आध्यात्मिक डेस्क/ 18 जून 2026
जो रास्ता जानता है वही अकेले चल सकता है जैसे कि संत अकेला चलता है और आम आदमी भीड़ में खोये रहता है क्योंकि भीड़ को रास्ता पता नहीं है कहां जाना है,वह भीड़ का अनुसरण करता है ।लेकिन कबीर ने कहा है
ऐसी गति संसार की ज्यूँ गाडर की ठाठ,
एक पड़ा जेहिं गाड में,सबै जाही तेहि बाट।।
अब वह तो नहीं है लेकिन भीड़ उनके तरफ बढ़ रही है।
संत को पता है कहां जाना है,भीड़ को नहीं??
लेकिन आज के समय में भीड़ के बिना आदमी अकेला है।लोगों को भीड़ चाहिए नेता राजनेता और प्रवचन-कर्ता सब भीड़ देख के प्रवचन (पर – वचन)भाषण देते है।
जिसे मंज़िल पता है, वो अकेला चलने से डरता नहीं।
संत का रास्ता भीतर का है — उसे पता है कहाँ जाना है, इसलिए भीड़ की तालियाँ नहीं चाहिए। वो चल देता है, चाहे कोई साथ हो या न हो। जैसे कबीर कह गए: साधो, राह दोऊ खड़ी… जिसने राह देख ली, वो रुकता नहीं।
आम आदमी को रास्ता पता नहीं, तो वो भीड़ में सेफ महसूस करता है। सब जिधर जा रहे हैं, उधर ही ठीक होगा — ये सोचकर चल देता है। भीड़ में अकेलापन नहीं खलता, मगर मंज़िल भी नहीं मिलती।
और नेता-राजनेता का खेल तो भीड़ से ही है।
संत भीड़ के बिना भी संत है, पर नेता भीड़ के बिना कुछ नहीं।
इसलिए मंच लगता है, माइक लगता है, नारे लगते हैं। भीड़ है तो भाषण है, भीड़ नहीं तो अस्तित्व नहीं।
मज़े की बात देखो — संत को भीड़ चाहिए नहीं, पर भीड़ को संत चाहिए।
नेता को भीड़ चाहिए, और भीड़ को भी नेता चाहिए।
एक को रास्ता पता है (अपनी सीट कैसे सुरक्षित करना है) दूसरे को रास्ता दिखाने वाला चाहिए मतदान कैसे करें!!??
तुलसीदास ने भी लिखा :
क्योंकि उस समय उसे भी समझ नहीं आया या कुछ कहना नहीं चाहा ,क्योंकि देश उस समय मुगलों के अधीन था।
तुलसी इस संसार में, भाँति भाँति के लोग,उसने तो नदी और नाव जैसे मिलकर रहने कहा जिससे लहर के थपेड़ो में डूबने की समस्या न रहे क्योंकि एक ही नाव चलाने वाला रहता है बाकी भीड़ तो उसी के सहारे सवार है।
कुछ अकेले चलकर रास्ता बनाते हैं, कुछ भीड़ के पीछे चलकर रास्ता ढूंढते हैं।
विचार बीज को मत मारो, बस नई शाखा उगा दो।
यही शब्द का संसार है, यही विचार का संसार है।एक आइडिया रास्ता बताता है, एक आइडल मंजिल दिखाता है, पर चलना तो अकेला ही पड़ता है — वही जिंदा रहने की शर्त है।


