बिलासपुर/छत्तीसगढ़_14/01/2026
छत्तीसगढ़ की शांत आबोहवा में धर्मांतरण का जहर जिस तेजी से घुल रहा है, वह अब केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुका है। बिलासपुर के मस्तूरी क्षेत्र के मल्हार में हाल ही में हुई पास्टर रामकुमार केवट की गिरफ्तारी ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, जिसे अक्सर ‘प्रार्थना सभा’ की चादर से ढंकने की कोशिश की जाती है।
चंगाई की आड़ में मानसिक प्रहार, अंधविश्वास को बढ़ावा
धर्मांतरण के इस पूरे खेल का सबसे डरावना पहलू है ‘मनोवैज्ञानिक दबाव’। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में जब कोई व्यक्ति बीमारी, पारिवारिक कलह या गरीबी से टूट चुका होता है, तब ये मिशनरी तत्व सक्रिय होते हैं। मल्हार की घटना इसका जीता-जागता उदाहरण है। छत पर बने हॉल में महिलाओं और युवतियों को इकट्ठा करना और उन्हें यह विश्वास दिलाना कि “विशेष प्रार्थना से पुरानी बीमारियां ठीक हो जाएंगी”, सीधे तौर पर उनके अंधविश्वास और लाचारी का फायदा उठाना है।
क्या सरकार की योजनाओं में वह दम नहीं है जो प्रलोभन और भौतिक लाभ के जाल में है।
सिर्फ आध्यात्मिक झांसा ही नहीं, बल्कि ‘भोजन और भौतिक सुख-सुविधाओं’ का लालच देकर धर्म परिवर्तन कराना यह दर्शाता है कि यह कृत्य आस्था से प्रेरित नहीं, बल्कि एक सुनियोजित एजेंडा है। छत्तीसगढ़ में आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनती ऐसी खबरें यह बताने के लिए काफी हैं कि सामाजिक संगठन भले ही सक्रिय हों और पुलिस कार्यवाही भी कर रही हो, लेकिन धर्मांतरण की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।
प्रशासन और समाज की दोहरी जिम्मेदारी
मल्हार चौकी पुलिस और डीएसपी लालचंद मोहले की त्वरित कार्यवाही सराहनीय है, लेकिन क्या केवल गिरफ्तारी ही समाधान है? सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्यों हमारा गरीब तबका इन प्रलोभनों का इतनी आसानी से शिकार हो जाता है?
सरकार की सख्त कदम की जरूरत
धर्मांतरण के इस संगठित ढांचे को तोड़ने के लिए केवल कानून का डंडा काफी नहीं है। समाज को जागरूक होना होगा और शासन को उन बुनियादी कमियों (स्वास्थ्य और शिक्षा) को दूर करना होगा, जिनका फायदा उठाकर ये तत्व लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ करते हैं। अगर आज “प्रार्थना सभाओं” के पीछे छिपे इन मंसूबों को नहीं पहचाना गया, तो आने वाले समय में यह सामाजिक समरसता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।


