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Wednesday, July 22, 2026

महिला दिवस पर सुप्रीम कोर्ट की राय सिर्फ वकील नहीं, अब `जज` बनें महिलाएं

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महिला दिवस पर CJI ने दिया समानता का मंत्र ।सुप्रीम कोर्ट में आयोजित “इंडियन वूमेन इन लॉ” के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर की महिला जजों और वकीलों ने हिस्सा लिया।

मार्च_09/03/2026

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत शर्मा ने न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि महिलाएं केवल वकालत तक सीमित न रहें, बल्कि आगे बढ़कर न्यायाधीश बनने की दिशा में भी कदम बढ़ाएं। इससे न्याय व्यवस्था और अधिक संतुलित तथा मजबूत बनेगी।
नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिला वकील किसी विशेष रियायत की मांग नहीं कर रहीं, बल्कि वे लंबे समय से लंबित निष्पक्ष और उचित प्रतिनिधित्व चाहती हैं।

उन्होंने उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम से आग्रह किया कि योग्य महिला वकीलों के नामों पर न्यायाधीश पद के लिए नियमित रूप से विचार किया जाए।यह विचार भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आयोजित ‘इंडियन वूमेन इन लॉ’ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में व्यक्त किए गए। इस सम्मेलन में देशभर की महिला जजों और वकीलों ने भाग लिया और न्यायिक क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका तथा चुनौतियों पर चर्चा की।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं को कानून की पढ़ाई और प्रैक्टिस करने के अवसर सीमित थे, लेकिन आज स्थिति में काफी बदलाव आया है। इसके बावजूद न्यायपालिका और न्यायिक पेशे में महिलाओं की समान भागीदारी का लक्ष्य अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है।

कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बी वी नागरत्ना ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अदालतों में कई बार महिलाओं को अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन उनकी भागीदारी बढ़ने से न्याय प्रणाली अधिक समावेशी बनेगी।

उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों के पैनल वकीलों में कम से कम 30 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही अदालतों की कॉजलिस्ट समय पर जारी करने जैसे कदमों से महिला वकीलों को पेशे और परिवार के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।

सम्मेलन में यह भी बताया गया कि जिला न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है और वर्तमान में लगभग 37 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी महिलाएं हैं। इसे न्यायिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का दृष्टिकोण पर न्यायपालिका में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से न केवल संस्थागत संतुलन मजबूत होगा, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के दृष्टिकोण को भी न्यायिक निर्णयों में बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।

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