नई दिल्ली _05/03/2026
पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद करने की खबरों के बाद भारत की अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।जलडमरूमध्य (Strait) पानी का एक ऐसा प्राकृतिक और संकरा मार्ग होता है, जो दो बड़े जल निकायों (जैसे महासागर या समुद्र) को जोड़ता है और दो बड़े भूभागों को अलग करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘ऑयल चोकपॉइंट’ है।वैश्विक आपूर्ति: दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20% और एलएनजी (LNG) का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।इस पर भारत की निर्भरता_ भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 40-50% और एलएनजी का 60% इसी समुद्री मार्ग के जरिए आयात करता है।
भारत पर क्या होगा असर?
यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो भारत को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
कीमतों में उछाल: कच्चे तेल की कीमतों में 10-15% की वृद्धि पहले ही देखी जा चुकी है, जिससे पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है।आपूर्ति में कमी: खाड़ी देशों (सऊदी अरब, इराक, यूएई) से आने वाला तेल रुक सकता है।महंगाई: परिवहन लागत बढ़ने से खाने-पीने की चीजों और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं।
रूस की ‘फ्रेंडली’ पेशकश: 95 लाख बैरल तेल
इस संकट के बीच भारत के पुराने मित्र रूस ने मदद का हाथ बढ़ाया है। तत्काल मदद: मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस लगभग 95 लाख (9.5 मिलियन) बैरल कच्चा तेल भारत भेजने को तैयार है। रास्ते में जहाज: रूसी तेल से लदे कई जहाज पहले से ही भारतीय समुद्री क्षेत्र के करीब हैं, जो अगले कुछ हफ्तों में भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच सकते हैं।डिस्काउंट की उम्मीद पर मौजूदा संकट को देखते हुए रूस भारत को रियायती दरों पर तेल की आपूर्ति जारी रख सकता है।
भारत की तैयारी: कितना है रिजर्व? सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत के पास किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त भंडार है। रणनीतिक भंडार पर बात करें तो भारत के पास लगभग 25 दिनों की खपत को पूरा करने के लिए कच्चे तेल का स्टॉक उपलब्ध है। विकल्पों की तलाश पर भारत अब खाड़ी देशों के अलावा रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से तेल आयात बढ़ाने पर विचार कर रहा है।
खबर निष्कर्ष: हालांकि स्थिति चुनौतीपूर्ण है, लेकिन रूस की मदद और भारत के अपने रणनीतिक भंडार फिलहाल एक ‘बफर’ का काम कर रहे हैं। यदि तनाव और बढ़ता है, तो सरकार को नए ऊर्जा समझौतों और घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं।


