चर्चा जन चौपाल 36 _03/02/2026
(स्थान: ज्योतिपति अपने बैठक में अखबार पढ़ रहे हैं और ज्वाला मोबाइल पर तेजी से खबरें स्क्रॉल कर रहा है)
ज्योतिपति: (चश्मा ठीक करते हुए) देखो ज्वाला, ये अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी बड़ी अजीब पहेली है। ईरान के सुप्रीमो खामेनेई की मौत की खबर ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। समझ नहीं आता कि ये अमेरिका, ईरान और इजरायल की उलझन आखिर खत्म कहाँ होगी? एक देश दूसरे की अर्थव्यवस्था और वजूद को मिटाने पर तुला है। येविदेश नीति आम आदमी की समझ से परे है।
ज्वाला: (आवेश में फोन मेज पर रखते हुए) ज्योतिपति जी, नीति अपनी जगह है, पर लोगों का गुस्सा देखिए! सोशल मीडिया पर एक वीडियो आग की तरह फैल रहा है—एक महिला खामेनेई की जलती तस्वीर से सिगरेट सुलगा रही है। तेहरान और कराज जैसे शहरों में तो जैसे लोग सड़कों पर जश्न मना रहे हैं। जहाँ तस्वीर जलाना मौत की सजा के बराबर हो, वहाँ ऐसा साहस… ये मामूली बात नहीं है!
ज्योतिपति: (धैर्य से) शांत हो जाओ ज्वाला, जज्बात में आकर खबर की गहराई नहीं भूलनी चाहिए। मैंने भी वो वीडियो देखा है। लेकिन तुम्हें पता है? रॉयटर्स की फैक्ट-चेक रिपोर्ट कहती है कि वो वीडियो ईरान का नहीं, बल्कि कनाडा का है। वो महिला ‘मोर्टिशिया एडम्स’ के नाम से सक्रिय है। उसने लिखा है— “मैंने कहा था ना कि तुम्हारी कब्र पर नाचेंगे!” विरोध प्रतीकात्मक है, पर इसकी जड़ें 2022 के ‘महिला, जीवन, स्वतंत्रता’ आंदोलन से जुड़ी हैं।
ज्वाला: (हैरानी से) मतलब वीडियो बाहर का है? पर ज्योतिपति जी, जश्न तो ईरान के अंदर भी मनाया जा रहा है। विपक्षी गुट इसे “बदलाव की शुरुआत” कह रहे हैं। उधर सरकारी मीडिया कह रहा है कि ये इजरायली और अमेरिकी हमलों का नतीजा है। अगर ये सच है, तो क्या ये युद्ध की शुरुआत नहीं है?
ज्योतिपति: (गंभीर होकर) युद्ध की आशंका तो है ही। होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और तेल की सप्लाई पर संकट मंडरा रहा है। लेकिन जरा अपने देश की तरफ भी नजर डालो।
पटाखा अमेरिका में फूट रहा है, लेकिन उसकी गूँज हमारे भारत की राजनीति में सुनाई दे रही है।
ज्वाला: (तंज कसते हुए) सही कह रहे हैं! हमारे यहाँ तो खामेनेई की मौत पर नई सियासत शुरू हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे साहब कह रहे हैं कि ये हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के खिलाफ है।
प्रियंका गांधी और ओवैसी साहब भी इसे अनैतिक बता रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता, हमारे नेताओं को दूसरे देश के मुद्दों पर इतनी बेचैनी क्यों होती है?
ज्योतिपति: (मुस्कुराते हुए) ज्वाला, राजनीति में हर बयान के पीछे एक बड़ा वर्ग और ‘वोट बैंक’ होता है। संजय सिंह कह रहे हैं कि भारत ने एक ऊर्जा सहयोगी और भरोसेमंद दोस्त खो दिया है। वहीं शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी का तर्क है कि खामेनेई सिर्फ नेता नहीं, शिया समुदाय के प्रमुख थे। यानी बात सिर्फ कूटनीति की नहीं, धार्मिक भावनाओं की भी है।
ज्वाला: (सोचते हुए) हम्म… तभी शायद कश्मीर में भी इतनी हलचल है। उमर अब्दुल्ला शांति की अपील कर रहे हैं और महबूबा मुफ्ती इसे इतिहास का “शर्मनाक मोड़” बता रही हैं। आखिर हम भी तो दुनिया का हिस्सा हैं, वहाँ जो होगा, उसका असर हम पर पड़ेगा ही।
ज्योतिपति: बिल्कुल सही पकड़े हो। आवेश से ज्यादा समझदारी की जरूरत है। ये मौत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट के समीकरणों के बदलने की आहट है। अब देखना ये है कि भारत सरकार इस नाजुक मोड़ पर क्या रुख अपनाती है।(खबर पर आधारित)


