लेख/आलेख -25/04/2026(दीपक पाण्डेय)
अक्सर प्रेम को भावनाओं का सैलाब माना जाता है, लेकिन वास्तविकता में प्रेम एक उच्चतम डिप्लोमेसी (कूटनीति) है। यह वह कूटनीति नहीं जो स्वार्थ पर टिकी हो, बल्कि वह जो ‘बराबर के सम्मान’ पर स्थापित हो। जहाँ सम्मान की नींव नहीं होती, वहाँ प्रेम केवल एक क्षणिक आवेग बनकर रह जाता है।
लहरों का भ्रम और गहराई का सत्य
संसार एक लहर की तरह है—अस्थिर, शोर मचाती और सीमाओं से टकराती हुई। ये लहरें दरअसल एक अवरोध हैं, जो हमें गहराई में उतरने से रोकती हैं। जो व्यक्ति इन सतही हलचलों (अहंकार, ईर्ष्या और सामाजिक दिखावे) में उलझा रहता है, वह उस ‘तैरती हुई लाश’ के समान है जिसमें प्राण तो हैं पर गहराई नहीं। जीवन का असली आनंद तो उस गहराई में डूब जाने में है, जहाँ लहरों का शोर नहीं, बल्कि सत्य की गंभीरता होती है।
मौन: जीवन का आधार
जैसे-जैसे हम सतह को छोड़कर नीचे उतरते हैं, बाहरी हवाओं का प्रभाव समाप्त होने लगता है। हवाएँ पानी की सतह पर हलचल तो मचा सकती हैं, लेकिन वे सागर के अंतस्तल की शांति को भंग नहीं कर सकतीं। इस गहराई का अंतिम पड़ाव है—मौन। मौन केवल शब्दों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि वह आधार है जिस पर पूरी सृष्टि टिकी है। साधु-संतों और ऋषियों ने इसीलिए मौन की साधना पर बल दिया है, क्योंकि अंततः हर हलचल को इसी महा-मौन में विलीन होना है।
समाधि: परा-लौकिक मिलन
जब शांति इतनी प्रगाढ़ हो जाए कि सांसें थमने लगें और केवल धड़कनों की आहट सुनाई दे, तब इंसान ‘इंसान’ नहीं रहता। वह परा-लौकिक हो जाता है। मौन का यही अंतिम भाग समाधि है। यहाँ पहुँचकर प्रेमी और प्रेम, साधक और साध्य का भेद मिट जाता है। जिसे प्रेम का असली मोती चाहिए, उसे इन लहरों को चीरकर इस समाधि तक पहुँचना ही होगा।
लेख/निष्कर्ष
सृष्टि का सारा वैभव, सारा खनिज और जीवन की वर्षा उसी गहरे सागर से आती है जो ऊपर से शांत दिखता है। उसी प्रकार, एक समर्थ जीवन और सच्चा प्रेम वही है जो बाहरी शोर से अप्रभावित रहकर अपने भीतर के मौन और सम्मान को जीवित रखे।
चर्चा का सार:एक ऐसे दर्शन में छिपा है जहाँ प्रेम, कूटनीति और मौन एक बिंदु पर आकर मिल जाते हैं।स्व विचारों को समेटते हुए एक लेख प्रस्तुत है


