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Tuesday, July 21, 2026

मरीज नहीं, मुनाफे की मशीन! निजी अस्पतालों पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी — “बन गए हैं एटीएम”

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इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश:
निजी अस्पतालों की मनमानी और मुनाफाखोरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि आज के दौर में कुछ निजी अस्पताल मरीजों को “एटीएम मशीन” समझते हैं — जिनसे सिर्फ पैसा निकाला जाना है। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक गर्भवती महिला की मौत से जुड़े चिकित्सा लापरवाही के केस की सुनवाई के दौरान की।
⚖️ डॉक्टर की याचिका खारिज, कोर्ट ने मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को बताया खतरनाक
जस्टिस प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने डॉक्टर अशोक कुमार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक मामला खत्म करने की गुहार लगाई थी। अदालत ने पाया कि डॉक्टर ने एनेस्थेटिस्ट न होते हुए भी महिला को सर्जरी के लिए भर्ती किया, और जब तक जरूरी डॉक्टर पहुंचे, गर्भ में पल रहे शिशु की मौत हो चुकी थी
कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा:
अब यह सामान्य होता जा रहा है कि निजी अस्पताल पहले मरीज को भर्ती कर लेते हैं, फिर डॉक्टर को बुलाते हैं। इलाज की ज़रूरी सुविधा हो या न हो, मरीज को पहले अंदर करो — फिर पैसा लो
🏥 मरीजों की मजबूरी को बना लिया धंधा
कोर्ट ने साफ कहा कि कई निजी अस्पताल मरीजों की मजबूरी और अनजाने डर का फायदा उठाते हैं। इलाज की जल्दबाज़ी, मेडिकल टर्म्स की उलझन, और परिजनों की भावनात्मक स्थिति — इन सबका दुरुपयोग कर मुनाफा कमाना एक क्रूर मानसिकता है।
यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया व्यावसायिक अमानवीय व्यवहार है,
— कोर्ट की टिप्पणी।
🧑‍⚖️ जिम्मेदारी से काम करने वाले डॉक्टरों की रक्षा ज़रूरी
हालांकि कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि हर निजी डॉक्टर या अस्पताल गलत नहीं हैं। ऐसे मेडिकल प्रोफेशनल्स जो ईमानदारी, संवेदना और सेवा भावना से काम करते हैं, उन्हें संविधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन जो लोग सिर्फ पैसे के लिए अस्पताल खोलते हैं, उनके खिलाफ कड़ा ऐक्शन जरूरी है।
🚨 नियमों की अनदेखी: अस्पताल खोलने की भी हो जांच
कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि उन अस्पतालों पर सख्त नजर रखने की जरूरत है, जो बिना पूर्ण सुविधाओं, प्रशिक्षित स्टाफ और लाइसेंसिंग के महज मुनाफा कमाने के लिए खुले हैं।
यह गंभीर चिंतन का विषय है कि क्या अस्पताल खोलना अब व्यापारिक उपक्रम बन चुका है?
– कोर्ट ने सवाल उठाया।
📌 प्रसंगवश मामला: टाली गई सर्जरी, और गई जान
डॉ. अशोक कुमार ने एक गर्भवती महिला को यह कहकर भर्ती किया कि ऑपरेशन होगा। परिवार से मंजूरी मिलने के बावजूद सर्जरी को टालते रहे, क्योंकि सर्जन समय पर मौजूद नहीं था। अदालत ने इस व्यवहार को शुद्ध लापरवाही और व्यावसायिक अमानवता बताया
✍️ निष्कर्ष: इलाज का मंदिर या मुनाफे का बाज़ार?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी देशभर के उन निजी अस्पतालों के लिए चेतावनी है, जिन्होंने सेवा को व्यवसाय, और मरीज को ग्राहक बना दिया है। अब ज़रूरत है कि सरकार, मेडिकल काउंसिल और प्रशासन — मिलकर यह सुनिश्चित करें कि “अस्पताल” शब्द फिर से भरोसे और मानवता का पर्याय बने।
(खबर सूत्र_मीडिया)

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