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Tuesday, October 27, 2026
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बालोद जिले में खेत की जमीन अचानक धंसी, बना रहस्यपूर्ण गड्ढा – प्रशासन ने किया क्षेत्र सील

कसहीकला/बालोद/छत्तीसगढ़, 24 जुलाई:
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम कसहीकला में एक रहस्यमयी घटना ने पूरे गांव को चौंका दिया। बुधवार की सुबह करीब 11 बजे एक किसान के खेत की जमीन अचानक धंस गई, जिससे वहां लगभग 15 फीट लंबा, 15 फीट चौड़ा और 20 फीट से अधिक गहरा गड्ढा बन गया। गड्ढे के अंदर से पानी में हलचल और उबाल जैसा दृश्य दिखाई देने लगा, जिससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल फैल गया।
गहराई नापने पर पूरा बांस समा गया
घटना उस समय सामने आई जब खेत के मालिक हिंगलाज देवांगन ने खेत में कुछ असामान्य देखा। मिट्टी के बीचोबीच एक बड़ा धंसा हुआ हिस्सा था। आसपास के लोगों ने बांस डालकर गहराई का अंदाज़ा लगाने की कोशिश की, लेकिन बांस पूरी तरह गड्ढे में समा गया। गड्ढे में झांकने पर लोगों को पानी में हिलोरें और उबाल जैसा कंपन नजर आया।
सिंक होल या कुछ और?
जहाँ ग्रामीण इसे किसी दैवीय चेतावनी या अद्भुत घटना मान रहे हैं, वहीं भूवैज्ञानिकों का प्रारंभिक अनुमान है कि यह “सिंक होल” हो सकता है। सिंक होल यानी ऐसी भौगोलिक घटना जिसमें ज़मीन के नीचे की परतें धीरे-धीरे खोखली होती जाती हैं और एक समय पर ऊपर की सतह अचानक धंस जाती है। हालांकि, प्रशासन ने इस स्थान की वैज्ञानिक जांच कराने की बात कही है।
प्रशासन और ग्राम पंचायत की सतर्कता
घटना की गंभीरता को देखते हुए गांव के सरपंच, ग्रामीणों और प्रशासन ने मिलकर तत्काल प्रभाव से इस क्षेत्र को तार से घेरकर प्रतिबंधित कर दिया है। किसी को भी उस स्थान के नजदीक जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है।
प्रशासन ने एहतियात के तौर पर आसपास के क्षेत्र का भी निरीक्षण शुरू कर दिया है।
ग्रामीणों में जिज्ञासा और भय का मिश्रण
इस गड्ढे को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग पहुंच रहे हैं। कई ग्रामीण इसे कोई ‘अलौकिक’ घटना मान रहे हैं, तो कुछ इसे भूत-प्रेत या ज़मीन के अंदर दबे किसी रहस्य से जोड़ रहे हैं। खेत मालिक का साफ़ कहना है कि “यहां ना कभी कुआं खोदा गया था और ना ही बोरवेल की खुदाई हुई थी।”
प्रशासन की अपील
बालोद जिला प्रशासन ने लोगों से अफवाह न फैलाने और इस स्थल से दूरी बनाए रखने की अपील की है। साथ ही, क्षेत्रीय भूविज्ञान विशेषज्ञों की टीम से इस घटना की वैज्ञानिक जांच करवाई जा रही है, ताकि जमीन धंसने के कारणों का स्पष्ट पता लगाया जा सके।
निष्कर्ष:
कसहीकला की यह घटना ना केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जांच का विषय है, बल्कि जनमानस में भय और जिज्ञासा का केंद्र भी बन चुकी है। आने वाले दिनों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट से स्पष्ट होगा कि यह वास्तव में सिंक होल है या कोई और भूगर्भीय घटना। फिलहाल, प्रशासन की सजगता और ग्रामीणों की सतर्कता से स्थिति नियंत्रण में है।


सीमेंट के नाम पर सील हो रहा गांव का भविष्य: मोतिमपुर से उठती एक और सिसकी

न्यूज लेख | खरोरा, छत्तीसगढ़
बारिश की बूंदों के बीच जब एक गांव अपने अस्तित्व के लिए टेंट लगाकर रात बिताता है, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं कुछ बहुत ग़लत हो रहा है।
मोतिमपुर और उसके आसपास के गांवों में इन दिनों केवल आसमान ही नहीं, ज़मीन भी रो रही है — अपने सीने में खुदाई और विस्फोट के डर से।
यहां एक सीमेंट प्लांट और खदान परियोजना को लेकर सिर्फ जनसुनवाई नहीं, बल्कि गांव की आत्मा की सुनवाई हो रही थी। मगर अफ़सोस, शासन-प्रशासन कानों में रुई ठूंसे बैठा था।
सुनवाई से पहले ही शुरू हुआ संघर्ष
जब प्रशासन ने मोतिमपुर में जनसुनवाई की तारीख तय की, तब ग्रामीणों ने तय कर लिया कि वे सिर्फ दर्शक नहीं रहेंगे। वे टेंट लेकर आए, रातभर वहीं डटे रहे। सुबह होते-होते महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग, किसान सब एक स्वर में कहने लगे — “हमें ज़हर नहीं, ज़मीन चाहिए।”
यह विरोध केवल ‘एक प्लांट’ के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सोच के खिलाफ है जो गांवों को सिर्फ संसाधनों का भंडार समझती है और वहां रहने वालों को बाधा।
विकास बनाम विनाश की कहानी
सरकारी फाइलों में इसे ‘विकास परियोजना’ कहा जा रहा है, लेकिन जिनकी ज़मीन, पानी, हवा, पशु, पेड़ और जीवन शैली इस ‘विकास’ से उजड़ जाएगी — उनके लिए यह एक धीमा ज़हर है।
1100 एकड़ की खदान, चूना पत्थर की ब्लास्टिंग, गिरता भूजल स्तर, सूखते जल स्रोत, हिलती मकानों की नींव, और 55 हजार लोगों का प्रभावित होना — क्या ये सब सिर्फ ‘प्रगति’ का मूल्य है?
रोजगार नहीं, रोग लाएगा यह प्लांट
ग्रामीणों की चिंता सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं। उन्हें भरोसा नहीं कि ये प्लांट रोजगार देगा। अनुभव कहता है, प्लांट आते हैं, प्रदूषण लाते हैं, फिर मशीनें चलती हैं, गांव खाली होते हैं और बचता है सिर्फ धूल और बीमारी।
क्या कभी किसी नीति-निर्माता ने यह सोचा कि इस प्रकार की परियोजनाएं गांवों के सामाजिक ढांचे को कैसे तोड़ देती हैं?
प्रशासन मौन क्यों है?
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस जनसुनवाई का कोई मतलब नहीं था। ना कोई संतोषजनक जवाब मिला, ना कोई पर्यावरणीय रिपोर्ट सार्वजनिक की गई।
तो फिर सवाल है — क्या यह लोकतंत्र है, या फिर औद्योगिक लोभ का नया नक्शा?
एक चेतावनी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
जब कोई ग्रामीण आत्मदाह की चेतावनी देता है, तो उसे ‘अतिरेक’ कह कर टाल देना आसान होता है। लेकिन क्या यह उस गहराई का संकेत नहीं कि उनकी बात कोई सुन ही नहीं रहा?
अब जरूरी है एक निर्णय — इंसान पहले या उद्योग?
मोतिमपुर में जो हो रहा है, वह सिर्फ एक गांव की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रश्न है —
क्या हम विकास के नाम पर अपने गांव, पर्यावरण और संस्कृति को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं?
यदि सरकारें यह सवाल नहीं पूछेंगी, तो गांव खुद जवाब बन जाएंगे — मोतिमपुर की तरह।

मरीज नहीं, मुनाफे की मशीन! निजी अस्पतालों पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी — “बन गए हैं एटीएम”

इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश:
निजी अस्पतालों की मनमानी और मुनाफाखोरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि आज के दौर में कुछ निजी अस्पताल मरीजों को “एटीएम मशीन” समझते हैं — जिनसे सिर्फ पैसा निकाला जाना है। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक गर्भवती महिला की मौत से जुड़े चिकित्सा लापरवाही के केस की सुनवाई के दौरान की।
⚖️ डॉक्टर की याचिका खारिज, कोर्ट ने मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को बताया खतरनाक
जस्टिस प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने डॉक्टर अशोक कुमार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक मामला खत्म करने की गुहार लगाई थी। अदालत ने पाया कि डॉक्टर ने एनेस्थेटिस्ट न होते हुए भी महिला को सर्जरी के लिए भर्ती किया, और जब तक जरूरी डॉक्टर पहुंचे, गर्भ में पल रहे शिशु की मौत हो चुकी थी।
कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा:
“अब यह सामान्य होता जा रहा है कि निजी अस्पताल पहले मरीज को भर्ती कर लेते हैं, फिर डॉक्टर को बुलाते हैं। इलाज की ज़रूरी सुविधा हो या न हो, मरीज को पहले अंदर करो — फिर पैसा लो।“
🏥 मरीजों की मजबूरी को बना लिया धंधा
कोर्ट ने साफ कहा कि कई निजी अस्पताल मरीजों की मजबूरी और अनजाने डर का फायदा उठाते हैं। इलाज की जल्दबाज़ी, मेडिकल टर्म्स की उलझन, और परिजनों की भावनात्मक स्थिति — इन सबका दुरुपयोग कर मुनाफा कमाना एक क्रूर मानसिकता है।
“यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया व्यावसायिक अमानवीय व्यवहार है,“
— कोर्ट की टिप्पणी।
🧑‍⚖️ जिम्मेदारी से काम करने वाले डॉक्टरों की रक्षा ज़रूरी
हालांकि कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि हर निजी डॉक्टर या अस्पताल गलत नहीं हैं। ऐसे मेडिकल प्रोफेशनल्स जो ईमानदारी, संवेदना और सेवा भावना से काम करते हैं, उन्हें संविधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन जो लोग सिर्फ पैसे के लिए अस्पताल खोलते हैं, उनके खिलाफ कड़ा ऐक्शन जरूरी है।
🚨 नियमों की अनदेखी: अस्पताल खोलने की भी हो जांच
कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि उन अस्पतालों पर सख्त नजर रखने की जरूरत है, जो बिना पूर्ण सुविधाओं, प्रशिक्षित स्टाफ और लाइसेंसिंग के महज मुनाफा कमाने के लिए खुले हैं।
“यह गंभीर चिंतन का विषय है कि क्या अस्पताल खोलना अब व्यापारिक उपक्रम बन चुका है?“
– कोर्ट ने सवाल उठाया।
📌 प्रसंगवश मामला: टाली गई सर्जरी, और गई जान
डॉ. अशोक कुमार ने एक गर्भवती महिला को यह कहकर भर्ती किया कि ऑपरेशन होगा। परिवार से मंजूरी मिलने के बावजूद सर्जरी को टालते रहे, क्योंकि सर्जन समय पर मौजूद नहीं था। अदालत ने इस व्यवहार को शुद्ध लापरवाही और व्यावसायिक अमानवता बताया।
✍️ निष्कर्ष: इलाज का मंदिर या मुनाफे का बाज़ार?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी देशभर के उन निजी अस्पतालों के लिए चेतावनी है, जिन्होंने सेवा को व्यवसाय, और मरीज को ग्राहक बना दिया है। अब ज़रूरत है कि सरकार, मेडिकल काउंसिल और प्रशासन — मिलकर यह सुनिश्चित करें कि “अस्पताल” शब्द फिर से भरोसे और मानवता का पर्याय बने।
(खबर सूत्र_मीडिया)

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: छात्रों की आत्महत्याएं सिर्फ आंकड़े नहीं, हमारी व्यवस्था की विफलता हैं

नई दिल्ली, 26 जुलाई:
देश में छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं जिस तेज़ी से बढ़ रही हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने साफ कहा,
“इतने छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।”
यह हमारे शिक्षा तंत्र, सामाजिक सोच और मानसिक स्वास्थ्य तंत्र – तीनों की सामूहिक असफलता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि इन दुखद घटनाओं के पीछे शैक्षणिक दबाव, सामाजिक तिरस्कार और भावनात्मक उपेक्षा जैसी वजहें काम कर रही हैं, जिन्हें अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
📊 चौंकाने वाली तस्वीर: 13 हज़ार छात्र आत्महत्या के शिकार
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार:
वर्ष 2022 में आत्महत्या करने वाले 1.7 लाख लोगों में से 13,044 छात्र थे।
वर्ष 2001 में यह संख्या 5,425 थी — यानी दो दशकों में ढाई गुना वृद्धि।
हर 100 आत्महत्या मामलों में औसतन 8 छात्र शामिल हैं।
2,248 छात्रों ने केवल इसलिए जान दी क्योंकि वे परीक्षा में असफल हो गए थे।
इन आंकड़ों को देखकर कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ आंकड़े नहीं, युवा मनों का टूटता भरोसा है।
⚖️ मानसिक स्वास्थ्य है मौलिक अधिकार का हिस्सा
कोर्ट ने यह भी कहा कि मानसिक स्वास्थ्य, जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का एक अनिवार्य पक्ष है। यह सिर्फ चिकित्सा या इलाज का विषय नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, जिम्मेदार और जागरूक शिक्षा प्रणाली की ज़िम्मेदारी है कि वह छात्रों को आत्महत्या की कगार पर पहुँचने से पहले ही संभाले।
🧠 NEET छात्रा की आत्महत्या से उपजा राष्ट्रीय मंथन
सुनवाई विशाखापट्टनम में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की आत्महत्या से जुड़ी थी, जिसकी जांच CBI से कराने की मांग पहले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में खारिज हो चुकी थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के लिए 15 दिशा-निर्देश जारी किए, ताकि:
शिक्षा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य तंत्र मजबूत हो,
छात्रों की सुनवाई हो, सज़ा नहीं,
और परीक्षा की असफलता को जीवन की असफलता न माना जाए।
🕊️ कॉलेजों को बनना होगा अभिभावक का विकल्प
कोर्ट ने कहा कि जब छात्र अपने घरों से दूर रहकर कॉलेजों में पढ़ते हैं, तब संस्थानों की भूमिका केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें ‘लोको पेरेंटिस’ यानी अभिभावक का स्थान लेना होगा — जो नियम नहीं, सहयोग और सहानुभूति देता है।
जातिगत भेदभाव की ओर इशारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि कॉलेज परिसरों में यह भावना छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ती है और संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।
🔍 क्या?करेंगे सरकार और संस्थान?
कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि मार्च 2025 में गठित नेशनल टास्क फोर्स की सिफारिशों को कब और कैसे लागू किया जाएगा, इसका विवरण 90 दिनों में हलफनामा देकर बताया जाए।
🔚 निष्कर्ष: यह सिर्फ छात्र नहीं, भविष्य का अंत है
हर आत्महत्या के पीछे एक अधूरी कहानी होती है — जिसे अगर सही समय पर सुना गया होता, तो शायद बचाया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम केवल न्यायिक नहीं, राष्ट्रीय चेतना का आह्वान है।
अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था, समाज और सरकार – सभी एकजुट होकर छात्र जीवन को बोझ नहीं, भरोसा बनाएं।

कवर्धा को मिली अत्याधुनिक सीटी स्कैन मशीन, ग्राम पंचायत जिंदा घोषित हुआ टीबी मुक्त – डिप्टी सीएम विजय शर्मा और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने की बड़ी घोषणाएं

कवर्धा, जिला कबीरधाम |
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को मजबूती प्रदान करते हुए आज उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा एवं स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कवर्धा जिला अस्पताल में अत्याधुनिक सीटी स्कैन मशीन का लोकार्पण किया। इस अवसर पर सीजीएमएससी अध्यक्ष दीपक म्हस्के भी उनके साथ मौजूद रहे।
डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कहा,

“कवर्धा जिला अस्पताल को मिली यह नई सीटी स्कैन मशीन अब यहां के मरीजों को गंभीर रोगों की सटीक और त्वरित जांच की सुविधा देगी। अब लोगों को रायपुर या अन्य बड़े शहरों की ओर भटकने की जरूरत नहीं होगी। यह सुविधा कवर्धा के स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने में मील का पत्थर साबित होगी।”

स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने स्पष्ट किया कि

“राज्य सरकार की प्राथमिकता हर नागरिक को बेहतर, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना है। स्वास्थ्य संस्थानों में आधुनिक संसाधनों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। चिकित्सकों और कर्मचारियों से अपेक्षा है कि वे सेवाभाव के साथ कार्य करें।”

जिंदा बना कबीरधाम का पहला टीबी मुक्त पंचायत
स्वास्थ्य जागरूकता अभियान के तहत आज कवर्धा विकासखंड के ग्राम पंचायत जिंदा को “टीबी मुक्त पंचायत” घोषित किया गया। इस गौरवपूर्ण अवसर पर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा एवं स्वास्थ्य मंत्री जायसवाल ने गांव पहुंचकर पंचायत को प्रमाण पत्र सौंपा और ग्रामीणों को बधाई दी।

डिप्टी सीएम ने कहा।

“यह पंचायत पूरे जिले के लिए प्रेरणास्रोत है। सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश की प्रत्येक पंचायत टीबी मुक्त बने,”

इस अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष ईश्वरी साहू, भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी, जनप्रतिनिधिगण एवं बड़ी संख्या में कार्यकर्ता व ग्रामीणजन उपस्थित थे।

ब्रिटेन के शाही सैंड्रिंघम पैलेस में मोदी का स्वागत – पहली बार पहुंचे कोई भारतीय नेता

नई दिल्ली/खबर सूत्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ब्रिटेन दौरा इस बार कई मायनों में खास रहा। लेकिन सबसे ऐतिहासिक पल तब आया जब ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय ने खुद उन्हें सैंड्रिंघम पैलेस में आमंत्रित किया और उनका स्वागत किया। यह वही शाही महल है जहां आमतौर पर केवल रॉयल फैमिली और उनके नजदीकी लोग ही जाते हैं।
सैंड्रिंघम पैलेस में मोदी की मौजूदगी यह साफ संकेत देती है कि भारत अब दुनिया के मंच पर एक खास और मजबूत भूमिका निभा रहा है। आज का भारत, पहले वाला गुलाम भारत नहीं है, बल्कि अब वह देश है जो दुनिया की बड़ी शक्तियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी सैंड्रिंघम में होना इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इससे पहले कभी किसी भारतीय नेता को वहां आधिकारिक रूप से नहीं बुलाया गया था।

यह सम्मान केवल मोदी जी का नहीं, बल्कि पूरे भारत का है।
राजा चार्ल्स ने किया ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का समर्थन
इस मुलाकात में एक भावनात्मक पहलू और जुड़ गया। राजा चार्ल्स ने प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक पेड़ मां के नाम’ मुहिम को समर्थन देते हुए सैंड्रिंघम में एक पेड़ लगाने की घोषणा की। यह सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि भारत के विजन और प्रकृति-संवेदनशील सोच का भी सम्मान है।
क्यों खास है सैंड्रिंघम हाउस?
सैंड्रिंघम हाउस इंग्लैंड के नॉरफोक में स्थित एक निजी शाही संपत्ति है, जहां ब्रिटिश शाही परिवार क्रिसमस और छुट्टियां मनाने आता है।
यह महल लगभग 8000 एकड़ में फैला है और इसमें जंगल, झीलें, खेत और चर्च तक शामिल हैं।
यहां हर साल रॉयल फैमिली के सदस्य सेंट मैरी मैग्डेलेन चर्च में प्रार्थना के लिए इकट्ठा होते हैं। यह स्थान आमतौर पर आम राजनेताओं के लिए नहीं खोला जाता। इसलिए पीएम मोदी का यहां जाना यह दिखाता है कि अब भारत को केवल एक राजनीतिक साझेदार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और सांस्कृतिक मित्र भी माना जा रहा है।
इतिहास से जुड़ी यादें और भारत का नया रिश्ता
सैंड्रिंघम हाउस 1862 से शाही परिवार की निजी संपत्ति है। यहीं 1952 में महारानी एलिजाबेथ के पिता किंग जॉर्ज VI का निधन हुआ था। भारत के अब तक कई प्रधानमंत्री ब्रिटेन के अन्य महलों में गए, लेकिन सैंड्रिंघम में यह पहली आधिकारिक भारतीय उपस्थिति है।
इस दौरे ने यह साबित कर दिया कि भारत की बात अब सिर्फ सुनने के लिए नहीं, बल्कि समझने और सम्मान देने के लिए भी मानी जाती है।
निष्कर्ष:
सैंड्रिंघम पैलेस में प्रधानमंत्री मोदी का जाना केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। यह ब्रिटेन और भारत के बीच रिश्तों में एक नए और आत्मीय अध्याय की शुरुआत है। यह क्षण हर भारतीय के लिए गर्व की बात है।


कोरबा पीजी कॉलेज का ऑडिटोरियम 10 साल बाद भी अधूरा, तीन बार गिर चुकी है सीलिंग

कोरबा, छत्तीसगढ़।
कोरबा जिले के सबसे बड़े शासकीय पीजी कॉलेज में 1.49 करोड़ की लागत से बन रहा 400 सीटों वाला ऑडिटोरियम बीते 10 वर्षों से अधूरा है। वर्ष 2016-17 में शुरू हुए इस निर्माण कार्य में अब तक तीन बार सीलिंग गिर चुकी है, फिर भी अब तक ऑडिटोरियम कॉलेज को हैंडओवर नहीं किया गया है।
डीएमएफ फंड से निर्मित हो रहा यह ऑडिटोरियम कोरबा का पहला कॉलेज ऑडिटोरियम है, जिसकी निर्माण एजेंसी नगर पालिक निगम है। निर्माण की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं—विद्युतीकरण का बजट निर्माण के बाद स्वीकृत हुआ, बैठने की व्यवस्था की कोई प्लानिंग नहीं की गई, और बार-बार की मरम्मत के बावजूद आज भी भवन अधूरा है।
कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि अधूरा निर्माण और गिरती सीलिंग की वजह से वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। इस कारण कॉलेज की सांस्कृतिक गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं।
पूर्व में डीएमएफ से जुड़ी अनियमितताओं पर ईडी द्वारा की गई जांच में भी गंभीर खुलासे हो चुके हैं। इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट में जवाबदेही तय नहीं की गई है।
इससे पहले रिसदी रोड स्थित लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ऑडिटोरियम की छत गिरने पर दो इंजीनियर निलंबित हुए, जबकि कॉलेज ऑडिटोरियम में ऐसी घटनाएं तीन बार हो चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य है।

10 सालों से निर्माणाधीन, फिर भी प्रशासन उदासीन
कॉलेज प्रबंधन और छात्रों की बार-बार की मांग के बावजूद 10 वर्षों से यह ऑडिटोरियम अधूरा पड़ा है। यह कोई ऐतिहासिक किले का निर्माण नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक संस्थान में उपयोगी सांस्कृतिक मंच है, जिसकी जरूरत हर कार्यक्रम में महसूस की जाती है। कोरबा के इतने बड़े कॉलेज में, जहां निरंतर शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती हैं, वहां एक आधारभूत सुविधा को अब तक नजरअंदाज किया जाना गंभीर लापरवाही का संकेत है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन को इस दिशा में जवाबदेही तय नहीं करनी चाहिए?


🏠 प्रधानमंत्री आवास योजना से साकार हुआ पक्के घर का सपना:_ सम्मान, सुरक्षा और स्थायित्व की दिशा में ऐतिहासिक कदम – विधायक दीपेश साहू

JANCHOUPAL 36

बेमेतरा | बेरला | 24 जुलाई 2025
नगर पंचायत बेरला में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) फेज 2.0 के अंतर्गत भवन अनुज्ञा एवं स्वीकृति-पत्र वितरण कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बेमेतरा विधायक श्री दीपेश साहू एवं अध्यक्षता नगर पंचायत अध्यक्ष श्री विशाल देशलहरा ने की।
कार्यक्रम में 47 नव-स्वीकृत आवासों के हितग्राहियों को स्वीकृति-पत्र सौंपे गए, जिससे अनेक परिवारों का वर्षों पुराना पक्के घर का सपना साकार हुआ।
✨ विधायक दीपेश साहू ने क्या कहा?
विधायक श्री दीपेश साहू ने लाभार्थियों को बधाई देते हुए कहा:
“प्रधानमंत्री आवास योजना वंचित वर्ग के लिए केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की नई शुरुआत है। यह योजना आत्मसम्मान, स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक बन चुकी है।”

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा सरकार की प्राथमिकता है कि कोई पात्र व्यक्ति इस योजना से वंचित न रहे और सभी जनप्रतिनिधि मिलकर इसे धरातल तक पहुंचाएं।
🌱 “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान में वृक्षारोपण
कार्यक्रम के अंत में “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत नगर पंचायत परिसर में वृक्षारोपण किया गया। इस अवसर पर विधायक श्री साहू ने कहा:

“जैसे हमारी मां जीवन देती हैं, वैसे ही वृक्ष पृथ्वी को जीवन देते हैं। यह अभियान केवल पौधरोपण नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति एक श्रद्धांजलि और भावी पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य की दिशा में एक प्रयास है।”
🙏 आभार और उपस्थिति
नगर पंचायत बेरला के प्रभारी नगर पालिका अधिकारी हरीश साहू ने मंच से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह हम सबके लिए गर्व की बात है कि यह ऐतिहासिक कार्यक्रम स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
👥 उपस्थित गणमान्य व्यक्ति:
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख जनप्रतिनिधियों में विधायक प्रतिनिधि श्री अमृत माहेश्वरी, उपाध्यक्ष श्री संतोष साहू, सभापति श्री बलराम यादव, श्री बलराम सिवारे, शिवझड़ी सिन्हा, पार्षद श्रीमती भुनेश्वरी टंडन, सुश्री उमा नेतम, श्रीमती लक्ष्मीलता वर्मा, मथुरा साहू, अंजलि पाटिल, यतीश द्विवेदी, प्रहलाद वर्मा, कन्हैया सेन, लेखराम साहू, गोल्डी द्विवेदी, रोहित साहू, लीलाराम साहू, सिरमति अंजलि साहू, सहित सीएलटीसी टीम, वास्तुविद, लाभार्थी परिवार एवं बड़ी संख्या में नागरिक मौजूद रहे।


राज्य राजधानी क्षेत्र (SCR) की परिकल्पना को मिल रहा आकार: छत्तीसगढ़ को मिलेगा वर्ल्ड-क्लास अर्बन क्लस्टर

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का एक पूर्ण विकसित बृहद शहरी स्वरूप

📍 रायपुर | जनचौपाल 36 डॉट कॉम
छत्तीसगढ़ में शहरी विकास को नई दिशा देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की तर्ज पर राज्य सरकार राज्य राजधानी क्षेत्र (State Capital Region – SCR) के गठन की ओर बढ़ रही है। यह क्षेत्र रायपुर, दुर्ग, भिलाई और नवा रायपुर (अटल नगर) जैसे प्रमुख शहरी क्षेत्रों को समाहित करेगा।
🚀 क्या है SCR (State Capital Region)?
राज्य राजधानी क्षेत्र, एक ऐसा एकीकृत शहरी विकास मॉडल होगा जो इन चार प्रमुख शहरों को एक आधुनिक, सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध क्लस्टर में परिवर्तित करेगा। ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली-एनसीआर मॉडल में गुरुग्राम, नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद का समावेश है।
राज्य राजधानी क्षेत्र (SCR) का उद्देश्य है—
यातायात एवं कनेक्टिविटी का एकीकृत विकास
समान नागरिक सुविधाएं एवं बुनियादी ढांचा
आवास, जल, सीवरेज और हरित क्षेत्र का संतुलन
निवेश और औद्योगिक अवसरों को गति देना
🏗️ शहरी विकास का नया मानचित्र
राज्य सरकार की “सुशासन और संवरते छत्तीसगढ़” की नीति के तहत SCR को वर्ल्ड-क्लास अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर के मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके तहत निम्न योजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है:
रायपुर से नवा रायपुर तक मेट्रो लाइट ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर
स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम
एकीकृत जल निकासी और जलापूर्ति नेटवर्क
ग्रीन मोबिलिटी और ई-वाहनों को बढ़ावा
डिजिटल गवर्नेंस और ई-सर्विस नेटवर्क विस्तार
📊 आर्थिक और औद्योगिक दृष्टिकोण
SCR का गठन सिर्फ एक शहरी योजना नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक रीढ़ को और मजबूत करने की दिशा में रणनीतिक निर्णय है।
यह निवेशकों के लिए आकर्षक हब बनेगा। रियल एस्टेट, आईटी, हेल्थकेयर, शिक्षा और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में बड़े अवसर पैदा होंगे।
🌐 राष्ट्रीय मानचित्र पर छत्तीसगढ़ की नई पहचान
भारत में हैदराबाद मेट्रोपॉलिटन रीजन, बैंगलोर अर्बन रीजन और मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन की तर्ज पर SCR छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान देगा।
🗣️ प्रमुख वक्तव्यों की झलक
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा है –
“राज्य राजधानी क्षेत्र छत्तीसगढ़ को एक समावेशी, स्थायी और विश्वस्तरीय शहरी स्वरूप देगा। इससे न सिर्फ प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों का जीवनस्तर भी ऊंचा होगा।”
URBAN DEVELOPMENT EXPERTS का भी मानना है कि—
“छत्तीसगढ़ देश के उन कुछ राज्यों में होगा जहाँ शहरीकरण का मॉडल दूरदर्शी और योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया जा रहा है। यह भविष्य का राज्य है।”
🔍 निष्कर्ष
राज्य राजधानी क्षेत्र (SCR) सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि संवरते छत्तीसगढ़ का रोडमैप है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र न केवल शहरी जीवन के नए मानक तय करेगा, बल्कि छत्तीसगढ़ को भारत के तेज़ी से विकसित होते राज्यों की कतार में खड़ा करेगा।
📌 यह रिपोर्ट राज्य शहरी प्रशासन विभाग, मुख्यमंत्री कार्यालय और नगरीय निकायों के सूत्रों के आधिकारिक बयानों एवं योजनाओं पर आधारित है।
📝 रिपोर्ट: Janchoupal36.com


151 किमी की काँवर यात्रा पर निकलीं विधायक भावना बोहरा — भक्ति, शक्ति और संकल्प का अद्वितीय संगम

JANCHOUPAL36

पंडरिया, 24 जुलाई 2025।
“बोल बम! हर हर महादेव!” के उद्घोष से गूंजते पंडरिया विधानसभा क्षेत्र की धरती आज भक्ति, श्रद्धा और ओज से सराबोर हो गई। पंडरिया विधायक श्रीमती भावना बोहरा के नेतृत्व में जारी 151 किलोमीटर की काँवर यात्रा का आज तीसरा दिन है, और यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी शक्ति की आस्था और संकल्प का प्रतीक बन चुकी है।
शिव-शक्ति के संयोग और मां नर्मदा की कृपा से प्रेरित यह यात्रा पंडरिया क्षेत्र के गांव-गांव में पहुंच रही है, जहाँ श्रद्धालु भक्तों, सामाजिक संगठनों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने पूरे उत्साह और आत्मीयता के साथ स्वागत किया। ग्राम खुड़िया, डिंडौरी, लीलापुर, दुल्लापुर, गौरकांपा में जब यात्रा पहुंची, तो बोल बम के नारों से वातावरण गूंज उठा, और काँवरियों के जोश से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो गया।

इस अद्वितीय अवसर पर तखतपुर के लोकप्रिय विधायक श्री धरमजीत सिंह ने भी काँवर यात्रा में सहभागी होकर सभी यात्रियों को शुभकामनाएं दीं, जिसे लेकर विधायक भावना बोहरा ने आभार प्रकट करते हुए कहा —
“आप सभी का यह स्नेह, सहयोग और अपनत्व ही हमारी इस यात्रा को सफल बनाने की प्रेरणा है। भगवान भोलेनाथ और माँ नर्मदा की कृपा से यह यात्रा सर्वमंगल की कामना के साथ आगे बढ़ रही है।”

विधायक भावना बोहरा की यह यात्रा नारी संकल्प, जनआस्था और सामाजिक एकजुटता का एक भावनात्मक उदाहरण बन रही है। यह यात्रा संदेश दे रही है कि जब नारी शक्ति धर्म और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ती है, तो समाज की चेतना और भी जागृत होती है।
〽️ बोल बम के जयकारे, भक्ति से भरे नारे,
विधायक बोहरा की यात्रा — शिवभक्ति का प्यारा सहारा।