आध्यात्म डेस्क – 06 जुलाई 2026
घाट के पत्थर और ‘प्यास’ का दर्शन
“अगर जीवन में बिना प्यास के रहना है तो घाट के पत्थर बन जाओ।”
वैज्ञानिक व दार्शनिक राय पर आधारित यह लेख पंक्ति बहुत गहरा है क्योंकि जहां पानी है वहां गहराई तो होगी ही।
विज्ञान की भाषा में कहें तो ठोस (पत्थर) के भीतर अणु इतने मजबूती से बंधे होते हैं कि वे खुद में बदलाव नहीं चाहते, वे स्थिर हैं, तटस्थ हैं। लेकिन नदी का पानी (द्रव) निरंतर गतिशील है, उसमें जीवन है, प्रवाह है।
अगर इंसान बिना किसी इच्छा, बिना किसी ‘प्यास’ (जिज्ञासा या भावना) के रहेगा, तो वह जड़ यानी पत्थर जैसा हो जाएगा। जीवन का आनंद तो नदी की तरह बहने में और वर्षा की बूंदों को महसूस करने में है।
ठोस और द्रव का संबंध: बारिश, शिव और शक्ति
“सृष्टि का निर्माण तीन द्रव्यों से हुआ है… जिसमें ठोस और द्रव का संबंध बहुत प्रबल है।”
वैज्ञानिक व दार्शनिक राय:
विज्ञान भी मानता है कि पृथ्वी पर जीवन तभी संभव हुआ जब ‘ठोस’ (धरती/चट्टान) और ‘द्रव’ (पानी) का मिलन हुआ।
शक्ति (सृजन):
बारिश का पानी ऊर्जा और जीवन का प्रतीक है, जो सूखी धरती को हरा-भरा करता है। यह ‘शक्ति’ है।
शिव (संतुलन):
अगर केवल बारिश ही होती रहे, तो प्रलय आ जाएगी। लेकिन धरती के पहाड़ और चट्टानें (ठोस) उस वेग को संभालती हैं, नदियों को रास्ता देती हैं। यह ‘शिव’ यानी संतुलन है।
विज्ञान
विज्ञान की नजर से देखें तो यह जल चक्र (Water Cycle) और पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) है, जिसे हमने बहुत ही सुंदर तरीके से ‘शिव-शक्ति’ का संतुलन कहा है।
अब बात करते है गैस की,जिसके लिए रामायण में तुलसीदास ने लंका दहन हनुमान प्रकरण में कहा है ‘चले मरुत उनचास’ और गैस रूप ” 49 गैस.. इसकी खोज धर्म ने कर ही लिया था।”
वैज्ञानिक व दार्शनिक राय:
वेदों और रामायण में वर्णित ’49 मरुत’ (हवा के प्रकार) और आज के विज्ञान में बहुत समानता है। विज्ञान कहता है कि हमारे वायुमंडल में केवल एक हवा नहीं है, बल्कि नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी कई गैसों की परतें हैं, और गति के आधार पर चक्रवात, व्यापारिक पवनें (Trade Winds), और जेट स्ट्रीम जैसी विभिन्न हवाएं चलती हैं।
सनातन बोध ने इसे ‘मरुत गण’ के रूप में बहुत पहले पहचान लिया था।
अब गैस है तो उसकी दुनिया भी होगी उसका एक प्रबल स्त्रोत भी होगा,
सूर्य केवल गैसों का लावा है?
“सूर्य पर धरातल नहीं होगी केवल गैसों का लावा हो सकता है…”मेरे विचार
वैज्ञानिक राय:
यह विचार वैज्ञानिक रूप से बिल्कुल सटीक है! विज्ञान ने यह प्रमाणित किया है कि सूर्य पर कोई ठोस धरातल (जमीन) नहीं है।
सूर्य मुख्य रूप से हाइड्रोजन (लगभग 74%) और हीलियम (लगभग 24%) गैसों से बना है।
अत्यधिक तापमान और गुरुत्वाकर्षण के कारण वहाँ ये गैसें सामान्य रूप में नहीं हैं, बल्कि वे ‘प्लाज्मा’ (गैसों का अत्यंत गर्म, आवेशित और खौलता हुआ रूप, जिसे हम गैसों का लावा कह रहे हैं) के रूप में हैं।
तो यह धारणा विज्ञान के बिल्कुल अनुकूल है।मिट्टी की गंध और वर्षा की फुहार से उपजा विचार ,आषाढ़ के दिन और बारिश की रिमझिम का एक अनूठा अहसास से है, जो धरती के कण-कण को तृप्त करता है।


