ब्रह्म अद्वैत है — न स्त्री, न पुरुष; न प्रकृति, न ईश्वर।
न दिन, न रात; न प्रकाश, न अंधकार — केवल अस्तित्व अमर।
रविवार _26/10/2025_जनचौपाल 36
दीपावली केवल दीयों की उत्सव_मय चमक नहीं है—यह स्वयं के भीतर के अंधकार को पहचानने और उसे प्रकाश में रूपांतरित करने की साधना है। जब भीतर का दीप जलता है, तब ही बाहर का उत्सव सार्थक होता है।
शरीर जड़ है, अंधकार है, क्योंकि वह संसार से बंधा हुआ है क्योंकि जहां अंधकार है वही संसार है हम आते तो अंधकार से प्रकाश में है इसलिए चिल्लाते हैं रोते हैं। अब उसकी गति बाहरी है। इंद्रियों का आकर्षण और संसार की आसक्ति उसे निरंतर चक्र में बांधते हैं। इसके विपरीत चेतना प्रकाश है—स्वतंत्र, अचल, शाश्वत। वह देखती है, पर स्वयं देखी नहीं जा सकती। यही आत्मा है, वही अलौकिक ज्योति जो कभी नहीं बुझती पर वह एक दिव्य पुंज बन शरीर को गहरे अंधकार में छोड़ चली जाती है।
पर प्रश्न उठता है—चेतना और शरीर,अंधकार और प्रकाश साथ कैसे रहते हैं? जब एक आता है तो दूसरा नष्ट क्यों नहीं होता? शायद क्योंकि यह एक ही सत्ता के दो आयाम हैं—जैसे सागर की तरंग और गहराई। शरीर बिना चेतना के केवल मिट्टी है; पर चेतना भी बिना शरीर के अनुभव का रंग नहीं भरती। यही योग का रहस्य है—जहां प्रकाश और अंधकार का संगम होता है, जहां सीमित और असीम मिलते हैं।
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय
जब मन निर्मल होता है, तब आत्मा का प्रकाश उसमें सहज प्रकट होता है। आत्मा साक्षी भाव से मन को देखती है, और मन उस साक्षी का दर्पण बन जाता है। जैसा मन का उजाला, वैसा ही जग का उजियारा — भीतर का प्रकाश ही बाहर की सौंदर्यता को जन्म देता है।
अस्वीकरण:_यह कथन स्व_व्याख्या हेतु है, किसी धार्मिक या दार्शनिक मत का अंतिम निर्णय नहीं समझें ना ही कोई विवाद का विषय वस्तु है।


