लेख/आलेख – 08/05/2026
हम खाली हाथ आते हैं, पर एक धड़कता हुआ ‘दिल’ साथ लाते हैं। बचपन में यह दिल साफ होता है, इसे बस प्यार की भाषा समझ आती है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, समाज और दुनियादारी की दौड़ हमें ‘भौतिकता’ के बाजार में खड़ा कर देती है।
मासूमियत का विदाई समारोह
जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही हम दिल पर ‘चाहत’ का एक अदृश्य बोझ डालना शुरू कर देते हैं। जिसे हम ‘तरक्की’ या ‘दौलत’ कहते हैं, असल में वह दिल के ऊपर रखी गई एक ऐसी भारी ईंट है, जो उसकी स्वाभाविक धड़कन को दबा देती है।
चाहत की आह
इंसान की त्रासदी देखिए—दौलत की ‘चाह’ ही अंत में उसकी ‘आह’ बन जाती है। हम महल तो खड़ा कर लेते हैं, पर उस घर में सुकून से धड़कने वाला दिल कहीं खो जाता है। हमने अपनी चाहतों के महल इतनी ऊंचाइयों पर बना लिए हैं कि अब वहां तक दिल की आवाज पहुँच ही नहीं पाती।
वह राज, जो राज ही रह गया
पुरानी कहावतों में छिपा वह राज आज की पीढ़ी भूल चुकी है कि:
“दिल की नजर से, नजरों के दिल से, यह बात क्या है, यह राज क्या है… कोई हमें बता दे।”
“दिल की नजर से, नजरों के दिल से, यह बात क्या है, यह राज क्या है… कोई हमें बता दे।”
वह राज बड़ा सरल था—कि दिल देखने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए बना था। जब नजरें सिर्फ दौलत और रुतबा देखने लगें, तो दिल अंधा हो जाता है। हमें वापस उस दौर की ओर देखना होगा जहाँ इंसान की पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके दिल की अमीरी से होती थी।
छत्तीसगढ़ी अंचल में कहावत —
“सोना-चांदी तो कोठार में रह जाही, संग मा खाली मया और ये दिल के धड़कन जाही।” (सोना-चांदी तो कोठार में रह जाएगा, साथ में सिर्फ प्रेम और दिल की धड़कन जाएगी)।
एक सवाल मै करूं “क्या आज आपने अपने दिल से पूछा कि वह बोझ तले दबा है या सुकून में?”
दौलत की दौड़ में दिल को पीछे न छोड़ें।


