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Saturday, March 7, 2026

योग दीपावली का सार:_योग और चेतना के अद्वैत संबंध

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यदि हम संसार को प्रकाशित करने की बजाय स्वयं प्रकाशवान बन जाएँ, तो संसार स्वतः प्रकाशित हो जाएगा।

दीवाली विशेष/ जनचौपाल36 /21/10/2025

योग के अभाव में ही मनुष्य को संसार से वियोग लेना पड़ता है:_ योग दीपावली केवल बाहरी दीयों की बात नहीं, बल्कि आत्मज्ञान के उस दिव्य प्रकाश की शुभ वेला है, जहां साधक अपने भीतर के अंधकार का सामना करता है और ज्ञान के दीप से उसे जीतता है। दीया जलाना अज्ञान को दूर कर आत्मा के सत्य को प्रकाशित करने का प्रतीक है। जैसे दीपावली की रात सर्वाधिक अंधकारमय होती है, वैसे ही आत्मा की यात्रा में भी सबसे गहरी जड़ता के क्षण में ज्ञान का दीपक जगता है।

माया, शरीर और चेतना
शरीर को ‘जड़’ कहना इसीलिए उचित है क्योंकि वह इंद्रियों और बुद्धि के अधूरे अनुभव में बंधा रहता है। चेतना उस आत्मा की अवस्था है जो सर्वत्र उज्जवल है, ब्रह्म है, लेकिन माया की वजह से वह भ्रमित होती है कि ‘मैं शरीर हूँ’। अद्वैत वेदांत बताता है—’ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है’। माया वह शक्ति है जो ब्रह्म के एकत्व को छिपाकर अनेकता का भ्रम उत्पन्न करती है; इसी भ्रम में जीवात्मा शरीर के अहंकार में बंध जाती है।

योग और चेतना का संबंध
योग चिन्मय (शुद्ध बुद्धि)सत्ता को जड़ सत्ता (विशुद्ध बुद्धि)से जोड़ने की क्रिया है। योग के द्वारा साधक अपनी चेतना को संशोधित करके, शरीर की जड़ता के ऊपर ज्ञान का दीपक जलाता है— ठीक वैसे ही जैसे खुद दीप जलाने से आसपास का अंधकार मिटाता है।योगमाया शरीर और चेतना का मिलन है।
योग ‘माया’ को पार करने का उपाय है: माया वह आवरण है जिसमें जीवन बंधा है; योग से इसमें प्रवेश करना संभव है। योगमाया का अर्थ यही है—माया को पार कर संसार की विस्मृति एवं साक्षात्कार में प्रवेश होना।

आत्मज्ञान और सृष्टि का अद्वैत खेल
दीपावली के योग में जब भीतर का दीप जलता है, तब साधक अपने अंदर स्थायी आत्मा को पाता है, जो कभी नष्ट नहीं होती। माया परिवर्तनशील और भ्रामक है, पर सत्य केवल अनुभवकर्ता (आत्मा) और अनुभव (संसार) के मिलन में है। शरीर और चेतना का यह ‘अंधकार और प्रकाश’ का खेल ही सृष्टि का अद्वैत रहस्य है— वह अदृश्य शक्ति जो सबको बांधती है, जिसे योगी पहचानता है लेकिन शब्दों में पूर्ण समझा नहीं सकता।

निष्कर्ष
योग दीपावली एक आंतरिक यात्रा है, जिसमें साधक अपने अंदर उजाला फैलाता है, माया के बंधन को तोड़ता है और आत्मज्ञान के प्रकाश से जीवन को प्रकाशित करता है। जब भीतर का दीप जलता है, तो बाहर का अंधकार स्वयं स्फूर्त चला जाता है”” यही योग दीपावली का गूढ़तम अर्थ है।

अस्वीकरण: योग दीपावली की आध्यात्मिक गहराई को आत्म-साक्षात्कार, माया, योग और चेतना के अद्वैत संबंध के संदर्भ में समझाने का एक व्यक्तिगत दार्शनिक प्रयास है, धर्म-परंपरा या मत का प्रतिनिधित्व नहीं।



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