नई दिल्ली: 17/12/2025
प्रख्यात अर्थशास्त्री और आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक बार फिर भारतीय शिक्षा और रोजगार की दुखती रग पर हाथ रखा है। उनका ताजा बयान उन करोड़ों युवाओं के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो केवल डिग्री को ही सफलता की गारंटी मान बैठे हैं। राजन ने दो टूक कहा है कि भारत जिस “डिग्री संस्कृति” के पीछे भाग रहा है, वह भविष्य के आर्थिक संकट की नींव रख रही है।
शिक्षित बेरोजगारी का खतरा
राजन के विश्लेषण के केंद्र में एक ही बात है— “हुनर की कमी”। उन्होंने आगाह किया कि भारत में डिग्रियां तो बांटी जा रही हैं, लेकिन वास्तविक कार्यक्षमता (Employability) गायब है। उनके अनुसार, “सिर्फ कागजों पर ग्रेजुएट होना आपको नौकरी नहीं दिलाएगा। दुनिया बदल रही है और अब बाजार को ‘सर्टिफिकेट’ नहीं, बल्कि ‘सॉल्यूशन’ देने वाले लोग चाहिए।” भारत आज भी एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था को ढो रहा है जो रटने पर जोर देती है, जबकि दुनिया ‘प्रैक्टिकल स्किल’ की भाषा बोल रही है।
भारत कहां कर रहा है गलती?
राजन ने चेताया कि भारत अपनी युवा आबादी का सही इस्तेमाल करने में विफल हो रहा है। उन्होंने कहा कि हम उच्च शिक्षा के बड़े-बड़े संस्थान तो खोल रहे हैं, लेकिन वहां से निकलने वाले छात्रों के पास वह हुनर नहीं है जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सके। उन्होंने चीन और वियतनाम जैसे देशों का उदाहरण देते हुए संकेत दिया कि कैसे उन्होंने बुनियादी तकनीकी शिक्षा और ‘वोकेशनल ट्रेनिंग’ के दम पर अपनी अर्थव्यवस्था को बदला, जबकि भारत आज भी थ्योरी और पुराने सिलेबस में उलझा हुआ है
भविष्य की राह: डिग्री नहीं, स्किल है असली ‘करेंसी’
रघुराम राजन के अनुसार, भारत को शिक्षित बेरोजगारी के संकट से बचने के लिए इन 3 पहलुओं पर काम करना होगा।
लर्निंग बाय डूइंग,रटने के बजाय ‘काम करते हुए सीखने’ के कल्चर को बढ़ावा देना। इंडस्ट्री और एजुकेशन का मेल के साथ हुनरमंद भारत बनाने की जरूरत होगी।2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए सिर्फ डिग्री नहीं, युवाओं का ‘स्किल्ड’ होना अनिवार्य है।
निष्कर्ष: यदि युवा हुनरमंद नहीं बने, तो शिक्षित बेरोजगारों की यह बड़ी आबादी देश के लिए ताकत नहीं बल्कि बोझ बन जाएगी।


