योग पतंजलि चित्तवृत्ति निरोध की बात करते हैं, हम सेल्फी-वृत्ति विस्तार में लगे हैं
व्यंग्य डेस्क — 21/06/2026
आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। योग को अक्सर केवल शरीर को मोड़ने-बाँधने की क्रिया समझ लिया जाता है, जबकि भारतीय दर्शन में योग का अर्थ कहीं अधिक गहरा है। षड्दर्शनों में महर्षि पतंजलि का योग दर्शन मन, चित्त, वृत्तियों और आचरण के अनुशासन की बात करता है।
योग की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसके दार्शनिक आधार वेदों, उपनिषदों, भगवद्गीता और विशेष रूप से महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में मिलते हैं।
योग का उद्देश्य स्वयं पर विजय पाना है, दूसरों पर नहीं; अहंकार का क्षय करना है, उसका विस्तार नहीं। लेकिन हमारे समय का एक विचित्र व्यंग्य यह है कि जहां पतंजलि का योग मन को साधने का मार्ग बताता है, वहीं प्रजातंत्र का ‘राजयोग’ वोटों के महायोग से प्राप्त होता है।
“एक दिन का योग और 364 दिन का भोग”
इसका केंद्र योग दिवस, प्रदर्शनवाद और योग के वास्तविक दर्शन के बीच का अंतर है।
मुख्य विचार यह कि योग केवल आसन नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन है। यदि योग वर्ष में एक दिन का सार्वजनिक आयोजन बनकर रह जाए, तो वह साधना से अधिक प्रदर्शन बन जाता है।
जनता के एक-एक वोट से कोई व्यक्ति सत्ता के शिखर तक पहुंच जाता है, किंतु कई बार राजयोग मिलते ही वह यह भूल जाता है कि योग का पहला पाठ विनम्रता है।
“जिस देश में लोग इतिहास पढ़ने से अधिक प्रचार सुनते हों, वहाँ कभी-कभी माली को ही बगीचे का निर्माता समझ लिया जाता है।”
योग उत्सव और राजयोग अधिकार
“प्रजातंत्र में वोटों का महायोग राजयोग देता है, और योग दर्शन सिखाता है कि राजयोग मिलने के बाद भी अहंकार से बचना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि हम योग को उत्सव और राजयोग को अधिकार समझ बैठे हैं।
तब शेर बने चूहे की कथा जीवंत हो उठती है—रूप बदल जाता है, पद बदल जाता है, पर यदि चित्त, वृत्ति-प्रवृत्ति और चरित्र का रूपांतरण न हुआ तो योग केवल राजयोग बनकर रह जाता है, आत्मयोग नहीं।
शायद यही कारण है कि आज योग दिवस पर आसनों से अधिक आवश्यकता मन, वचन और आचरण के योग को समझने की है। क्योंकि जिसने स्वयं को साध लिया, उसे राजयोग की आवश्यकता नहीं रहती; और जिसने स्वयं को नहीं साधा, उसका राजयोग भी अधिक दिन नहीं टिकता।
एक दिन का योग
“यदि योग केवल 21 जून की सुबह का कार्यक्रम बनकर रह जाए, तो वह साधना नहीं, आयोजन है। योग तब है जब आसन समाप्त होने के बाद भी संयम, संतुलन और सजगता जीवन में बनी रहे। वरना एक दिन योग और बाकी 364 दिन भोग—यह पतंजलि का योग नहीं, हमारे समय का अभिनय है।”
बाकी 364 दिन का योग
“आज लाखों लोग योग किए होंगे, तस्वीरें खिंचवाएंगे और स्वास्थ्य का संदेश देंगे। प्रश्न यह नहीं है कि 21 जून को कौन कितना देर पद्मासन में बैठा? प्रश्न यह है कि 22 जून से वह अपने विचारों, वाणी और व्यवहार में कितना संतुलन रखता है। योग की असली परीक्षा मंच पर नहीं, दिनचर्या में होती है।”
योग का एक अर्थ जुड़ना है मगर ,किससे आज 1 दिन से या बाकी साल के 364 दिन से योग की सार्थकता तभी है जब सरकार, समाज और व्यक्ति नशा-पान से बचे और नशे का बहिष्कार करें कारोबार नहीं।
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