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Saturday, March 7, 2026

संसार का खेल केवल माया का नृत्य है:इसे योगमाया की चेतना से देख सकते हैं

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अंधकार भी प्रकाश की चाह रखती है। हम प्रकाश में आते हैं और अंधकार में चले जाते हैं।

अध्यात्म एक दर्शन/ janchoupal36/01/11/2025

अंधकार को भी रास्ता दिखाने हम प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इसका अर्थ बाहरी दीप जलाने से कहीं गहरा है। जब साधक भीतर योग का दीप प्रज्वलित करता है—ध्यान, विवेक और आत्म-स्मृति के माध्यम से—तब वह देखता है कि संसार का यह खेल केवल माया का नृत्य है। योग चेतना नहीं कहे जाते क्योंकि योग स्वयं जोड़ने की प्रक्रिया है—वह जो चेतन को जड़ से, आत्मा को शरीर से, निमित्त को कारण से जोड़ दे। इसीलिए संसार योगमाया है—क्योंकि इसमें वही शक्ति छिपी है जो जोड़ती भी है और बांधती भी है।

जब हम संसार से पूर्ण रूप से आसक्त हो जाते हैं, तब चेतना जैसे पीछे हट जाती है, और शरीर अपने अंधकार में डूब जाता है। पर जब योग का स्पर्श होता है, तब भीतर का अंधकार स्वयं प्रकाश में विलीन हो जाता है। यही दिव्यता की वह दीपावली है—जहां भीतर के अंधकार पर ज्ञान का दीपक जलता है।क्योंकि जहां अंधेरा है ना उजाला दुख है न सुख जहां कुछ भी नहीं सब शून्य है वहीं चेतना का द्वार है।जब हम माया के वश में रहते हैं फिर चेतना के विषय में क्यों चले जाते हैं,क्या माया और चेतना ईश्वर के दो रूप है फिर अद्वैत क्या है??

योग दीपावली का उत्सव बाहर नहीं, भीतर मनाया जाना चाहिए। उसमें न पटाखे हैं, न आभूषण—सिर्फ एक दीया है, जो सब देखता है, सब जानता है, पर किसी से बंधा नहीं। वही आत्मा का दीप है—नित्य, शांत, अचल, और सर्वत्र।क्या अदृश्य शक्ति कोई माया है जिसे हम ईश्वर मान लेते हैं जिसमें हम विमोहित रहते है कुछ देख नहीं पाते समझ नहीं पाते फिर चले जाते हैं।क्या शरीर और चेतना अंधकार और प्रकाश का खेल है संसार और पूरी सृष्टि भी जिसमें समाहित है।क्या मनुष्य का जन्म माया से ही हुआ है,फिर क्या माया को चेतना से जीता जा सकता है।
फिर यह (जड़) शरीर और (चेतन) आत्मा यह खेल खेलने संसार का सहारा क्यों लेते है।

अस्वीकरण: यह लेख मात्र मेरे अपने विचार और दर्शन प्रस्तुत करता है। इसे ज्ञान और योग की दृष्टि से देखा जाए। किसी भी प्रकार के विवाद या अन्य संदर्भ से इसका कोई संबंध नहीं है।





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