कोलकाता/नई दिल्ली:28/04/2026
पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है, लेकिन इसकी गूँज अभी भी चुनावी गलियारों में तनाव पैदा कर रही है। टीएमसी सांसद के साथ हुई मारपीट और झड़प की हालिया घटनाओं ने एक बार फिर बंगाल की चुनावी संस्कृति पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब गेंद जनता के पाले में है, जो कल बूथों के बाहर लंबी कतारों में खड़ी होकर राज्य का भविष्य तय करेगी।
देश के एक जागरूक नागरिक की नजर से देखें तो यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि रणनीति, अस्मिता और विकास के दावों की एक गहरी समीक्षा है।
बीजेपी 2.0: ‘दीदी’ से ‘भतीजे’ की ओर मुड़ा निशाना
2021 के विधानसभा चुनावों ने बीजेपी को यह सिखा दिया कि बंगाल में ‘व्यक्ति’ से ज्यादा ‘भावना’ काम करती है। उस समय “दीदी… ओ दीदी” के तंज ने ममता बनर्जी के पक्ष में सहानुभूति की लहर पैदा कर दी थी। 2026 के इस रण में बीजेपी की रणनीति में सर्जिकल स्ट्राइक जैसे बदलाव दिखे हैं:
सॉफ्ट टारगेट शिफ्ट: इस बार निशाने पर ममता बनर्जी कम और अभिषेक बनर्जी (भतीजा) ज्यादा हैं। ‘भतीजावाद’ को मुद्दा बनाकर बीजेपी सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को एक चेहरे पर केंद्रित कर रही है।
अस्मिता का ओवरहॉल:’जय श्री राम‘ के उद्घोष के साथ-साथ अब मां काली और दुर्गा की स्तुति प्रमुख है। पीएम मोदी के मंच का ‘दक्षिणेश्वर मंदिर’ जैसा दिखना यह बताता है कि पार्टी अब खुद को “बाहरी” के टैग से मुक्त कर “स्थानीय” साबित करना चाहती है।
सांस्कृतिक जुड़ाव: हिलसा मछली, झालमुड़ी और स्मृति ईरानी का धाराप्रवाह बंगाली बोलना—ये महज चुनावी स्टंट नहीं, बल्कि टीएमसी के ‘माटी-मानुष’ वाले किले में सेंध लगाने की कोशिश है।
चुनौतियां और नागरिक का नजरिया
जहाँ राजनीतिक दल अपनी बिसात बिछा चुके हैं, वहीं एक जागरूक मतदाता के मन में कई गंभीर सवाल हैं:पक्ष_विपक्ष मुख्य मुद्दे के साथ जागरूक नागरिक की चिंता |
TMC बंगाल की अस्मिता, लक्ष्मी भंडार योजना, माटी-मानुष। भ्रष्टाचार के आरोप और चुनावी हिंसा पर नियंत्रण।
BJP परिवर्तन, भ्रष्टाचार मुक्ति, सोनार बांग्ला। क्या स्थानीय संस्कृति को अपनाना सिर्फ चुनावी दिखावा है?
जनता की सोच रोजगार, सुरक्षा और शांतिपूर्ण मतदान।क्या वोटिंग के दिन सुरक्षा की गारंटी मिलेगी? |
एक नजर बंगाल चुनाव परिदृश्य पर
2021 में बीजेपी ने ताकत दिखाई थी, लेकिन 2026 में वह सूझबूझ दिखाने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस अपनी ‘बंगाली पहचान’ और ‘कल्याणकारी योजनाओं’ के भरोसे अपनी सत्ता को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
बड़ी बात:बंगाल का मतदाता खामोश रहकर चौंकाने के लिए जाना जाता है। क्या बीजेपी का यह ‘सांस्कृतिक हृदय परिवर्तन’ बंगालियों के दिल में जगह बना पाएगा? या फिर ममता बनर्जी का ‘अस्मिता कार्ड’ एक बार फिर कमल को कीचड़ में ही रोक देगा?
कल जब मतदाता वोट डालने निकलेंगे, तो उनके हाथ में सिर्फ एक बटन नहीं, बल्कि बंगाल के अगले पांच साल की शांति और प्रगति की चाबी होगी।
क्या आपको लगता है कि बीजेपी का ‘बंगाली बाबू’ अवतार और अभिषेक बनर्जी पर केंद्रित हमला 2021 के नतीजों को पलटने में कामयाब होगा?


