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Saturday, March 7, 2026

दर्शन/तर्क में प्रेम : तब, अब और आगे — एक उत्कृष्ट भाव की यात्रा

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एक चेतना एक जागरण जहां साधन नहीं साधना सर्वोत्तम है।

वेलेंटाइन डे:14/02/2026

प्रेम मानव जीवन की सबसे उत्कृष्ट और मौलिक भावना है। इस भावना के सामने अन्य सभी भाव गौण प्रतीत होते हैं। क्योंकि यह केवल एक मानवीय अनुभूति नहीं, बल्कि सृष्टि की आधारशिला है। प्रेम से ही सृजन हुआ, प्रेम से ही जीवन को गति मिली और प्रेम से ही सभ्यता ने आकार लिया।

प्राचीन दृष्टि में प्रेम केवल आकर्षण नहीं था, वह समर्पण, अर्पण और त्याग का नाम था। ईश्वर ने जब एक नर और एक नारी की रचना की, तो उनके बीच प्रेम उत्पन्न हुआ और उसी प्रेम से सृष्टि का विस्तार हुआ। यह तथ्य लगभग सभी धर्मों और दर्शन में स्वीकार्य है।
उस काल में प्रेम पूजा के समान था।

जैसे पूजा में पहले प्रसाद अर्पित किया जाता है और फिर उसे ग्रहण किया जाता है—वैसे ही प्रेम में पहले देने का भाव आता था, पाने की इच्छा बाद में।यही कारण है कि धर्मों में नारी को सृष्टि आदर्श स्वरूप माना गया।प्रेम वहां अधिकार नहीं, आदर था।

आधुनिक प्रेम : अभिव्यक्ति या अधिग्रहण?
आज के समय में प्रेम का स्वरूप बदलता दिखाई देता है। आधुनिक प्रेम में प्रदर्शन अधिक और समर्पण कम होता जा रहा है।

जहां प्रेम का प्रदर्शन सुंदर हो, वहां वह कला है—
लेकिन जहां प्रदर्शन शर्तों से जुड़ जाए, वहां प्रेम प्रोडक्ट और कस्टमर के रिश्ते में बदल जाता है।
आज का प्रेम अक्सर कहता है
मैंने इज़हार किया है, अब तुम्हें इकरार करना ही होगा।”
यहीं से प्रेम एकतरफा अधिकार बन जाता है, जबकि सच्चा प्रेम दो दिलों में एक साथ जन्म लेता है—जैसे पौधे में एक साथ कली और पुष्प फूटते हैं।






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