34.3 C
Raipur
Friday, June 5, 2026

पुस्तकें: ज्ञान, संस्कृति और चेतना का अमर स्रोत

Must read

पुस्तक दिवस विशेष_24/04/2026

पुस्तकों का महत्व(23/04/2026)

पुस्तकों में लिखे शब्द केवल अक्षर नहीं होते — वे विचारों की वह लौ हैं जो दिमाग में कौंधकर जीवन को बदलने की शक्ति रखते हैं। कभी सुकून देते हैं, कभी शांति और कभी-कभी एक पूरी क्रांति को जन्म दे देते हैं। यही कारण है कि सदियों से पुस्तकें मानव सभ्यता की सबसे विश्वसनीय साथी रही हैं।

प्राचीन भारत और पुस्तकालयों की विरासत

हमारी प्राचीन संस्कृति में पुस्तकों का स्थान अत्यंत गौरवशाली रहा है। पौराणिक ग्रंथ और पांडुलिपियाँ इसके जीवंत प्रमाण हैं। नालंदा का विश्वविख्यात पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ इसी गौरव का प्रतीक था। इतिहास साक्षी है कि खिलजी ने जब उस पुस्तकालय में आग लगाई, तो वह आग तीन से छह महीने तक धधकती रही — इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वहाँ ज्ञान का कितना विशाल भंडार संचित था। विश्व में टॉल्स्टॉय की लाइब्रेरी भी अपने समय में बहुत प्रसिद्ध हुई।

विश्व पुस्तक दिवस — 23 अप्रैल
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 1995 से प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस मनाया जाता है। इसे पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस भी कहा जाता है। इस दिवस के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं — पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करना। प्रकाशन उद्योग को बढ़ावा देना कॉपीराइट के प्रति जागरूकता फैलाना

आज के युग में जागरूक और सोचने वाले पाठकों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, इसलिए इस दिवस का महत्व और भी बढ़ जाता है।

डिजिटल युग में पुस्तकों की स्थिति
आज का दौर मोबाइल और डिजिटल माध्यमों का है। युवाओं की पुस्तकों के प्रति घटती रुचि चिंता का विषय अवश्य है। दो-तीन दशक पहले शहरों में अनेक पुस्तकालय थे जो पाठकों से भरे रहते थे, किंतु समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ी और कई पुस्तकालय तथा साहित्यिक पुस्तकों की दुकानें बंद हो गईं। शहरों में ग्रंथालय धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं — यह एक गंभीर सांस्कृतिक क्षति है।

पुस्तक प्रेम — एक उज्ज्वल तस्वीर
हालाँकि, यह भी उतना ही सत्य है कि पुस्तकों के प्रति प्रेम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। भारत पुस्तक प्रकाशन में विश्व में छठे स्थान पर है और अंग्रेजी साहित्य के प्रकाशन में अमेरिका के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। यह गर्व की बात है।

वर्ष 2025 में पुणे में आयोजित नौ दिवसीय पुस्तक महोत्सव में लगभग 13 लाख पुस्तक प्रेमियों ने भाग लिया और 50 करोड़ रुपये से अधिक की पुस्तकों की बिक्री हुई — जो एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है। दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में भी पाठकों की भारी भीड़ ने यह सिद्ध किया कि पुस्तकों का आकर्षण आज भी बरकरार है।

विशेष
पुस्तकें किसी भी समाज की बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना की पहचान होती हैं। जब तक मनुष्य में जिज्ञासा है, पुस्तकों की प्रासंगिकता बनी रहेगी। आवश्यकता इस बात की है कि हम नई पीढ़ी में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करें, पुस्तकालयों को पुनर्जीवित करें और ज्ञान की इस अमर परंपरा को आगे बढ़ाएँ।

एक अच्छी पुस्तक वह है जो बीज की तरह बोई जाती है और विचारों की फसल उगाती है।”


- Advertisement -spot_img

More articles

- Advertisement -spot_img

Latest article