मानवी शोर से प्रकृति आवरण का फटना: जल और हमारा कल
डिजीटल डेस्क 05 जून 2026
जब हम प्रकृति के इस भाषाई और आध्यात्मिक आवरण को पूरी तरह फाड़ देते हैं, तब हम उस क्रूर धरातल पर पहुँचते हैं जहाँ हम अपने ही जीवन के आधार को नष्ट करने लगते हैं।
जल का महा-रहस्य: अथाह सागर की पुकार
हम जन सभा में आख्यान माला में कहते हैं “जल है तो कल है।” (Save water 💦 save life)पर क्या यह केवल एक उद्बोधन है या हमारे भीतर की कोई गंभीर चेतना? जो हमें जगाने की कोशिश करती है।हमने जल संरक्षण की दिशा में वास्तव में कितना आत्मिक काम किया है?
हम मंचों पर चिल्लाते हैं—”जल है तो कल है।” पर यह केवल एक नारा बनकर रह गया है। हमने जल संरक्षण की दिशा में वास्तव में कितना आत्मिक काम किया है? सागर के पास अथाह जल राशि है, पर वह खारा है। प्रकृति उस खारे पानी को भी अपनी तड़प से मीठा बनाकर बादलों के रूप में हमें सौंपती है, ताकि हमारा अस्तित्व बचा रहे। यह प्रकृति का वह आवरण है जो हमें जीवन देता है।
लेकिन जब मनुष्य इस आवरण को फाड़कर जल स्रोतों को नष्ट करता है, प्रकृति को प्रदूषित करता है, तो वह वास्तव में खुद को आत्मघाती रूप से नग्न कर रहा होता है।
खारा ही तो सहारा है
सागर जीवन का आदि-स्रोत है। लेकिन वह जल खारा है, जिसे हम सीधे ग्रहण नहीं कर सकते। प्रकृति उस खारे पानी को भी अपनी तड़प (धूप और वाष्पीकरण) से मीठा बनाकर बादलों के रूप में हमें सौंपती है।
लहरों का शोर नहीं ,भविष्य की चेतावनी
सागर की लहरों का वह शोर दरअसल हमें यह चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने जल के इस चक्र को, प्रकृति के इस आदिम व्याकरण को नहीं समझा, तो शांत दिखने वाला यह महासागर जब बवंडर बनेगा, तो मानव का यह कृत्रिम शोर हमेशा के लिए शांत हो जाएगा।
लहरों को सिर्फ देखिए मत, उन्हें सुनिए। उनके शोर में ही सृष्टि के संरक्षण का सबसे बड़ा रहस्य छिपा है।
प्रकृति आदमी और अंहकार
विचार की शुरुआत में ही हमने ‘आवरण‘ और ‘मानव के अहंकार’ की बात रख दी थी, जिससे अध्यात्म, भाषा और पर्यावरण—तीनों उसी अहंकार के अलग-अलग रूप में लगने लगे हैं।भाषा के अहंकार से अध्यात्म का खोखलापन और उससे पर्यावरण की तबाही को एक स्वाभाविक कड़ियों में जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
निष्कर्ष
यह लेख न केवल अध्यात्म पर है, न केवल पर्यावरण पर और न केवल भाषा पर यह एक स्व विचार पर है एक दृष्टांत है जिसमें चलने के लिए दो पग जमीन और मुट्ठी भर हिस्से का आमसान जो “बंद मुट्ठी लिए पैदा हुआ था वही शामिल है।
यह लेख मनुष्य के उस अहंकार पर है जो प्रकृति के सुंदर आवरण को नष्ट कर रहा है। सागर की लहरों का वह शोर दरअसल हमें यह चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने समय रहते इस आदिम व्याकरण को नहीं समझा, तो शांत दिखने वाला यह महासागर जब अपना रुद्र रूप दिखाएगा, तो मानव का यह कृत्रिम शोर हमेशा के लिए शांत हो जाएगा।
लेख डेस्क 5 जून 2026
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