर मुकाबला किया जाएगा। यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि प्रत्येक श्रमिक के सम्मान, अधिकार और भविष्य की है।

यदि प्रबंधन ने शीघ्र ही उचित कदम उठाते हुए लंबित भुगतानों और कर्मचारियों की बहाली पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर संघ चक्का जाम जैसे बड़े और कड़े कदम उठाने के लिए बाध्य होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी कारखाना प्रबंधन की होगी।

जनता की चीख और कुर्सी तोड़ व्यवस्था: जब बिजली दफ्तर में बैठीं महिला पार्षद!

बेमेतरा | 11 अगस्त 2026

सावन और उमस के बीच जब घरों में पंखे हवा फेंकने की बजाय बिजली पर ही दम तोड़ने लगें, और पानी की एक-एक बूंद के लिए मोटर जवाब दे जाए, तो जनता का सब्र टूटना वाजिब है। बेमेतरा में आज कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां बिजली विभाग की मनमानी और गैर-जिम्मेदाराना रवैये से तंग आकर वार्ड पार्षद नीतू कोठारी को सीधे बिजली ऑफिस के भीतर ही धरने पर बैठना पड़ा।

यह सिर्फ एक पार्षद का विरोध नहीं था, बल्कि उस आम इंसान की चीख थी जो हर महीने महंगे स्मार्ट मीटर के बिल तो समय पर भर रहा है, बदले में उसे मिलता क्या है? सिर्फ अघोषित बिजली कटौती, लो वोल्टेज और फुंके हुए उपकरणों का भारी-भरकम हिसाब!

सिस्टम के खिलाफ जनता की दहाड़

आज छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों—चाहे वह रायपुर हो, धमतरी हो या बेमेतरा—हर जगह से एक ही रोना सामने आ रहा है। बिना किसी आंधी-तूफान के, बिना किसी पूर्व सूचना के, बिजली का आना-जाना किसी आंख-मिचौली से कम नहीं है।

लो वोल्टेज का टॉर्चर: घरों में रखे कूलर, पंखे और पानी के पंप महज शो-पीस बनकर रह गए हैं।
अचानक झटके और लाखों का नुकसान: बिना किसी चेतावनी के अचानक बिजली गुल होना और फिर झटके से वापस आना।

इस लुकाछिपी में कितने ही घरों के फ्रिज, पंखे और महंगे वॉटर आरओ (RO) उड़ जाते हैं। पलक झपकते ही हजारों रुपए का नुकसान सीधे आम आदमी की जेब पर डाका डालता है।

ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर: शिकायतों के अंबार लगने के बाद भी महीनों तक खराब या ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर न बदले जाना विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

जब कुर्सी पर बैठे अफसरों को जगाना पड़ा
लगातार वार्डवासियों की शिकायतें सुनने के बाद जब जिम्मेदार अधिकारी टालमटोल की मुद्रा में रहे, तब पार्षद नीतू कोठारी ने अपनी जन-प्रतिनिधि होने की असल जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने साफ कर दिया कि एसी कमरों में बैठकर जनता के दर्द को नजरअंदाज करने वाले अधिकारी अब मनमानी नहीं कर पाएंगे।

धरने की तपिश और जनता के आक्रोश का असर यह हुआ कि बिजली विभाग के अधिकारियों को झुकना पड़ा। वार्ता के तुरंत बाद क्षेत्र में नया ट्रांसफार्मर लगाने का काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया गया है।

कलम की दो टूक चेतावनी
वार्डवासियों ने इस त्वरित कार्रवाई का स्वागत तो किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर समस्या के समाधान के लिए जनता और जनप्रतिनिधियों को दफ्तरों में धरना ही देना पड़ेगा? क्या विभागीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी खुद नहीं समझ सकते?

पार्षद नीतू कोठारी ने इस संघर्ष में साथ देने वाले समस्त वार्डवासियों का आभार जताया है, साथ ही बिजली विभाग को दो टूक चेतावनी भी दी है कि भविष्य में यदि जनता को बिना वजह ऐसी किसी भी प्रताड़ना से गुजरना पड़ा, तो विरोध का यह स्वर और अधिक उग्र होगा।

पत्रकार की कलम से: बिजली विभाग के दफ्तर में दिया गया यह धरना सिर्फ एक ट्रांसफार्मर बदलने की कहानी नहीं है, यह उस सुस्त और बहरी व्यवस्था के कान खींचने का उदाहरण है जो कागजों पर सब ठीक होने का दावा करती है, लेकिन जमीन पर जनता अंधेरे में सिसक रही है।

लोकतंत्र पर पड़ता पूंजीवाद की नजर

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न्यूज डेस्क -11 अगस्त 2026

भवति भिक्षां देहि”

प्रजातंत्र में वोट मांगना भी एक भिक्षा का स्वरूप है और ‘मतदान’ शब्द में तो खुद ‘दान’ ही लिखा हुआ है, अतः इन दोनों का भाव मिलकर केवल और केवल जनता की सच्ची सेवा होना चाहिए।

आज लोकतंत्र का अर्थ पैसे की राजनीति रह गई है। जिसके पास पैसा है, वही चुनाव लड़ सकता है और वही जनता को प्रलोभित कर वोट बटोर सकता है। यह स्थिति एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे की निशानी है। जब लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत देश में प्रजातंत्र की स्थापना की गई थी, उस समय उसकी सोच बेहद महान रही होगी।

हमारे देश में प्रवृत्तियों को लेकर तीन तरह के विचार देखे जाते हैं—पहला, मांग कर खाओ; दूसरा, बांटकर खाओ (जिसे व्यवसाय बनाया गया); और तीसरा, छीन कर खाओ और राज करो। इनमें से सबसे सर्वोत्तम प्रवृत्ति ‘मांग कर खाने’ को माना गया था।

इसके कई ऐतिहासिक और पौराणिक उदाहरण हैं। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बली से धरती को बचाया यानी मांग लिया। जब हिरण्याक्ष ने धरती को रसातल में फेंक दिया, तब विष्णु ने वराह बनकर उसकी रक्षा की।

इसी प्रकार, गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने वाले सभी छात्र, चाहे वे किसी भी वर्ण या संप्रदाय के हों, उन्हें भिक्षा मांगने की परंपरा के तहत नगर में भेजा जाता था ताकि उनके भीतर विनम्रता और ‘मांग कर खाने’ की प्रवृत्ति बनी रहे।

इसका उद्देश्य यह था कि वे भविष्य में कभी किसी का हक छीनकर, पैसे का प्रलोभन देकर सत्ता प्राप्त न कर सकें और जनता, समाज तथा देश को डरा न सकें।

लेकिन आज प्रजातंत्र की वह मूल भावना पूरी तरह परिवर्तित हो चुकी है। पहले के लोग 500 से 2000 रुपये में चुनाव लड़ लेते थे, जबकि आज के समय में कोई भी चुनाव करोड़ों रुपये के बिना नहीं लड़ा जाता। इसके ऊपर राजनीतिक दलों की मुफ्त की योजनाएं और जन-प्रलोभन वाली बातें चुनावी मैदान में उतर आती हैं।

यदि यही हाल रहा, तो एक दिन इतिहास खुद को दोहराएगा। जैसे अंग्रेज व्यापार करने भारत आए थे और फिर देश को गुलाम बना लिया, वही स्थिति अब दोबारा पैदा होने की कगार पर है।

आज पूंजीवाद धीरे-धीरे प्रजातंत्र को खरीदने की फिराक में है, जहाँ चुनावों में खरीद-फरोख्त का बाजार गर्म होता जा रहा है।

जब पूंजीवाद का दायरा बढ़ता है, तब ‘लूट वाद’ जन्म लेता है—यानी लूटो और सब कुछ अपने कब्जे में ले लो। यह वही ‘छीन कर खाने’ की प्रवृत्ति है। इसका परिणाम यह होता है कि जिसके पास पैसा या ताकत नहीं है, वह कितनी भी योग्यता क्यों न रखता हो, चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता।

धनबल से बड़ा है श्रमबल जहां बहुतायत जनसंख्या है।

ऐसे में बाहुबली और धनबल वाले ही चुनाव जीतने का दमखम रखते हैं और वे ही प्रजातंत्र के परिणामों को अपनी मर्जी से प्रभावित करते हैं, जैसा कि हम लगातार देख भी रहे हैं।

यदि आज सचमुच इस प्रजातंत्र को बचाना है, तो सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि पैसे के प्रभाव को इससे पूरी तरह दूर किया जाए। प्रजातंत्र को एक पवित्र ‘अनुष्ठान’ और मतदान को एक निष्कलंक ‘यज्ञ’ की भावना से पूरा किया जाना चाहिए—न कि चुनाव के दौरान महंगी-महंगी गाड़ियों का काफिला दौड़ाकर, जनता को प्रलोभनों का लालच देकर, या बंदूक और ताकत के सहारे चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की मानसिकता के साथ।

एक स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रणाली, जिसकी कल्पना हमारे विचारकों ने की थी, उसे अब केवल कागजों पर नहीं बल्कि अपनी वास्तविक परिणति में उतारने का समय आ गया है।

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख केवल वैचारिक अभिव्यक्ति है, इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है।
(दीपक पांडेय)

E-20 और आम जनता: वाहन बाजार में बदलती पसंद और पेट्रोल का घटता दायरा

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न्यूज _डेस्क /11 अगस्त 2026

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, पेट्रोल कारों की हिस्सेदारी घटकर 41.68 प्रतिशत रह गई है, जबकि CNG, इलेक्ट्रिक और अन्य विकल्पों की हिस्सेदारी 40.59 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

जुलाई के ऑटोमोबाइल आंकड़े भारतीय कार बाजार में एक बड़े बदलाव की गवाही दे रहे हैं। कभी बाजार पर एकछत्र राज करने वाली पेट्रोल कारों और दूसरे ईंधन विकल्पों के बीच का फासला अब सिमटकर महज एक प्रतिशत पर आ गया है।

यह बदलाव महज एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस आम वाहन खरीदार की बदलती सोच का परिणाम है जो ईंधन के मोर्चे पर भविष्य को लेकर उधेड़बुन में है।

संशय के घेरे में पेट्रोल और E-20 का सवाल

पिछले कुछ समय से पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल ब्लेंडिंग यानी E-20 को लेकर बाजार में चर्चाओं और अनिश्चितताओं का दौर गर्म है। सरकार भले ही इसके आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ गिना रही हो, लेकिन आम वाहन चालकों के मन में इंजन की उम्र, रख-रखाव और माइलेज को लेकर कई सवाल हैं।

सोशल मीडिया पर E-20 पेट्रोल से माइलेज घटने और इंजन के कुछ हिस्सों पर असर पड़ने की चर्चाएं आम थीं। अब स्थिति यह है कि सरकार ने भी संसद में यह मान लिया है कि E-20 पेट्रोल के इस्तेमाल से पुराने वाहनों के माइलेज में लगभग 6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है और कुछ रबर पार्ट्स प्रभावित हो सकते हैं।

इस स्वीकारोक्ति ने खरीदारों के उस संशय को और पुख्ता कर दिया है, जो नई कार खरीदने से पहले अब सौ बार सोचने पर मजबूर हैं।

डीलरशिप पर स्टॉक का दबाव और विकल्पों की तलाश

इस वैचारिक और तकनीकी असमंजस का सीधा असर कार बाजार की रफ्तार पर भी दिख रहा है:
बढ़ती इन्वेंट्री: FADA के अनुसार, डीलरशिप पर गाड़ियों का स्टॉक लगातार बढ़ रहा है। 25 प्रतिशत से ज्यादा डीलरों के पास 60 से 70 दिन या उससे ज्यादा पुराना स्टॉक पड़ा है, जबकि सामान्य स्थिति में यह 21 से 30 दिनों का होना चाहिए।

जुलाई में कंपनियों ने डीलरों को 4.69 लाख कारें भेजीं, जबकि रिटेल बिक्री करीब 4.16 लाख यूनिट ही रही।

विकल्पों की फेहरिस्त: जब पेट्रोल को लेकर तस्वीर धुंधली हुई, तो खरीदार चुप बैठने के बजाय दूसरे रास्तों की तलाश करने लगे। यही वजह है कि आज बाजार में कोई CNG की सुगमता तलाश रहा है, तो कोई भविष्य की जरूरत के रूप में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का पूरा गणित बैठा रहा है।

डीजल की अप्रत्याशित वापसी

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू डीजल कारों का रुख है। एक समय ऐसा आ गया था जब ऐसा लगने लगा था कि भारतीय सड़कों से डीजल इंजन पूरी तरह विदा हो जाएंगे। मारुति सुजुकी जैसी दिग्गज कंपनी ने अप्रैल 2020 से ही डीजल कारों का उत्पादन बंद कर दिया था।
लेकिन जुलाई के आंकड़ों में डीजल कारों का मार्केट शेयर बढ़कर 17.73 प्रतिशत हो गया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 1.4 प्रतिशत अधिक है।

जानकार इसे भी E-20 को लेकर मचे असमंजस और लंबी दूरी की यात्रा करने वाले ग्राहकों की व्यावहारिक जरूरतों से जोड़कर देख रहे हैं।

आगे की राह: त्योहारी सीजन तय करेगा दिशा

फिलहाल स्थिति यह है कि असमंजस के इस दौर में ग्राहकों का एक बड़ा वर्ग खरीदारी का फैसला टाल रहा है या फिर पेट्रोल के अलावा दूसरे पावरट्रेन को तरजीह दे रहा है। आने वाले समय में जब त्योहारी सीजन में बाजार पूरी तरह खुलेगा, तब यह साफ हो पाएगा कि भारतीय वाहन खरीदार पूरी तरह से इलेक्ट्रिक और वैकल्पिक ईंधन की तरफ कदम बढ़ाते हैं या पेट्रोल अपने पुराने रुतबे को बचाने में कामयाब रहता है।

देश के तीन कोने, सुलगते तेवर: दिल्ली के Gen-Z, रांची के छात्र और गुजरात के किसानों की हुंकार

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न्यूज डेस्क _11 अगस्त 2026

दिल्ली का Gen-Z हो, रांची के प्रतियोगी छात्र हों या फिर गुजरात के जमीन बचाते किसान—इन तीनों मोर्चों पर एक ही बात कॉमन है: व्यवस्था के प्रति गहराता असंतोष। जब तक नीति निर्माता युवाओं के भविष्य और अन्नदाताओं के हक पर संवेदनशीलता से विचार नहीं करेंगे, तब तक यह सुलगती हुई चिनगारी किसी भी वक्त बड़े बदलाव का रूप ले सकती है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में इन दिनों युवाओं, छात्रों और किसानों का आक्रोश सड़क पर साफ दिखाई दे रहा है। चाहे राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठा Gen-Z हो, झारखंड की राजधानी रांची में विधानसभा का घेराव करने वाले आक्रोशित छात्र हों या फिर गुजरात के मोरबी में अपनी जमीन के हक के लिए खड़े किसान—हर तरफ व्यवस्था के खिलाफ सुलगते तेवर नजर आ रहे हैं।

एक पोर्टल एडिटर की नजर से देखें, तो यह देश के तीन अलग-अलग कोनों से उठ रही उस जन-भावना का उबाल है, जिसे अब नजरअंदाज करना सरकार के लिए मुश्किल होता जा रहा है।

दिल्ली का जंतर-मंतर: Gen-Z की हुंकार और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

जुलाई 2026 के दौरान देश की राजधानी नई दिल्ली का जंतर-मंतर युवाओं के आक्रोश का केंद्र बन गया था। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विभिन्न छात्र संगठनों के नेतृत्व में चला यह बड़ा Gen-Z (जेन-जी) आंदोलन शिक्षा व्यवस्था की खामियों के खिलाफ एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।

वजह और मांगें: इस आंदोलन की मुख्य वजह नीट पेपर लीक और तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं में हो रही धांधली थी। युवाओं का यह गुस्सा तब अपने चरम पर पहुंचा जब आंदोलकारियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पूरी परीक्षा प्रणाली में अमूल्य सुधार की मांग को लेकर मोर्चा खोला।

रांची की सड़कें: JPSC-JSSC के खिलाफ छात्रों का उग्र प्रदर्शन

दूसरी तस्वीर झारखंड की राजधानी रांची से सामने आ रही है, जहां अगस्त 2026 के शुरुआती हफ़्तों से JPSC और JSSC परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के विरोध में छात्रों का उग्र आंदोलन जारी है। हालात तब और बेकाबू हो गए जब 10 अगस्त 2026 को विधानसभा घेराव के दौरान छात्रों ने सुरक्षा की कई बैरिकेडिंग तोड़ दीं।

प्रशासनिक कार्रवाई और मांगें: प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को वाटर कैनन, आंसू गैस और हल्के लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा। छात्र इन परीक्षाओं की सीबीआई (CBI) जांच कराने, संपूर्ण धांधली की उच्चस्तरीय जांच और इसमें लिप्त जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर अड़े हुए हैं। रांची की इन सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह है कि युवा वर्ग अब रोजगार और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

गुजरात के मोरबी में किसानों का संग्राम और राष्ट्रीय हलचल

इन दोनों युवा आंदोलनों के बीच, गुजरात के मोरबी जिले से उठी किसानों की आवाज अब राष्ट्रीय फलक पर दस्तक दे रही है। मोरबी तालुका के जेतपर गांव में किसान बिजली के खंभे लगाने के एवज में जमीन के बदले उचित मुआवजे की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं।

राष्ट्रीय नेताओं का समर्थन: इस स्थानीय आंदोलन को अब पंजाब के कद्दावर किसान नेताओं का भी खुला समर्थन मिल गया है।

भारतीय किसान यूनियन (BKU) के प्रेसिडेंट रघुवीर सिंह चौधरी और नेशनल स्पोक्सपर्सन राकेश टिकैत ने जेतपर गांव की किसान छावनी का दौरा कर आंदोलनकारियों को समर्थन का पूरा भरोसा दिया है।

चार गुना मुआवजे की मांग: किसानों का साफ कहना है कि उन्हें सरकार द्वारा जारी किया गया मौजूदा सर्कुलर और मुआवजा मंजूर नहीं है, बल्कि उन्हें जमीन के बदले चार गुना मुआवजा मिलना चाहिए। राकेश टिकैत ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो इस आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर दिल्ली का घेराव भी किया जा सकता है।

बीकेयू नेता राकेश टिकैत ने हर जिले के किसानों को एकजुट होकर मजबूत संगठन बनाने की अपील की है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह चिंगारी अब थमने वाली नहीं है।


दिल्ली के मंच पर जीवंत हुई छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा

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रायपुर, 10 अगस्त 2026 —

इस साल सम्मेलन की शुरुआत छत्तीसगढ़ की पंडवानी और तीजन बाई की याद में समर्पित प्रस्तुति से होना इसलिए खास रही कि इससे यह संदेश गया कि लोक कलाएँ आज भी भारत की सांस्कृतिक पहचान और रचनात्मक्ता का अहम हिस्सा हैं।

दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोक कला पंडवानी ने खास प्रस्तुति देकर दर्शकों का मन मोह लिया। IHC के स्टाइन ऑडिटोरियम में हुए इस कार्यक्रम का आरंभ पंडवानी की दिग्गज कलाकार, पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय तीजन बाई की स्मृति को समर्पित प्रदर्शनी से हुआ।

प्रभा यादव ने पारंपरिक संगीतकारों की संगत में महाभारत पर आधारित कथाएँ गाकर-पेश कीं। उनके प्रदर्शन में गायन, संवाद और अभिनय का सामंजस्य साफ दिखा, जिससे पंडवानी की जीवंतता और लोकशैली की ताकत सामने आई। मंच पर मौजूद दर्शकों ने प्रस्तुति को उत्साहवर्धक तालियों से सराहा।

कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिनिधि, कला-संस्कृति से जुड़े जाने-माने लोग और मीडिया भी मौजूद रहे। वरिष्ठ पत्रकार व मुख्यमंत्री के सलाहकार आर. कृष्ण दास, धरसींवा के विधायक एवं अभिनेता अनुज शर्मा, प्रबल प्रताप सिंह जूदेव, और अन्वेषा कला केंद्र की सचिव अन्वेषा ब्रह्मा ने कार्यक्रम में भाग लेकर इसे समर्थन दिया। IHC के निदेशक प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश ने भी शिरकत की।

धरसींवा विधायक अनुज शर्मा ने कहा कि पंडवानी छत्तीसगढ़ की पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण लोक कला है। तीजन बाई ने इसे गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

अतिथियों ने तीजन बाई के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके प्रयासों ने पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुंचाया। उन्होंने बताया कि पंडवानी सिर्फ कथावाचन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी सांस्कृतिक यादें और जीवन-मूल्यों को आगे पहुंचाने का जरिया है।

आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन का मकसद देश की विविध लोक परंपराओं को एक मंच पर लाना है।


सनी देओल का ‘मौसी’ वाला बयान और ‘बंटवारा 1947’: फिल्म रिलीज से पहले सोशल मीडिया पर

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बेमेतरा/रायपुर (छग) —10 अगस्त 2026

चौपाल में भी उठी तीखी प्रतिक्रिया
आमिर खान प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी बहुप्रतिक्षित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ अपनी रिलीज से ठीक पहले बड़े विवादों में घिर गई है। फिल्म 14 अगस्त को सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है, लेकिन इसके प्रमोशन के दौरान अभिनेता सनी देओल द्वारा पड़ोसी देश पाकिस्तान को लेकर दिए गए एक बयान ने सोशल मीडिया पर कोहराम मचा दिया है। इस बयान के बाद से जनता और दर्शकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

क्या था सनी देओल का विवादित बयान?
फिल्म के प्रमोशन के दौरान जब एक रिपोर्टर ने सनी देओल से पूछा कि वह पड़ोसी देश को किस नजरिए से देखते हैं, तो अभिनेता ने जवाब दिया— “पहले दोनों देश एक ही थे। जैसा कि मेरे पिता कहा करते थे, भारत मां है और पाकिस्तान भारत से ही निकला है, इसलिए वो मौसी बन गया। हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।”

इस बयान के सामने आते ही इंटरनेट पर आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया। यूजर्स ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि जिस फिल्म की कहानी 1947 के विभाजन के दर्दनाक दौर, सांप्रदायिक दंगों और विस्थापन के काले इतिहास पर आधारित हो, उसके संदर्भ में पाकिस्तान को ‘मौसी’ कहना देश के दर्द और इतिहास का अपमान है।

सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा
सनी देओल के इस बयान पर यूजर्स ने जमकर निशाना साधा है। सोशल मीडिया पर लोग तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं:
एक यूजर ने लिखा, “अगर मौके का फायदा उठाना एक कला है, तो सनी देओल इसके कलाकार हैं।”
दूसरे यूजर ने सवाल उठाया, “गदर से गद्दार क्यों? क्या तारा सिंह अब सकीना के साथ पाकिस्तान में रहेंगे?”

एक अन्य यूजर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “कितना शर्मनाक स्टेटमेंट है। अपने फ्लॉप करियर को संवारने के लिए कुछ भी बोल सकते हैं।”

कई लोगों ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि एक तरफ वे पौराणिक पात्रों को पर्दे पर जीते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसा बयान देते हैं। एक यूजर ने पूछा, “अगर पाकिस्तान से इतना ही प्यार है, तो ‘रामायण’ में हनुमान का रोल क्यों निभाया?”

जन चौपाल में उठी तीखी बहस: “बंटवारा भारत के लिए सदमा, पाकिस्तान के लिए आजादी”
जब इस पूरे मामले पर ‘जन चौपाल’ में स्थानीय स्तर पर चर्चा की गई, तो लोगों का गुस्सा और चिंता साफ तौर पर झलकी। चौपाल में मौजूद लोगों ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि 1947 का भारत का विभाजन कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि यह देश के माथे पर ऐसा नासूर है जिसका दर्द आज भी देशवासियों के दिलों में जिंदा है।

चौपाल में चर्चा के दौरान लोगों ने खुलकर अपनी राय रखी:
“बंटवारा भारत के लिए सदमा था और पाकिस्तान के लिए आजादी।” लोगों ने कहा कि जो देश भारत के टुकड़े करके बना हो, उसके प्रति इस तरह के हल्के बयान देना और उसे ‘मौसी’ की संज्ञा देना अस्वीकार्य है।

चौपाल में यह सवाल भी प्रमुखता से उठा कि क्या ऐसी फिल्में “ले के रहेंगे आजादी” जैसे देशविरोधी या अलगाववादी नारों या भावनाओं को कहीं न कहीं परोक्ष रूप से समर्थन तो नहीं दे रही हैं?

स्थानीय लोगों ने कड़े शब्दों में मांग उठाई कि यदि इस फिल्म की विषयवस्तु या प्रोमोशन में भारत के विभाजन के दर्द को कम करके आंका गया है, या गलत नैरेटिव सेट किया जा रहा है, तो ऐसी फिल्मों को भारत में रिलीज करने से पहले सोचना चाहिए।

चौपाल के लोगों का कहना था, “अगर यह फिल्म इतनी ही भाईचारे वाली है, तो ‘बंटवारा 1947’ को भारत से पहले पाकिस्तान में रिलीज किया जाना चाहिए।”


भरोसे का संकट:विश्वास और व्यवस्था के बीच उलझता छात्र आक्रोश

न्यूज-डेस्क /10 अगस्त 2026

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियों को लेकर सरकार और छात्रों के बीच चल रहा गतिरोध अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सरकार की तमाम कोशिशों और तीसरे दौर की लंबी मैराथन बैठकों के बाद भी समाधान न निकल पाना इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक व्यवस्था और युवाओं की उम्मीदों के बीच भरोसे का भारी संकट पैदा हो गया है। सरकार का यह दावा कि उसने छात्रों की 98 फीसदी मांगें मान ली हैं, अपनी जगह एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन सीबीआई जांच की जिद पर अड़े छात्रों का सड़क पर उतरना यह बताने के लिए काफी है कि जब तक न्याय का ढरारा पूरी तरह पारदर्शी नहीं दिखता, तब तक आधे-अधूरे समझौतों से बात बनने वाली नहीं है।
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक परीक्षा या एक विभाग का मामला नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं के भविष्य की छटपटाहट है जो अपनी मेहनत के बल पर मुकाम हासिल करना चाहते हैं। सरकार ने जेपीएससी (JPSC) में वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए ईडी (ED) की सिफारिश करने, फास्ट-ट्रैक कोर्ट के गठन और आईआईटी-आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल कर सुधार समिति बनाने जैसे बड़े और कड़े फैसले लिए हैं। जेपीएससी के तीन सदस्यों का इस्तीफा और सीआईडी के समन जैसी कार्रवाई इस बात का संकेत है कि आंच ऊपर तक पहुंच रही है। इसके बावजूद, जेएसएससी-सीजीएल (JSSC-CGL) परीक्षा की सीबीआई जांच पर अटका पेंच दोनों पक्षों के बीच संवादहीनता को और गहरा कर रहा है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह कहना बिल्कुल सही है कि समस्याओं का समाधान संवाद से होता है, लाठी-डंडों से नहीं, और युवाओं को न्याय दिलाया जाएगा। लेकिन संवाद तभी सार्थक होता है जब दोनों छोर के बीच अविश्वास की दीवारें गिरें। जब तक जांच एजेंसियों की निष्पक्षता को लेकर छात्रों के मन में संदेह रहेगा, तब तक हर प्रशासनिक कदम पर सवाल उठते रहेंगे।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और छात्र दोनों ही जिद छोड़कर जमीनी और व्यावहारिक समाधान की ओर बढ़ें। युवाओं की ऊर्जा देश और राज्य की असली ताकत है, उसे सड़कों पर संघर्ष करने के बजाय यदि व्यवस्था को सुधारने में लगाया जाए, तो यह झारखंड के हित में सबसे बड़ा कदम होगा। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के हर जायज संदेह को पूरी पारदर्शिता के साथ दूर करे, ताकि राज्य का युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त हो सके।

कांग्रेस संगठन में मजबूती और जनहित के मुद्दों को लेकर चिखला-कोदवा-मोहभट्टा मंडल में बैठक

बेरला (छग) 10 अगस्त 2026

जिला कांग्रेस अध्यक्ष आशीष छाबड़ा ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस संगठन की वास्तविक ताकत हमारे समर्पित कार्यकर्ता हैं। कार्यकर्ताओं की मेहनत, संघर्ष और समर्पण के बल पर ही संगठन जमीनी स्तर पर मजबूत होता है।

— बेरला ब्लॉक के कोदवा-मोहभट्टा मंडल कांग्रेस कमेटी के अंतर्गत ग्राम पंचायत चिखला में एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में जिला कांग्रेस कमेटी बेमेतरा के अध्यक्ष आशीष छाबड़ा प्रमुख रूप से शामिल हुए और कार्यकर्ताओं को संबोधित किया।

बैठक के दौरान आगामी संगठनात्मक गतिविधियों, कार्यक्रमों और क्षेत्र की विभिन्न गंभीर जनसमस्याओं को लेकर विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर कांग्रेस संगठन को गांव-गांव और बूथ स्तर तक अधिक मजबूत एवं सक्रिय बनाने का संकल्प लिया गया।

उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे आमजन के सुख-दुःख में सहभागी बनें और क्षेत्र की समस्याओं को अपनी समस्या समझकर उनके निराकरण के लिए पूरी मजबूती से संघर्ष करें।

बैठक में उपस्थित सभी कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने संगठन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने, आगामी कार्यक्रमों को सफल बनाने और जनहित के मुद्दों को जोर-शोर से उठाने का सामूहिक संकल्प लिया।

इस अवसर पर विवेक राजपूत, राजेश दुबे, भारत पटेल, श्याम बंजारे, राजेश चंदेल, झग्गर सिंह, प्रवीण शर्मा, सहदेव, बलराम पटेल, राकेश वर्मा, रूपेंद्र वैष्णव, ओम वर्मा, रमेश साहू, प्रकाश होरी वर्मा, ललित गुप्ता, चेतन भारती, रमेश होरी साहू सहित बड़ी संख्या में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित रहे।


दिव्य भव्य चातुर्मास व्रत अनुष्ठान महामहोत्सव

सपादलक्षेश्वर धाम, सलधा — 09 अगस्त 2026

धर्मसभा एवं पावन सत्संग

​शिवनाथ नदी के तट पर स्थित पावन सपादलक्षेश्वर धाम, सलधा में आयोजित दिव्य चातुर्मास व्रत अनुष्ठान महामहोत्सव के अंतर्गत आज ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के सान्निध्य में धर्म प्रवचन का आयोजन हुआ।

​कार्यक्रम का शुभारंभ स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी द्वारा गुरु वंदन से हुआ। इसके पश्चात हनुमत वंदन, श्री नारायण स्तवन और धर्म आह्वान के साथ गुरुपादुका पूजन संपन्न हुआ। तदुपरांत, शंकराचार्य जी महाराज ने अपने ओजस्वी वचनों से उपस्थित धर्मप्रेमियों को ज्ञान गंगा से तृप्त किया।

​जीवन के दो शत्रु और धर्म का मार्ग

​शंकराचार्य जी ने अपने प्रवचन में मनुष्य जीवन के संघर्षों और शत्रुओं का विस्तृत विवेचन करते हुए2 बताया:

​”मानव जीवन का सामना दो प्रकार के शत्रुओं से होता है—एक बाहरी शत्रु और दूसरे आंतरिक शत्रु। जीवन में इन शत्रुओं से दो उद्देश्यों के लिए संघर्ष करना पड़ता है: पहला, शत्रु को केवल परेशान करने के लिए; और दूसरा, उस पर विजय प्राप्त करने के लिए।”

​उन्होंने मार्गदर्शन करते हुए कहा कि यदि उद्देश्य केवल परेशान करना हो, तो किसी भी प्रकार से लड़ाई लड़ी जा सकती है। किंतु यदि लक्ष्य पूर्ण विजय प्राप्त करना है, तो संघर्ष हमेशा धर्म के मार्ग पर चलकर ही करना चाहिए।

  • ​धर्मानुसार संघर्ष: जब कोई धर्म के लिए और धर्म के मार्ग पर चलकर संघर्ष करता है और कठिनाइयाँ आने पर कमजोर पड़ने लगता है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए आगे आते हैं। भक्त की रक्षा के लिए ही भगवान विष्णु ने समय-समय पर विभिन्न अवतार लिए हैं।

​आंतरिक शत्रु: षड्रिपु और भगवान गणेश का संदेश

​मनुष्य के भीतर निवास करने वाले आंतरिक शत्रुओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के साथ चलने वाले आंतरिक संबंध तीन प्रकार के होते हैं—मित्र, शत्रु और तटस्थ। इनसे पहले हमें अपने भीतर छिपे विकारों को पहचानना होता है।

​सनातन धर्म में मनुष्य की पतन और बर्बादी का मुख्य कारण बाहरी शत्रुओं को नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे विकारों को बताया गया है। इन्हें षड्रिपु (छह आंतरिक शत्रु) कहा जाता है:

  1. ​काम,क्रोध,मोह,लोभ,मद मत्सर (इर्ष्या)

​इन छह आंतरिक शत्रुओं का नाश करने वाले देवता भगवान श्री गणेश हैं। पुराणों में भगवान गणेश के विभिन्न अवतारों और उनके द्वारा असुरों के वध का जो वर्णन मिलता है, वह वस्तुतः मनुष्य के भीतर के इन्हीं छह विकारों एवं आसुरी वृत्तियों का नाश करने का प्रतीक है।

​गौमाता की प्रतिष्ठा और सवा लाख शिवलिंग स्थापना

​सत्संग सभा को संबोधित करते हुए स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी ने सनातन धर्म के समक्ष वर्तमान चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की और गौमाता की महत्ता पर बल दिया।

  • ​शास्त्रों के अनुसार गौमाता के शरीर में तैंतीस कोटि (33 करोड़) देवताओं का वास है।
  • ​सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए गौमाता को देश में ‘राष्ट्रमाता’, प्रदेश में ‘राज्यमाता’, ग्राम में ‘ग्राम्यमाता’ और घर में ‘गृहमाता’ का दर्जा मिलना चाहिए।
  • ​सपादलक्षेश्वर धाम, सलधा में सवा लाख शिवलिंगों की स्थापना का संकल्प लिया गया है। श्रद्धालु अपने पारिवारिक एवं मांगलिक शुभ अवसरों पर शिवलिंग प्रतिस्थापित कर इस ऐतिहासिक एवं धार्मिक अनुष्ठान में सहर्ष अपना योगदान दे रहे हैं।

​विशिष्ट उद्बोधन: मोतीराम चंद्रवंशी (पूर्व विधायक, पंडरिया)

​पंडरिया के पूर्व विधायक श्री मोतीराम चंद्रवंशी ने सलधा आश्रम पहुँचकर शंकराचार्य जी के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा:

​”यह हमारा सौभाग्य है कि हमें इस दिव्य चातुर्मास में शिव अवतार स्वरूप शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के साक्षात् दर्शन और आशीर्वाद का पुण्य प्राप्त हुआ है।”

​उन्होंने आगे कहा कि सलधा धाम में निर्मित हो रहा सवा लाख शिवलिंगों का यह प्रांगण न केवल देश बल्कि एशिया का अत्यंत प्रख्यात मंदिर बनेगा, जिससे स्थानीय क्षेत्र को भी अपार गौरव और लाभ प्राप्त होगा।

​शंकराचार्य जी की धर्मनिष्ठा की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि स्वामी जी अपने सनातन अटल इरादों से कभी पीछे नहीं हटते। रामसेतु की रक्षा का आंदोलन हो, कवर्धा का झंडा प्रकरण हो, या साजा की घटना—स्वामी जी ने सदैव सनातन धर्म का झंडा बुलंद रखा है और वीडियो के माध्यम से निरंतर मार्गदर्शन प्रदान किया है। गौमाता को राष्ट्रमाता बनाने का उनका प्रयास अद्वितीय है। “सनातन सर्वोपरि है, धर्म सर्वोपरि है”—यही उनके जीवन का ध्येय है।

आज के सत्संग प्रवचन कार्यक्रम में धाम के बृहत बटुकों के साथ ब्राह्मण समाज के पदाधिकारी सहित आस पास के गांवों के ग्रामीण विशाल जन समूह के रूप में सभा स्थल में सत्संग का लाभ लिए।