26.6 C
Raipur
Wednesday, August 12, 2026

लाइफस्टाइल या ‘डेथ-स्टाइल’: नशे की गिरफ्त में भविष्य, खुद को आईना दिखाती सरकारें

Must read

डिजिटल डेस्क, 17 अप्रैल 2026

आज के दौर में जिसे हम ‘आधुनिक लाइफस्टाइल’ का नाम दे रहे हैं, वह धीरे-धीरे ‘विनाश-स्टाइल’ में बदलती जा रही है। समाज में आदतों पर अंकुश लगाने की शक्ति क्षीण होती जा रही है। हमारी आदतें केवल व्यवहार नहीं, बल्कि हमारे विचारों की पोषक होती हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि आज विकास की चकाचौंध में हम विनाश की जड़ों को सींच रहे हैं।

नशे की ‘नई पहचान’ बनती महिलाएं और युवाताजा आंकड़ों और सामाजिक सर्वेक्षणों की मानें तो देश में नशे का पैटर्न खतरनाक रूप से बदला है।

युवा शक्ति का क्षरण:रिपोर्टों के अनुसार, देश के लगभग 35% से 40% युवा किसी न किसी रूप में नशे (सिगरेट, शराब से लेकर सिंथेटिक ड्रग्स तक) के जाल में फंसे हैं। कॉलेज कैंपस से लेकर छोटे शहरों की गलियों तक ‘रेव पार्टी’ और ‘ड्रग कल्चर’ एक स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है।

महिलाओं में बढ़ता ग्राफ: सबसे चौंकाने वाली बात महिलाओं की नशे की ओर बढ़ती प्रवृत्ति है। पिछले पांच वर्षों में नशा करने वाली महिलाओं की संख्या में 15% से 18% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। आज शराब की दुकानों पर महिलाओं की कतारें और बीयर-बार में उनकी मौजूदगी को ‘आजादी’ का गलत पैमाना माना जा रहा है।

सरकार की आय बनाम समाज का स्वास्थ्य
एक तरफ सरकार ‘स्वस्थ समाज और सशक्त नारी’ का नारा बुलंद करती है, वहीं दूसरी ओर सरकार की आय का एक बड़ा हिस्सा शराब और नशीले पदार्थों के व्यापार से आता है।

आय का केंद्र: क्या समाज का स्तर इतना गिर गया है कि तंत्र चलाने के लिए हमें नशे के व्यापार पर निर्भर होना पड़ रहा है? गांजा, अफीम, प्रतिबंधित टैबलेट्स और सिंथेटिक ड्रग्स का बाजार पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे फल-फूल रहा है।

नशा मुक्ति केंद्र या सरकारी विफलता: जगह-जगह खुल रहे नशा मुक्ति केंद्र असल में सरकारों के लिए एक आईना हैं। इन केंद्रों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि सरकारें नशे की आपूर्ति रोकने में विफल रही हैं और अब केवल उपचार का ढोंग कर अपना चेहरा छिपाने की कोशिश कर रही हैं।

जब ‘जननी’ ही नशे की गिरफ्त में हो…

समाज की केंद्र बिंदु महिला होती है, जो सृष्टि का आधार और संस्कारों की जननी है। आज जब महिला आरक्षण की पुरजोर वकालत हो रही है, तब यह सवाल पूछना लाजिमी है कि क्या नशे में लड़खड़ाती नारी शक्ति एक स्वस्थ भविष्य का निर्माण कर पाएगी? रेव पार्टियों का बढ़ता चलन और सार्वजनिक रूप से बढ़ता नशा इस बात का संकेत है कि समाज का ‘आधार’ ही अब डगमगा रहा है।

निष्कर्ष: आदतों पर अंकुश जरूरी

आदतें दो ही तरह की होती हैं—अच्छी या बुरी। अच्छी आदतें हमें उन्नति के मार्ग पर ले जाती हैं, जबकि बुरी आदतें (विशेषकर नशा) हमें अंधकार की ओर धकेलती हैं। यदि हमें एक स्वस्थ समाज बनाना है, तो केवल नारों से काम नहीं चलेगा। सरकारों को अपनी वित्तीय नीतियों और समाज को अपनी जीवनशैली (Lifestyle) पर पुनर्विचार करना होगा।

बड़ा सवाल: क्या हम वास्तव में विकास कर रहे हैं, या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ नशा ही हमारी पहचान बन जाएगा? जब तक नशे की जड़ों पर प्रहार नहीं होगा, तब तक नशा मुक्ति केंद्रों में सरकारों को अपना डरावना चेहरा ही नजर आएगा।

- Advertisement -spot_img

More articles

- Advertisement -spot_img

Latest article