“मेरा जीवन मेरा दर्शन’
मिडिल ईस्ट तनाव/ जनचौपाल36-26/04/2026
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया तनाव के उपक्रम में इस्लामाबाद में शांति की जो उम्मीद जगी थी, वह एक बार फिर औंधे मुंह गिर गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का पाकिस्तान दौरा और उसके बाद वार्ता की मेज पर अमेरिकी प्रतिनिधित्व का न पहुंचना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की उस गहरी खाई को दर्शाता है, जहाँ ‘संवाद’ से अधिक ‘अहंकार’ का बोलबाला है। यह घटना केवल एक कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक खतरनाक संकेत है।
वार्ता क्यों फेल हुई और इसके दूरगामी परिणाम?
कूटनीति का मूल मंत्र ‘प्रत्यक्ष संवाद’ (Direct Dialogue) है। लेकिन जब ईरान और अमेरिका जैसे देश सीधे बात करने के बजाय तीसरे पक्ष (जैसे पाकिस्तान) के माध्यम से अपनी शर्तें रखने की जिद करते हैं, तो गलतफहमियों की गुंजाइश बढ़ जाती है।
ईरान का यह कहना कि ‘अमेरिका थोपा हुआ युद्ध कर रहा है’, और अमेरिका का इस वार्ता प्रक्रिया से दूरी बनाना, यह स्पष्ट करता है कि दोनों पक्षों के पास अभी भी कोई ‘कॉमन ग्राउंड’ नहीं है। यदि यह गतिरोध जारी रहता है, तो होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) का बंद होना केवल एक आर्थिक संकट नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए ‘अकाल’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी कि इस जंग से 3 करोड़ लोग गरीबी की चपेट में आ सकते हैं, किसी भी संवेदनशील राष्ट्र को विचलित करने के लिए पर्याप्त है।
युद्ध के बाद शांति क्यों?
इतिहास गवाह है कि युद्ध की विभीषिका के बाद ही शांति का रास्ता खुलता है, लेकिन तब तक लाखों जानें जा चुकी होती हैं और अर्थव्यवस्थाएं राख हो चुकी होती हैं। सवाल यह है कि जब अंत में शांति ही एकमात्र विकल्प है, तो युद्ध के पहले उसे अपनाने में क्या बाधा है? अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ‘अहं’ का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यदि दोनों देश बैठकर बात कर लें, तो हो सकता है कि कई वैश्विक समस्याओं का समाधान बातचीत से ही निकल जाए।
आगे की राह
शांति वार्ता का विफल होना यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं (जैसे संयुक्त राष्ट्र) अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं। यदि महाशक्तियाँ अपने छोटे से क्षेत्रीय लाभ या वर्चस्व के लिए युद्ध को प्राथमिकता देंगी, तो मानवता केवल एक आंकड़ा बनकर रह जाएगी। कूटनीति में कमी का अर्थ है—संवेदनशीलता का अभाव। ईरान और अमेरिका को यह समझना होगा कि युद्ध से किसी की भी जीत नहीं होती, बल्कि केवल विनाश का स्तर तय होता है।
वर्तमान में, विश्व को ‘युद्धोन्माद’ नहीं, बल्कि ‘शांति वार्ता’ के एक ऐसे नए युग की आवश्यकता है जहाँ टेबल पर हथियारों की जगह तर्कों को रखा जाए। अन्यथा, इतिहास हमें एक ऐसे युग के रूप में याद रखेगा जहाँ हमने अपनी आँखों के सामने दुनिया को जलते हुए देखा और उसे बचाने के लिए सिर्फ ‘बातें’ कीं।
विशेष:शांति का रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। यह विकल्प ही एकमात्र रास्ता है जो मानवता को तबाही से बचा सकता है।”


