छठ घाटों पर सूर्यदेव को अर्घ्य देने के साथ-साथ प्रजा इस बार लोकतंत्र के सूर्य को भी नई दिशा देने को तैयार हैं।
पटना, 28 अक्टूबर 2025
बिहार में इस समय दो महापर्वों का संगम देखने को मिल रहा है—एक ओर आस्था का पर्व छठ पूजा अपनी श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जा रहा है, तो दूसरी ओर राजनीतिक हलचल भी अपने चरम पर है। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नेता जनता के बीच पहुंचकर समर्थन जुटाने में सक्रिय हैं। यह कहना गलत न होगा कि बिहार इस समय धर्म और लोकतंत्र—दोनों के उत्सव में डूबा है।
छठ पूजा को लेकर पूरे राज्य में उत्साह का माहौल है। गली-मोहल्लों से लेकर घाटों तक सजावट और स्वच्छता के विशेष इंतज़ाम किए गए हैं। व्रतधारी महिलाएं सुबह-सुबह नदी, तालाब और सरोवरों पर जाकर सूर्यदेव को अर्घ्य देने की तैयारी में जुटी हैं। इस पर्व की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह समाज को जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठाकर एकजुट करता है।
राजनीति और आस्था का यह मेल बिहार की पहचान जैसा बन गया है। जब घाटों पर श्रद्धा का समंदर उमड़ रहा है, वहीं चुनावी नारों और जनसभाओं से सियासी तापमान भी बढ़ा हुआ है। अब मतदाता केवल जाति या समुदाय नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं और उनके असर के आधार पर निर्णय ले रहे हैं।
वर्ष 2000 में शुरू हुई मुफ्त योजनाओं की राजनीति आज नए रूप में दिखाई दे रही है। महिलाओं को लक्षित योजनाएँ—जैसे मुफ्त गैस कनेक्शन, स्व-सहायता समूहों को आर्थिक सहायता और शिक्षा प्रोत्साहन—ने वोटिंग पैटर्न को काफी बदल दिया है। अब बिहार में विकास और जनकल्याण ही असली चुनावी मुद्दा बनते दिख रहा है।


