संतान की लंबी उम्र व परिवार की खुशहाली के लिए माताओं ने दिनभर व्रत रखकर की खमरछठ की पूजा
कबीरधाम/जनचौपाल36।
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार कमरछठ, जिसे हलषष्ठी भी कहा जाता है, 14 अगस्त को पूरे प्रदेश में धार्मिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। इस मौके पर गांव से लेकर शहर तक पूजा सामग्री की दुकानें सज गईं और बाजारों में रौनक देखने को मिली।
सुबह से ही व्रत रखने वाली माताएं उपवास में रहीं। परंपरा के अनुसार, इस दिन व्रतधारी महिलाएं पानी तक ग्रहण नहीं करतीं और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा करती हैं। शाम को सूर्य देव को जल अर्पित करने के बाद ही व्रत का समापन होता है।
व्रत का महत्व
जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में छठ पूजा को सूर्य उपासना का महापर्व माना जाता है, वैसे ही छत्तीसगढ़ में कमरछठ संतान के कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। परंपरा है कि विवाहित और नवविवाहित महिलाएं यह व्रत रखती हैं—कुछ संतान की प्राप्ति के लिए, तो कुछ संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए।
ग्राम पंचायत पंवरजली में विशेष आयोजन
जिला कबीरधाम की ग्राम पंचायत पंवरजली में इस अवसर पर भव्य आयोजन हुआ, जिसमें महिलाओं ने सामूहिक रूप से व्रत-पूजन कर अपनी संतानों के मंगल की प्रार्थना की। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि मातृत्व के अटूट प्रेम और समर्पण का जीवंत उदाहरण भी है।
पूजन विधि
इस पर्व की पूजा विधि बेहद रोचक और पारंपरिक है। महिलाएं घर या सामूहिक स्थल पर आंगन में दो गड्ढे खोदती हैं, जिन्हें सगरी कहा जाता है। पूजा के लिए मिट्टी से बने खिलौने, बैल, शिवलिंग, गौरी-गणेश आदि लाए जाते हैं और सगरी के किनारे सजाए जाते हैं।
सगरी में बेलपत्र, भैंस का दूध, दही, घी, फूल, कांसी के फूल, श्रृंगार का सामान, लाई और महुए के फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद व्रतधारी महिलाएं हलषष्ठी माता की कुल छह कथाएं सुनती हैं और आरती के साथ पूजा संपन्न करती हैं।


