मकर संक्रांति विशेष_15/01/2026
खगोलीय विज्ञान और उत्तरायण
वैज्ञानिक दृष्टि से जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तो उसे ‘मकर संक्रांति’ कहते हैं। इस दिन से सूर्य ‘उत्तरायण’ हो जाते हैं, जिसका अर्थ है पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध का सूर्य की ओर झुकना। इससे दिन लंबे होने लगते हैं और प्रकाश की अवधि बढ़ जाती है। यह अंधकार से प्रकाश और जड़ता से चेतना की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
भीष्म पितामह: संकल्प और ब्रह्मचर्य की पराकाष्ठा
इस पर्व का सबसे प्रेरणादायक आध्यात्मिक पक्ष भीष्म पितामह से जुड़ा है। आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले भीष्म को ‘इच्छा मृत्यु’ का वरदान प्राप्त था। महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन के बाणों से बिंधकर जब वे ‘शर-शय्या’ (बाणों की शय्या) पर लेटे थे, तब सूर्य दक्षिणायन में था।
ब्रह्मचर्य और योग बल के धनी पितामह ने उस भीषण पीड़ा में भी अपने प्राणों को रोके रखा। उन्होंने दक्षिणायन में शरीर त्यागना उचित नहीं समझा, क्योंकि शास्त्रों में उत्तरायण को मोक्ष का मार्ग माना गया है। जैसे ही मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण हुए, उन्होंने अपनी इच्छा से प्राण त्याग कर निर्वाण प्राप्त किया। यह घटना दर्शाती है कि एक अनुशासित और ब्रह्मचारी मन प्रकृति की शक्तियों पर भी विजय प्राप्त कर सकता है।
प्रकृति और दान का संदेश
हिंदुस्तानी संस्कृति प्रकृति पूजक है। हमारे वेद प्रकृति से और उपनिषद दर्शन से जुड़े हैं। मकर संक्रांति पर तिल, गुड़ और खिचड़ी का सेवन न केवल स्वास्थ्य (विज्ञान) के लिए लाभकारी है, बल्कि यह नई फसल का उत्सव भी है। वर्ष 2026 में 15 जनवरी को सूर्य देव की उपासना और पवित्र नदियों में स्नान कर हम उसी ऊर्जा को नमन करते हैं, जो भीष्म जैसे महापुरुषों के संकल्प का आधार थी।


