श्री भागवत ने कहा — तीन बार बैन झेलने के बाद संघ को मिली वैधानिक पहचान और सामाजिक मान्यता
बेंगलुरु, 9 नवम्बर 2025 (एजेंसी)।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बेंगलुरु में आयोजित द्विदिवसीय व्याख्यानमाला “संघ यात्रा के 100 साल — नए क्षितिज” में संबोधित करते हुए संघ के दृष्टिकोण और संगठनात्मक मानदंडों पर स्पष्टता दी। कार्यक्रम के दौरान भागवत ने संघ के कार्यक्रमों में शामिल होने के मापदण्ड और देश के सामने व्यूहरचित सुरक्षा-संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत टिप्पणी की।
श्री भागवत ने जब पूछा गया कि क्या मुसलमान/ईसाई आरएसएस की शाखाओं (शाखा) में आ सकते हैं तो उन्होंने कहा कि संघ में प्रवेश का आधार व्यक्ति का “भारत माता का पुत्र” होना है और संघ के कार्यक्रमों में आने वाले को इसी नजरिए से आना चाहिए। उनके शाब्दिक उत्तर में उन्होंने कहा — “कोई ब्राह्मण, कोई मुस्लिम, कोई ईसाई — केवल हिंदू ही संघ में प्रवेश कर सकता है,” साथ ही यह स्पष्ट किया कि अलगाव छोड़कर जो लोग भारत माता के पुत्र बतौर सहभागिता करें, वे कार्यक्रमों में आ सकते हैं। यह बयान चर्चा का केन्द्र बना रहा।
राष्ट्रीय सुरक्षा और पारस्परिक सम्बंधों के सवाल पर भागवत ने पाकिस्तान को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि भारत को ऐसे जवाब देने होंगे जो सामने वाली ताकत को समझ में आएं; निवारक क्षमता और ठोस नीति ही स्थायी शांति की दिशा में योगदान दे सकती है। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यक हुआ तो कड़ाई से और प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देनी चाहिए ताकि विवादों का समाधान सहयोग के रास्ते पर हो सके। यह पृष्ठभूमि कार्यक्रम में उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टि को रेखांकित करती है।


