न्यूज डेस्क (व्यंग्य लेख)- 18 सितंबर 2026
बहुत दिनों बाद ज्योतिपति और ज्वाला मिले,सवाल दीया का था।
ज्योतिपति:तनिक सुनो ज्वाला! कल देश के प्रधानमंत्री जी का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया गया। प्रधानमंत्री हैं, लंबे समय से इस पद पर रहने का रिकॉर्ड उनके नाम है, बधाई-शुभकामनाएं तो पूरा देश देगा ही। इसमें गलत क्या है?
ज्वाला: बधाई देने में कोई बुराई नहीं है ज्योतिपति! जी मैं इसी बात पर आपसे चर्चा करने आया हूं?पर मेरी आंखें तो उस रोशनी को देखकर ठिठक गईं जो हर तरफ बिखेरी गई। लाखों दिए जलाए गए—स्वास्थ्य केंद्र, शिक्षा संस्थान, सचिवालय, सब जगमगा उठे। मुझे तो प्रधानमंत्री जी की पुरानी बात याद आ गई, जब उन्होंने कहा था कि ‘तेल कम इस्तेमाल करना भी देश सेवा है’। तो क्या ये वही बचा हुआ तेल था जो कल एक ही रात में दिए जलाकर स्वाहा कर दिया गया?
ज्योतिपति: (मुस्कुराते हुए) अरे, दिए से क्या बैर? रोशन भारत तो सबको अच्छा लगता है!
ज्वाला: दिए से विरोध नहीं है ज्योतिपति, ना ही जन्मदिन की खुशी से कसक है। विरोध उस सोच और तरीका बताने वाले सलाहकारों से है जो अंदर अंधेरा होते हुए भी बाहर रोशनी करने का झुनझुना थमा देते हैं। जब देश में दिल बुझे पड़े हों, तो बाहर लाख दिए जला लो, क्या मिलेगा? चिराग तो दिल में जलाने की ज़रूरत है, वहां बहुत अंधेरा है,आज हर दिल उलझन में है।
ज्योतिपति: (चौपाल की लकड़ी की बेंच पर हाथ मारते हुए) बात तो खरी है। आज कौन सा वर्ग शांत है? युवा, व्यापारी, किसान, वकील, सामान्य नागरिक—सब सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। युवाओं के दिल में सिस्टम के प्रति जो चिंगारी लगी है, उसे शांत करने की जगह ये चमकदार दिखावे की राजनीति चल रही है।
ज्वाला: बिल्कुल! ‘ऋणम कृत्वा घृतम पीबेत’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है—कर्ज लो और ऐश करो। आज भारत दुनिया में सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाले देशों में अव्वल नंबर (2025)है। अगर दिए ही जलाने थे, तो उन अमर शहीदों की याद में जलते या नीट परीक्षा के तनाव में जान गंवाने वाले उन मासूम परीक्षार्थियों की आत्मा की शांति के लिए जलते, जिनके परिवार आज भी आंसू बहा रहे हैं।
ज्योतिपति: कर्ज का यही तो चक्कर है ज्वाला! आम जनता को तो ये भी नहीं पता कि जिस विश्व बैंक से इतना कर्ज लिया जा रहा है, उसके नियम क्या कहते हैं। जैसे हमारे यहां आपातकाल में बैंकों का पैसा सीज हो सकता है, वैसे ही अगर विश्व बैंक की समय-सीमा में कर्ज न चुकाया जाए या विश्व युद्ध छिड़ जाए—जो कि आज दुनिया के हालात दिख ही रहे हैं—तो उस कर्ज और ब्याज दर के क्या कड़े नियम लागू होंगे?
ज्वाला: बस यही सवाल पूछ लो तो लोग कहते हैं कि आम जनता को राजनीति और विदेश नीति पर बोलने का क्या अधिकार? अरे, जब कर्ज का बोझ आम जनता की जेब पर पड़ना है, तो सवाल पूछना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार क्यों नहीं?
ज्योतिपति _तुम्हारा विचार पूरी तरह से वाजिब और लोकतांत्रिक हैं। एक आम नागरिक को देश की आर्थिक नीति, कर्ज और फिजूलखर्च पर चर्चा करने का पूरा अधिकार है।
(राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य)