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Friday, June 5, 2026

देशभर में ट्रांसपोर्ट संकट का असर गहराया, 95 लाख ट्रकों में से करीब 20% के पहिए थमे होने का दावा”

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जनचौपाल36-संवाद/27 मई 2026

स्थान: एक व्यस्त हाईवे के किनारे ढाबा, जहाँ दूर-दूर तक ट्रकों की लंबी कतारें खड़ी हैं।

ज्वाला सिंह:आक्रोश और यथार्थ से भरे हुए, व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाने वाले।
ज्योतिपति: शांत, दार्शनिक, गहरी तार्किक समझ और दूरगामी दृष्टि रखने वाले।

ज्वाला सिंह: (दूर तक खड़ी ट्रकों की कतारों को देखकर, माथे पर हाथ रखते हुए) ज्योतिपति जी, यह दृश्य देख रहे हैं? देश की धमनियां रुक गई हैं! डीजल की आपूर्ति क्या बाधित हुई, लगभग 19 से 20 लाख ट्रकों के पहिये जाम हो गए। देश के कुल ट्रकों का 20 प्रतिशत हिस्सा सड़कों से गायब होकर किनारे खड़ा हो गया है। मुझे यह समझ नहीं आता कि कोई भी समस्या क्या अचानक ही प्रकट होती है और आते ही इतनी भयानक हो जाती है? हमारे देश के नीति नियंता, वो बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाने वाले कर्णधार आखिर किस कोने में बैठकर समाधान ढूंढ रहे हैं?

ज्योतिपति: (शांत भाव से चाय की चुस्की लेते हुए) ज्वाला सिंह, समस्या कभी अचानक नहीं आती। बीज बहुत पहले बोया जाता है, संकट तो बस उसका अंकुरण है। जब थोक (Bulk) और खुदरा (Retail) कीमतों में ₹30 से ₹50 का अंतर आ गया, तभी तय हो गया था कि संतुलन बिगड़ेगा। जो बड़ी फैक्ट्रियां और बसें पहले थोक में डीजल खरीदती थीं, वे अब आम जनता के रिटेल पेट्रोल पंपों पर लाइन लगा रही हैं। नतीजतन, असली हकदार—जो ट्रक चालक हैं—उन्हें ईंधन के लिए 6 से 8 घंटे का इंतज़ार करना पड़ रहा है।

ज्वाला सिंह: (तैश में आते हुए) वही तो मैं कह रहा हूँ! अब सोचने वाली बात यह है कि इस विकट परिस्थिति में वो निर्णायक व्यक्ति कौन होगा, जिसकी आज इस देश को सबसे ज्यादा ज़रूरत है? विडंबना देखिए, आज कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। हालात वक्त से पहले बदतर होने लगे हैं। अभी तो कुल 95 लाख ट्रकों में से सिर्फ 20 फीसदी खड़े हुए हैं, अगर आगे की सप्लाई भी ऐसे ही बाधित रही, तो स्थिति कितनी भयानक होगी, इसकी कल्पना करके भी रूह कांप जाती है।

ज्योतिपति: तुम्हारी चिंता जायज है, ज्वाला। जिम्मेदारी का अभाव ही इस समय का सबसे बड़ा संकट है। जब व्यवस्था में ‘क्रेडिट’ यानी उधार बंद हो जाता है, तो सबसे पहले छोटे ट्रांसपोर्टर्स की कमर टूटती है। तेल कंपनियों ने हाथ खींच लिए, पंपों ने उधार देना बंद कर दिया। ट्रक चलाने की कुल लागत का 45% हिस्सा अकेले डीजल का होता है। अब जब वर्किंग कैपिटल (नकद पैसा) ही खत्म हो गया, तो छोटे मालिक ट्रक खड़े करने के अलावा और क्या करें?

ज्वाला सिंह: (व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ) और वो चेहरे कहाँ गायब हैं ज्योतिपति जी, जो देश की जनता को ‘अच्छे दिन’ के हसीन सपने दिखाया करते थे? आज जब संकट सामने खड़ा है, तो वो सब नेपथ्य में चले गए हैं। अब देश के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को खुद सामने आकर यह सच्चाई स्वीकार करनी पड़ रही है कि देश अभी एक बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। और कहाँ छिपे हैं वो बड़े-बड़े अर्थशास्त्री जो कल तक सरकार को विकास के शिखर पर चढ़ा रहे थे? आज जब हालात को संभालने की बात है, तो वो यह बताने आगे क्यों नहीं आ रहे कि इस दलदल से बाहर कैसे निकला जाए?

ज्योतिपति: (गंभीर होते हुए) अर्थशास्त्र जब केवल कागजी आंकड़ों में सिमट जाता है ज्वाला, तब जमीन की हकीकत ऐसी ही दिखाई देती है। यह सच है कि संकट पूरी तरह देश ने पैदा नहीं किया है। पश्चिम एशिया में, विशेषकर ईरान से जुड़े तनाव के कारण भू-राजनीतिक उथल-पुथल मची है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं। तेल कंपनियां घरेलू स्तर पर घाटा (Under-recovery) सह रही हैं और ‘कंजर्वेशन मोड’ में चली गई हैं। यह एक वैश्विक आपदा है, इसमें कोई दो राय नहीं… लेकिन सवाल तो व्यवस्था पर ही उठेगा न?

ज्वाला सिंह: (बात काटते हुए) बिल्कुल उठेगा! वैश्विक तनाव अपनी जगह है, लेकिन हमारी आंतरिक व्यवस्था पर पहले ध्यान क्यों नहीं दिया गया? जब आपको पता था कि बादल घिरे हैं, तो छतरी का इंतजाम क्यों नहीं था? अब जबकि हालात नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं, तब हमें समस्या का कारण नहीं, बल्कि उसका ठोस निदान जानना है!

ज्योतिपति: (सामने हाईवे की तरफ देखते हुए) निदान ही सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके दूरगामी असर बेहद डरावने हैं। छत्तीसगढ़ के बैलाडीला जैसे माइनिंग प्रोजेक्ट्स ठप पड़ रहे हैं, उत्तर से लेकर पश्चिमी भारत के व्यापारिक गलियारों तक माल ढुलाई बंद है। नेशनल हाईवे पर खड़ी ये कतारें सिर्फ ट्रकों की नहीं हैं, ये आने वाली महंगाई की कतारें हैं। अगर यह स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो फल, सब्जियां, राशन और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। आम आदमी की थाली पर इसका सीधा प्रहार होगा।

ज्वाला सिंह: (गहरी सांस लेते हुए) यानी तमाशा नीति नियंताओं का, और भुगतना देश की आम जनता को पड़ेगा। अब वक्त आ गया है कि खोखले दावों से हटकर कोई ठोस और निर्णायक कदम उठाया जाए, वरना यह आर्थिक चक्का पूरी तरह जाम हो जाएगा।

ज्योतिपति: (सहमति में सिर हिलाते हुए) सत्य कहा ज्वाला। जब तक दूरदर्शिता को नीति का आधार नहीं बनाया जाएगा, तब तक देश को ऐसे ही नाजुक दौर से गुजरना पड़ेगा। निदान की शुरुआत जिम्मेदारी स्वीकार करने से ही होती है।(मीडिया जानकारी पर)

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