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Friday, June 5, 2026

लोकतंत्र का नया अनुशासन: जब ‘सवाल’ ही ‘जुर्म’ बन जाए

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विशेष आलेख:-01/05/2026

आदर्शों का रामराज्य बनाम आज का तंत्र
“हम अक्सर ‘रामराज्य’ की दुहाई देते हैं, जहाँ मर्यादा का आदर्श ऐसा था कि एक साधारण नागरिक की शंका मात्र पर प्रभु श्री राम ने अपनी सबसे प्रिय ‘राजलक्ष्मी’ (माता सीता) का त्याग कर दिया था। वह राज्य ‘जनमत’ के प्रति इतना संवेदनशील था। लेकिन आज? आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ ‘छानबीन’ और ‘छेड़छाड़’ के बीच की लकीर धुंधली कर दी गई है। एक आम आदमी के लिए कानून की पेचीदगियां अलग हैं, लेकिन जब वही आदमी अपने द्वारा चुनी गई सरकार की नीतियों को ‘छेड़ता’ है या सवाल उठाता है, तो व्यवस्था का चेहरा अचानक सख्त हो जाता है। कल का राजा ‘सवाल’ सुनकर आत्म-मंथन करता था, आज का तंत्र सवाल सुनकर ‘दमन’ की राह चुनता है।”

चुनाव और अधिकार का विरोधाभास
विडंबना देखिए, जिस सरकार को हम अपनी उंगलियों से चुनते हैं, चुनाव के बाद वही उंगली अगर सत्ता की खामियों की तरफ उठे, तो उसे ‘अनुशासनहीनता’ करार दे दिया जाता है। यह एक अजीब तरह का ‘मौन समझौता’ है—वोट दीजिए और फिर पांच साल तक चकाचौंध वाली सड़कों और बंद होते स्कूलों को खामोशी से देखिए।

प्राथमिकता का सवाल
आपने अक्सर देखा होगा कि छोटे-मोटे अपराधों में शायद थाने से राहत मिल जाए, लेकिन व्यवस्था के खिलाफ ‘कलम’ चलाना या उसकी ‘शराब नीति’ और ‘शिक्षा नीति’ पर सवाल उठाना सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। आज कलम चलाने वाली उंगलियों को “राजस्व और विकास” के तर्कों से डराया जाता है।

आवाज’ की असल चुनौती
एक पत्रकार का धर्म ही है ‘सत्ता को छेड़ना’। अगर पत्रकार सरकार को नहीं छेड़ेगा, तो जनता के मुद्दे कभी मुख्यधारा में नहीं आएंगे। लेकिन आज का माहौल ऐसा है कि पत्रकार को अपनी सुरक्षा और सच्चाई के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

चौपाल बिंदु:
“लोकतंत्र में जनता ‘मालिक’ होती है, लेकिन आज मालिक ही डरा हुआ है कि कहीं वह अपने कारिंदों से हिसाब न मांग ले। सड़कों की चौड़ाई तो बढ़ गई, पर सवाल पूछने की आजादी की गलियां संकरी होती जा रही हैं।”

डिस्क्लेमर :-यह मात्र वैचारिक लेख है जहां व्यवस्था की विसंगतियों पर एक व्यंग्यात्मक ध्यानाकर्षण है। उद्देश्य केवल आइना दिखाना है।”






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