बाहरी दिखावे, विज्ञान की अंधी दौड़ और मानवीय रिश्तों के खोखलेपन पर ध्यान केंद्रित करें।
आईना/लेख/ 28 मई 2026
दुनिया बसाने का सपना बनाम स्वार्थ का यथार्थ
हम दुनिया को बताने नहीं, बल्कि एक सुंदर दुनिया बसाने आए हैं—वह दुनिया जहाँ सादगी हो, सौंदर्य हो, असीम आनंद और सच्ची खुशियाँ हों। लेकिन हकीकत क्या है?
हम तो समय के साथ सब में शामिल रहे, सबके होकर जिए; लेकिन आज मुड़कर देखें तो मन में एक ही टीस उठती है कि “हमारा कौन?” इतनी बड़ी दुनिया, इतने सारे लोग, और अंत में सवाल सिर्फ वही बचता है—”हम आपके हैं कौन?” यहाँ चारों तरफ सिर्फ स्वार्थ के रिश्ते हैं, मतलब की दोस्ती-यारी है। हर कोई बस अपनी आवश्यकता की पूर्ति में लगा है, और शायद इसी का नाम आज की ‘दुनियादारी’ रख दिया गया है।
भ्रम का संसार:
सबसे बड़ा भ्रम तो यह है कि जो नहीं है, वह हमें दिखाई देता है; और जो वास्तव में है, उसे हम देख ही नहीं पाते। हम अपने आसपास के उस परिवेश का ध्यान नहीं रखते जहाँ हम सांस लेते हैं, लेकिन हमारी आँखें चांद, तारे, मंगल और अन्य ग्रहों की खोज में लगी हैं।
- पत्थरों को आपस में टकराकर आग जलाने वाला इंसान आज न्यूक्लियर बटन पर हाथ रखकर बैठा है, लेकिन उसके भीतर का ‘डर और आक्रामकता’ (Aggression) रत्ती भर भी कम नहीं हुई।
- कांटा-छुरी से आलीशान होटल में खाना खाने वाला उदाहरण इस बात का प्रतीक है कि हमने केवल अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर ‘शिष्टता’ (Sophistication) का मुलम्मा चढ़ाया है, उन्हें रूपांतरित (Transform) नहीं किया।
- “
- चौखट बदल गई, पर आईना वही है।” यह इस बात की ओर इशारा करता है कि जब तक मनुष्य का आंतरिक विकास (Internal Evolution) नहीं होगा, तब तक बाहरी तौर पर हम कंक्रीट के कितने ही जंगल खड़े कर लें, वह केवल ‘बदलाव’ होगा, ‘प्रगति’ नहीं।


