ना सूर्योदय, ना सूर्यास्त… बस आदमी कहीं शिकस्त, तो कहीं परास्त!
डिजिटल डेस्क -04 जुलाई 2026
“शुरुआत में ही एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है—यहाँ किसी ‘मैं’ का अहंकार नहीं है, बल्कि यह इस दौर का देखा और भोगा हुआ कड़वा सच है। लिखने वाले और भी हैं, इस दौर में बुद्धिजीवियों और महाज्ञानियों की कोई कमी नहीं है, जो किताबी बातें करते हैं, तकनीकी उलझनों को सुलझाते हैं या केवल शब्दों को सजाने-संवारने की कलाबाज़ी दिखाते हैं। मुमकिन है कि वे समाज की सिर्फ ऊपरी सतह को देख पाते हों। लेकिन ईमानदारी से बात कहने वाले, जो गहरे, बेबाक और ज़मीन से जुड़े विचार लेकर आ सकें… ऐसे लोग तो आज के दौर में बहुत ही कम, उंगलियों पर गिनने लायक बचे हैं।”
अंधेरे का भ्रम और उजाले की हकीकत
किताबों में लिखा है और ज़माने ने देखा है कि जिसे हम ‘अंधेरा’ कहते हैं, उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। अंधेरा केवल एक परिस्थितिजन्य घटना है, जबकि उजाला ही एकमात्र वास्तविकता है। सच तो यह है कि जहाँ उजाले का अभाव होता है, वहीं अंधेरा पैर पसारता है। जहाँ उजाले का प्रभाव होगा, वहाँ अंधकार टिक ही नहीं सकता। इसलिए जीवन में नकारात्मकता या निराशा से डरने की ज़रूरत नहीं है, वह केवल सकारात्मक सोच की कमी है। अपने भीतर उम्मीद का दीया जलाते ही भ्रम का हर अंधेरा खुद-ब-खुद गायब हो जाता है।
चरैवेति: सुख-दुख से परे निरंतर बहती जिंदगी
सच्चा राही न तो अंधेरे की चिंता करता है और न ही प्रकाश के वशीभूत होकर अपनी रफ्तार धीमी करता है। उसके लिए अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ मायने नहीं रखतीं। सुख मिले या दुख, वह तो बस चलता है, चलता है और चलता जाता है। यही जिंदगी का असली नाम है। परिस्थितियों के गुलाम बनने के बजाय कर्मयोगी की तरह हर हाल में आगे बढ़ते रहना ही इंसान को उसकी मंज़िल तक पहुँचाता है। जिंदगी ठहरने का नहीं, बल्कि निरंतर चलते रहने का नाम है।
गुलाब, कांटे और सियासत: संगति का कड़वा सच
दुनिया कहती आ रही है कि संगति का असर होता है, लेकिन ज़माने का तजुर्बा कुछ और ही गवाही देता है। एक ही डाल पर बबूल या गुलाब के साथ कांटे रात-दिन रहते हैं, पर कांटों को कभी गुलाब सा महकते नहीं देखा गया। कांटा चाहे बबूल का हो या गुलाब का, चुभने पर दर्द एक सा ही होता है। इस कांटों के जंजाल से दामन बचाकर निकल जाना ही समझदारी है। दुनिया की इस बनावटी अच्छाई यानी ‘फूलों की सियासत’ से कोई बेगाना नहीं है। इस दोगलेपन को पहचानकर अपनी मौलिकता बचाना ही असल सच है।
समय की उफनती नदी और गर्मियों का सन्नाटा
समय की धारा बड़ी तेज़ और निर्मम होती है। जिन नदियों में बारिश का पानी समाता नहीं और वे अहंकार में उफनती हुई अपनी मर्यादा भूल जाती हैं, वही नदियां गर्मियों के आते ही सूखी नज़र आती हैं और पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसती हैं। वक्त का यह चक्र हर किसी पर लागू होता है। कामयाबी या अच्छे दिनों के अति-उत्साह में उफनने के बजाय इंसान को हमेशा मर्यादित और ज़मीन से जुड़ा रहना चाहिए, क्योंकि समय बदलते देर नहीं लगती।
मरुस्थल के टीले जैसा: पैसा, रुतबा जैसे रेत की चाल
पैसा और रुतबा इस मरुस्थल में रेत के समान हैं। जब समय की हवाएं चलती हैं, तो रेत के टीले कभी इस तरफ बनते हैं तो कभी उस तरफ। हवा का एक झोंका बड़े से बड़े टीले को तोड़ देता है और छोटे टीले को बड़ा बना देता है। धन, पद और प्रतिष्ठा की नश्वर चाल को देखना हो, तो मरुस्थल की इस रेत को देख लीजिए। आज जो शिखर पर है, कल वह शून्य पर हो सकता है। इस अस्थायी रुतबे पर अहंकार करना नासमझी के सिवाय कुछ नहीं है।
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