प्रेम कोई सौदा नहीं,कोई शर्त नहीं,कोई अधिकार नहीं।प्रेम एक उत्कृष्ट भाव है—जो देने से बढ़ता है,समर्पण से पवित्र होता है,और विस्तार से अमर बनता है।यदि आज का प्रेम फिर से उस मूल भाव से जुड़ जाए,तो नफरत अपने आप समाप्त हो जाएगी।क्योंकि प्रेम का स्वभाव ही है—सृजन, संरक्षण और समरसता।
वेलेंटाइन’स डे/14/02/2026
जहां दो दिल एक साथ धड़कें,जहां प्रेम पूरा न होने तक भी धड़कता रहे—वही सच्चा प्रेम है।और जब प्रेम पूर्ण होता है, तो दो जिस्म एक जान बनते हैं,और सृष्टि में एक नई जान का आगमन होता है।यही वह क्षण है जहां प्रेम व्यक्तिगत सीमा से निकलकर सृजनात्मक शक्ति बन जाता है।
प्रेम का विस्तार : व्यक्ति से परिवार, समाज और राष्ट्र तक। के
प्रेम जितना सीमित होता है, उसका प्रभाव उतना ही क्षीण हो जाता है।लेकिन जब वही प्रेम—परिवार का रूप लेता है
समाज में जिम्मेदारी बनता है और राष्ट्रहित से जुड़ जाता है
तो वह प्रेम अद्वितीय बन जाता है।
एक युवक-युवती का प्रेम जब विवाह में बदलता है,
फिर परिवार में,और फिर समाज में योगदान देता है—
तभी सृष्टि को दिशा और गति मिलती है।
आध्यात्मिक और ऐतिहासिक प्रेम
प्रेम केवल रोमांटिक नहीं होता।
आध्यात्मिक प्रेम में भी उसकी पराकाष्ठा दिखती है—
जहां भक्ति, आस्था और आत्मसमर्पण होता है।
प्रेम वह भी है जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा कर देता है,
जो आत्मसम्मान और सत्य के लिए बलिदान की प्रेरणा देता है।
प्रेम सर्वत्र है, फिर नफरत कहां से आई?
ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसने प्रेम का सामना न किया हो।
प्रेम कभी कविता में बहता है,कभी पूजा में,कभी किसी प्रतिमा के सामने नतमस्तक होकर।हम मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर बनाते हैं—अदृश्य शक्ति की खोज में।वास्तव में यह भी प्रेम की ही पराकाष्ठा है।तो फिर प्रश्न उठता है—
प्रेम से भरे इस संसार में नफरत के बीज किसने बोए?
क्या परिस्थितियों ने?या हमने स्वयं अपने स्वार्थ, अहंकार और अधैर्य से?


