कोरबा, छत्तीसगढ़।
कोरबा जिले के सबसे बड़े शासकीय पीजी कॉलेज में 1.49 करोड़ की लागत से बन रहा 400 सीटों वाला ऑडिटोरियम बीते 10 वर्षों से अधूरा है। वर्ष 2016-17 में शुरू हुए इस निर्माण कार्य में अब तक तीन बार सीलिंग गिर चुकी है, फिर भी अब तक ऑडिटोरियम कॉलेज को हैंडओवर नहीं किया गया है।
डीएमएफ फंड से निर्मित हो रहा यह ऑडिटोरियम कोरबा का पहला कॉलेज ऑडिटोरियम है, जिसकी निर्माण एजेंसी नगर पालिक निगम है। निर्माण की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं—विद्युतीकरण का बजट निर्माण के बाद स्वीकृत हुआ, बैठने की व्यवस्था की कोई प्लानिंग नहीं की गई, और बार-बार की मरम्मत के बावजूद आज भी भवन अधूरा है।
कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि अधूरा निर्माण और गिरती सीलिंग की वजह से वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। इस कारण कॉलेज की सांस्कृतिक गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं।
पूर्व में डीएमएफ से जुड़ी अनियमितताओं पर ईडी द्वारा की गई जांच में भी गंभीर खुलासे हो चुके हैं। इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट में जवाबदेही तय नहीं की गई है।
इससे पहले रिसदी रोड स्थित लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ऑडिटोरियम की छत गिरने पर दो इंजीनियर निलंबित हुए, जबकि कॉलेज ऑडिटोरियम में ऐसी घटनाएं तीन बार हो चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य है।
10 सालों से निर्माणाधीन, फिर भी प्रशासन उदासीन
कॉलेज प्रबंधन और छात्रों की बार-बार की मांग के बावजूद 10 वर्षों से यह ऑडिटोरियम अधूरा पड़ा है। यह कोई ऐतिहासिक किले का निर्माण नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक संस्थान में उपयोगी सांस्कृतिक मंच है, जिसकी जरूरत हर कार्यक्रम में महसूस की जाती है। कोरबा के इतने बड़े कॉलेज में, जहां निरंतर शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती हैं, वहां एक आधारभूत सुविधा को अब तक नजरअंदाज किया जाना गंभीर लापरवाही का संकेत है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन को इस दिशा में जवाबदेही तय नहीं करनी चाहिए?
कोरबा पीजी कॉलेज का ऑडिटोरियम 10 साल बाद भी अधूरा, तीन बार गिर चुकी है सीलिंग


