E-20 और आम जनता: वाहन बाजार में बदलती पसंद और पेट्रोल का घटता दायरा
न्यूज _डेस्क /11 अगस्त 2026
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, पेट्रोल कारों की हिस्सेदारी घटकर 41.68 प्रतिशत रह गई है, जबकि CNG, इलेक्ट्रिक और अन्य विकल्पों की हिस्सेदारी 40.59 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
जुलाई के ऑटोमोबाइल आंकड़े भारतीय कार बाजार में एक बड़े बदलाव की गवाही दे रहे हैं। कभी बाजार पर एकछत्र राज करने वाली पेट्रोल कारों और दूसरे ईंधन विकल्पों के बीच का फासला अब सिमटकर महज एक प्रतिशत पर आ गया है।
यह बदलाव महज एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस आम वाहन खरीदार की बदलती सोच का परिणाम है जो ईंधन के मोर्चे पर भविष्य को लेकर उधेड़बुन में है।
संशय के घेरे में पेट्रोल और E-20 का सवाल
पिछले कुछ समय से पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल ब्लेंडिंग यानी E-20 को लेकर बाजार में चर्चाओं और अनिश्चितताओं का दौर गर्म है। सरकार भले ही इसके आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ गिना रही हो, लेकिन आम वाहन चालकों के मन में इंजन की उम्र, रख-रखाव और माइलेज को लेकर कई सवाल हैं।
सोशल मीडिया पर E-20 पेट्रोल से माइलेज घटने और इंजन के कुछ हिस्सों पर असर पड़ने की चर्चाएं आम थीं। अब स्थिति यह है कि सरकार ने भी संसद में यह मान लिया है कि E-20 पेट्रोल के इस्तेमाल से पुराने वाहनों के माइलेज में लगभग 6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है और कुछ रबर पार्ट्स प्रभावित हो सकते हैं।
इस स्वीकारोक्ति ने खरीदारों के उस संशय को और पुख्ता कर दिया है, जो नई कार खरीदने से पहले अब सौ बार सोचने पर मजबूर हैं।
डीलरशिप पर स्टॉक का दबाव और विकल्पों की तलाश
इस वैचारिक और तकनीकी असमंजस का सीधा असर कार बाजार की रफ्तार पर भी दिख रहा है:
बढ़ती इन्वेंट्री: FADA के अनुसार, डीलरशिप पर गाड़ियों का स्टॉक लगातार बढ़ रहा है। 25 प्रतिशत से ज्यादा डीलरों के पास 60 से 70 दिन या उससे ज्यादा पुराना स्टॉक पड़ा है, जबकि सामान्य स्थिति में यह 21 से 30 दिनों का होना चाहिए।
जुलाई में कंपनियों ने डीलरों को 4.69 लाख कारें भेजीं, जबकि रिटेल बिक्री करीब 4.16 लाख यूनिट ही रही।
विकल्पों की फेहरिस्त: जब पेट्रोल को लेकर तस्वीर धुंधली हुई, तो खरीदार चुप बैठने के बजाय दूसरे रास्तों की तलाश करने लगे। यही वजह है कि आज बाजार में कोई CNG की सुगमता तलाश रहा है, तो कोई भविष्य की जरूरत के रूप में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का पूरा गणित बैठा रहा है।
डीजल की अप्रत्याशित वापसी
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू डीजल कारों का रुख है। एक समय ऐसा आ गया था जब ऐसा लगने लगा था कि भारतीय सड़कों से डीजल इंजन पूरी तरह विदा हो जाएंगे। मारुति सुजुकी जैसी दिग्गज कंपनी ने अप्रैल 2020 से ही डीजल कारों का उत्पादन बंद कर दिया था।
लेकिन जुलाई के आंकड़ों में डीजल कारों का मार्केट शेयर बढ़कर 17.73 प्रतिशत हो गया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 1.4 प्रतिशत अधिक है।
जानकार इसे भी E-20 को लेकर मचे असमंजस और लंबी दूरी की यात्रा करने वाले ग्राहकों की व्यावहारिक जरूरतों से जोड़कर देख रहे हैं।
आगे की राह: त्योहारी सीजन तय करेगा दिशा
फिलहाल स्थिति यह है कि असमंजस के इस दौर में ग्राहकों का एक बड़ा वर्ग खरीदारी का फैसला टाल रहा है या फिर पेट्रोल के अलावा दूसरे पावरट्रेन को तरजीह दे रहा है। आने वाले समय में जब त्योहारी सीजन में बाजार पूरी तरह खुलेगा, तब यह साफ हो पाएगा कि भारतीय वाहन खरीदार पूरी तरह से इलेक्ट्रिक और वैकल्पिक ईंधन की तरफ कदम बढ़ाते हैं या पेट्रोल अपने पुराने रुतबे को बचाने में कामयाब रहता है।
- Advertisement -
- Advertisement -