जब तक समाज में पारदर्शिता की संस्कृति और जवाबदेही की चेतना नहीं बढ़ेगी, तब तक यह ‘दशावतार’ अपने नए रूपों में सामने आता रहेगा।
मेरा देश / आलेख_13/11/2025
जानकारी आधारित:_आज भारत में भ्रष्टाचार हर क्षेत्र—शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और राजनीति—में किसी न किसी रूप में मौजूद है। हाल की रिपोर्टों और शिकायतों से स्पष्ट है कि कई विभाग जनता के भरोसे की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे।
इस सूची में पुलिस विभाग को सबसे प्रमुख माना गया है—जहां न्याय की उम्मीद रखने वाले नागरिक कभी-कभी प्रक्रिया से अधिक पैसों के दांव पर खुद को खड़ा पाते हैं। उसके बाद राजस्व विभाग, जहां ज़मीन संबंधित रिकॉर्ड और नामांतरण जैसे कार्य अक्सर रिश्वत की जटिल परतों के नीचे दब जाते हैं।
नगर निगम और पंचायत स्तर के विभागों में योजनाओं की गड़बड़ियां, फर्जीवाड़े और अवैध निर्माण को लेकर भी लोगों के अनुभव समान रहे हैं। बिजली विभाग की बिलिंग व्यवस्था से लेकर आरटीओ की लाइसेंस प्रणाली तक—हर जगह ‘सेवा के बदले सुविधा शुल्क’ का बोलबाला आम जन के धैर्य की परीक्षा लेता है। स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा प्रणाली में भी जवाबदेही कम और व्यापारिक प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। शिक्षक भर्ती, दवा वितरण या अस्पताल में चिकित्सकीय सुविधा—सब कुछ व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।एक ओर जहां आवास और शहरी विकास विभाग पर निर्माण टेंडरों में अनियमितताओं के आरोप लगते हैं, वहीं कर-प्रणाली से जुड़े विभागों पर फर्जी रिटर्न और छापे के नाम पर दबाव की चर्चाएं आम हैं।
भ्रष्टाचार केवल अधिकारी वर्ग का विषय नहीं है। यह एक सामाजिक प्रवृत्ति बन चुका है—जहां बिचौलियों, स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों और नीतिगत ढिलाई की परतों ने इसे संस्थागत रूप दे दिया है। बढ़ती रकम और घटता विश्वास नागरिक व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बन रहे हैं।जब तक पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं बढ़ेगी, भ्रष्टाचार नए रूपों में बना रहेगा। नागरिक, मीडिया और प्रशासन को अब आत्ममंथन करना होगा, क्योंकि राष्ट्र का भविष्य नैतिक क्रियान्वयन पर निर्भर है, न कि केवल घोषणाओं पर।


