रायपुर, 07 मई 2026
कुष्ठ रोग — जिसे दशकों से सामाजिक कलंक और चिकित्सकीय चुनौती दोनों रूपों में देखा जाता रहा है — उसे जड़ से खत्म करने की मुहिम में आज रायपुर एक अहम पड़ाव बना। सर्किट हाउस, सिविल लाइन्स में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशाला महज एक सरकारी आयोजन नहीं थी, बल्कि यह उस व्यवस्था की परीक्षा भी थी जो कागज पर तो मजबूत दिखती है, लेकिन गांव-गांव तक पहुंचते-पहुंचते कहीं कमजोर पड़ जाती है।
प्रदेशभर से आए जिला कुष्ठ अधिकारी, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और WHO तथा ILEP जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधि एक ही मेज पर बैठे — और बात सिर्फ उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उन जमीनी अड़चनों की भी हुई जो आंकड़ों में नहीं दिखतीं।
असली चिंता: दवा का दुष्प्रभाव और रिपोर्टिंग की खाई
कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रहा फार्माकोविजिलेंस — यानी मल्टी ड्रग थेरेपी (MDT) के दुष्प्रभावों की निगरानी और रिपोर्टिंग। जानकारों के मुताबिक, मैदानी स्तर पर ADR यानी प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं की रिपोर्टिंग अब भी बेहद कमजोर है। मरीज दुष्प्रभाव झेलता है, लेकिन स्वास्थ्य कर्मी उसे दर्ज नहीं करते — और यही खामोशी इलाज की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती है।
AMR: वह खतरा जो दिखता नहीं, लेकिन बढ़ता है
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी AMR पर हुई चर्चा भी उतनी ही गंभीर रही। जब बैक्टीरिया दवाओं को मात देने लगें, तो कुष्ठ जैसी नियंत्रणीय बीमारी भी फिर से खतरनाक रूप ले सकती है। राष्ट्रीय रणनीतिक योजना 2023-27 के तहत इस पर निगरानी को लेकर प्रतिभागियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
क्षमता निर्माण: सिर्फ प्रमाण पत्र नहीं, जिम्मेदारी भी
दिनभर चले इस प्रशिक्षण के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र तो मिले, लेकिन विशेषज्ञों ने साफ कहा कि असली परीक्षा अब शुरू होती है — जब ये अधिकारी अपने-अपने जिलों में लौटकर इस ज्ञान को व्यवहार में उतारेंगे। रीजनल लेप्रोसी ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट और फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों ने तकनीकी पहलुओं पर जो मार्गदर्शन दिया, उसकी असली कसौटी जमीन पर होगी।
कुष्ठ उन्मूलन का लक्ष्य दूर नहीं, लेकिन रास्ता आसान भी नहीं है। रायपुर की यह कार्यशाला उस दिशा में एक सचेत कदम जरूर है।
कुष्ठ से जंग चुनौती या कलंक: रायपुर में जुटे विशेषज्ञ, जमीनी हकीकत पर मंथन


