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Friday, June 5, 2026

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया संकट: दुनिया पर कर्ज का बोझ जीडीपी के 100 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली -17 अप्रैल, 2026

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की ताजा ‘फिस्कल मॉनिटर’ रिपोर्ट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया पर कर्ज का बोझ इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि साल 2029 तक यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 100 प्रतिशत के स्तर को छू सकता है। यह एक ऐसी खतरनाक स्थिति है जो सामान्यतः युद्ध काल के बिना नहीं देखी जाती। आंकड़ों के लिहाज से कर्ज का यह स्तर आखिरी बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दर्ज किया गया था।

वर्तमान में, साल 2025 तक वैश्विक ऋण जीडीपी के लगभग 94 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, और आने वाले वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि दुनिया साल भर में जितना उत्पादन करेगी, उतना ही उस पर कर्ज का बकाया होगा।

इस संकट के पीछे प्रमुख कारण भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को माना जा रहा है। युद्ध की विभीषिका के कारण तेल और गैस की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है, जिससे दुनिया भर की सरकारों का वित्तीय गणित बिगड़ गया है। जनता को महंगाई की मार से बचाने के लिए सरकारों को अतिरिक्त सब्सिडी देनी पड़ रही है, जिसके लिए वे कर्ज लेने को मजबूर हैं।

इसके अलावा, महंगाई पर लगाम लगाने के लिए केंद्रीय बैंकों द्वारा बढ़ाई गई ब्याज दरों ने आग में घी डालने का काम किया है। ऊंची ब्याज दरों के कारण सरकारों के लिए पुराना कर्ज चुकाना और नया ऋण लेना, दोनों ही महंगा हो गया है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में ब्याज भुगतान का हिस्सा 2% से बढ़कर 3% हो गया है, जो विकास कार्यों के बजट में कटौती कर रहा है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है। केंद्रीय बजट 2026-27 के आंकड़ों के अनुसार, सरकार के कुल व्यय का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा केवल पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है। वहीं, घरेलू स्तर पर मध्यम वर्गीय परिवारों की बचत पिछले एक दशक के निचले स्तर पर पहुंच गई है। आय में स्थिरता और बढ़ती महंगाई के बीच अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड जैसे महंगे कर्ज के जाल में फंस रहे हैं।

पर्सनल लोन में 20.1 प्रतिशत की वृद्धि इस वित्तीय अस्थिरता का स्पष्ट संकेत है। यद्यपि 2025 के अंत में महंगाई दर में कुछ कमी देखी गई थी, लेकिन अप्रैल 2026 तक थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में उछाल और ऊर्जा आयात की बढ़ती लागत ने महंगाई के फिर से बेकाबू होने का डर पैदा कर दिया है। अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक हालात जल्द नहीं सुधरे, तो दुनिया को एक बड़े वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।(राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय खबरों पर आधारित)

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