दिव्य-योग : ऋषि, चूहा और अहंकार का रहस्य एवं दर्शन
रविवारीय /लेख – 21 जून 2026
एक शांत वन में एक सिद्ध ऋषि निवास करते थे। उनके आश्रम में एक छोटा-सा चूहा भी रहता था। वह साधारण चूहा था, लेकिन उसका हृदय असाधारण था। जब ऋषि ध्यान में बैठते, वह उनके समीप चुपचाप बैठकर भजन और मंत्रों की ध्वनि सुनता। धीरे-धीरे उसके भीतर भी ईश्वर के प्रति प्रेम जागने लगा। वे
किन्तु संसार का भय उसके मन से नहीं गया था। बिल्ली की आहट, कुत्ते का भौंकना या आकाश में मंडराती चील उसे भयभीत कर देती। उसका जीवन निरंतर भय और असुरक्षा में बीत रहा था।
एक दिन ऋषि के हृदय में करुणा उमड़ पड़ी। उन्होंने सोचा, “यदि यह चूहा शेर बन जाए, तो इसका भय समाप्त हो जाएगा।”
अपनी योगशक्ति से उन्होंने चूहे को शेर बना दिया।
“ऋषि ने अपनी सिद्धि का प्रयोग कर चूहे को शेर का स्वरूप तो प्रदान किया, किंतु वे जानते थे कि बाहरी रूप बदलने से अंतःकरण नहीं बदलता।”
अब जंगल का दृश्य बदल गया। जो जीव कभी उसे डराते थे, वे स्वयं उससे डरने लगे। हर ओर उसका सम्मान होने लगा। वह जहां जाता, सब उसके आगे सिर झुकाते।
लेकिन एक बात नहीं बदली।
भीतर बैठा भय, असुरक्षा और अहंकार का बीज वहीं रहा। संसार में रूप बदलना सरल है, किंतु स्वभाव का रूपांतरण ही वास्तविक साधना है।”
ऋषि उसे पहले की तरह ही देखते रहे। वे जानते थे कि बाहर का रूप बदल गया है, पर भीतर का स्वभाव अभी भी चूहे का ही है।
यही बात शेर बने चूहे को चुभने लगी।
वह सोचने लगा, “सारा जंगल मुझे राजा मानता है, पर यह ऋषि आज भी मुझे चूहा समझते हैं। जब तक ये जीवित हैं, मेरी महानता अधूरी है।”
यहीं से उसके भीतर अहंकार का जन्म हुआ।अहंकारी के लिए योग साधना योग मार्ग समाज में खतरा पैदा करता है ।
धीरे-धीरे वह यह भूल गया कि उसकी शक्ति उसकी अपनी नहीं थी। वह भूल गया कि जिसे वह अपना वैभव समझ रहा है, वह किसी और की कृपा का परिणाम था।
एक दिन वह ऋषि को मारने के उद्देश्य से उनकी ओर बढ़ा।
ऋषि ने उसकी आंखों में उठते अहंकार को पढ़ लिया। वे मुस्कुराए और बोले—
“जिसे शक्ति मिली है, वह स्वयं को शक्तिशाली समझ बैठा। जिसने कृपा पाई है, वह स्वयं को कर्ता मान बैठा।”
अगले ही क्षण उन्होंने अपनी योगशक्ति से उसे पुनः चूहा बना दिया।
शेर समाप्त हो गया, चूहा शेष रह गया।
कहानी का दर्शन पक्ष क्या है। ऋषि का पात्र यह संकेत देता है कि सत्ता और अहंकार स्थायी नहीं होते। समय, सत्य, व्यवस्था, जनचेतना या प्रकृति—किसी न किसी रूप में वास्तविकता सामने आ ही जाती है।
योग और शक्ति
“योग हमें शेर बनने की शक्ति नहीं देता, बल्कि अपने भीतर छिपे चूहे जैसे भय, असुरक्षा, लोभ और अहंकार को पहचानकर उन पर विजय प्राप्त करना सिखाता है। बाहरी सामर्थ्य नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन ही योग का वास्तविक फल है।”
शक्ति और अहंकार
“समस्या यह नहीं है कि चूहा शेर बन गया। समस्या तब पैदा होती है जब वह अपनी जड़ों, अपने उपकारकों और अपनी सीमाओं को भूल जाता है। शक्ति, पद और अधिकार जब सेवा के बजाय अहंकार का साधन बन जाते हैं, तब जंगल राज की स्थिति बनती है।”
दार्शनिक दृष्टि
यह कहानी केवल चूहे और शेर की नहीं है, यह हर मनुष्य की कहानी है।
ईश्वर हमें धन, पद, सौंदर्य, ज्ञान, शक्ति और प्रतिष्ठा देता है। लेकिन जब हम इन उपहारों को अपनी उपलब्धि मान लेते हैं, तब अहंकार जन्म लेता है।
अहंकार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह हमें हमारी वास्तविकता से दूर कर देता है। हम भूल जाते हैं कि जो कुछ हमारे पास है, वह क्षणभंगुर है।
उपनिषदों का संदेश है—
“जो स्वयं को बड़ा समझता है, वह सत्य से दूर हो जाता है; और जो स्वयं को ईश्वर का साधन समझता है, वही ज्ञान के निकट पहुंचता है।”
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