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सृष्टि और संसार: मनु, आदम और एडम, शब्दों का विज्ञान या मानव उत्पत्ति का एक ही सच?

विचार डेस्क – 10 जुलाई 2026

एक अनजान जिज्ञासु की विचार/डायरी से…

​हम अक्सर खुद को सीमाओं में बांध लेते हैं—भौगोलिक सीमाएं, भाषाई सीमाएं और धार्मिक सीमाएं। हम सोचते हैं कि जो व्यक्ति धरती के दूसरे छोर पर रह रहा है, वह हमसे बिल्कुल अलग है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? यदि हम अपनी चमड़ी के रंग, पहनावे और भाषा को हटाकर देखें, तो हम पाएंगे कि दुनिया के हर कोने में रहने वाले मनुष्य के शारीरिक अवयव (Biological Anatomy) एक जैसे हैं। प्रकृति ने केवल दो ही मूल रूप बनाए हैं—नर और मादा।

​जब हमारी शारीरिक बनावट एक है, तो हमारी उत्पत्ति की कहानियां अलग कैसे हो सकती हैं? जब मैंने इस जिज्ञासा के साथ दुनिया के अलग-अलग दर्शनों और भाषाओं को खंगाला, तो शब्दों के पीछे एक ऐसा ‘विशिष्ट ज्ञान’ (विज्ञान) छिपा मिला, जिसने मुझे हैरान कर दिया।

​नामकरण का खेल: भाषा अलग, सार एक

​इंसानी सभ्यता ने जब होश संभाला, तो उसने अपने अस्तित्व और अपनी उत्पत्ति के बारे में सोचना शुरू किया। अलग-अलग संस्कृतियों ने अपनी भाषा के अनुसार मानव प्रजाति का नामकरण किया। लेकिन अगर हम इन नामों की गहराई में जाएं, तो कड़ियाँ आपस में जुड़ती चली जाती हैं।

​ मनु से मनुष्य (सनातन दर्शन)

​भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन विचारकों ने माना कि इस सृष्टि के प्रथम पुरुष ‘मनु’ थे। मनु से जिसकी उत्पत्ति हुई, उसे ‘मनुष्य’ या ‘मानव’ कहा गया। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘मनु’ शब्द ‘मन्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है—सोचना या मनन करना। यानी, जो सोच-समझ सकता है, जिसके पास चेतना है, वही मनुष्य है।

​आदम से आदमी (इस्लामिक परंपरा)

​मध्य-पूर्व की सामी (Abrahamic) परंपराओं में माना गया कि ईश्वर ने सबसे पहले ‘आदम’ को बनाया। आदम की संतान होने के कारण ही हम सब ‘आदमी’ कहलाए। यहाँ भी मूल भावना वही है कि पूरी मानव जाति एक ही मूल से निकली है।

​ एडम और ईव का वैज्ञानिक रूपक (ईसाई परंपरा)

​अब आते हैं उस नाम पर जो वैश्विक स्तर पर बहुत चर्चित है—‘एडम’ (Adam) और ‘ईव’ (Eve)। पहली नजर में यह केवल एक धार्मिक कहानी लग सकती है, लेकिन जब हम इसके मूल ‘इब्रानी’ (Hebrew) भाषा के अर्थ को देखते हैं, तो इसके पीछे जीवन की उत्पत्ति का शुद्ध विज्ञान दिखाई देता है।
  • ​हिब्रू भाषा में ‘अदामा’ (Adamah) शब्द का सीधा अर्थ होता है—”मिट्टी” या “पृथ्वी”। इस तरह ‘एडम’ का अर्थ हुआ—वह जीव जो मिट्टी से बना है।
  • ​वहीं, ईव को मूल भाषा में ‘हव्वा’ (Chavah/Hava) कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है—”सांस लेना” या “जीवित रहना” यानी ‘प्राण ऊर्जा’।

​अब इन दोनों को जोड़कर देखिए: एडम (मिट्टी) + ईव (प्राण वायु) = जीवन की उत्पत्ति।

​जिज्ञासु का निष्कर्ष: हम सब एक हैं

​आज का आधुनिक रसायन विज्ञान (Chemistry) भी तो यही कहता है कि मानव शरीर जिन तत्वों (कार्बन, आयरन, फॉस्फोरस, कैल्शियम) से मिलकर बना है, वे सब इसी पृथ्वी की मिट्टी (Earth’s Crust) में पाए जाते हैं। और जब हमारे भीतर से ‘प्राण वायु’ (ऑक्सीजन का प्रवाह) निकल जाती है, तो यह शरीर वापस मिट्टी में मिल जाता है।
​चाहे हम उसे ‘मनु’ कहें, ‘आदम’ कहें या ‘एडम’—अलग-अलग छोर पर बैठे विचारकों ने अपनी-अपनी भाषा में एक ही सच को दर्ज किया था कि:

“यह इंसानी शरीर इसी धरती की मिट्टी का एक पुतला है, जिसे ब्रह्मांड की प्राण ऊर्जा (वायु) चला रही है।”

मेरा उद्देश्य किसी स्थापित मान्यता को चुनौती देना या किसी को उलझाना नहीं है। मैं तो बस एक जिज्ञासु हूँ जो यह देख पा रहा है कि हम सब बुनियादी तौर पर एक ही हैं। जब हमारी उत्पत्ति का विज्ञान एक है, तो फिर आपस में यह दूरियां क्यों?

​जनचौपाल36 का सवाल: एक जिज्ञासु के रूप में यह मेरा विचार है। जब आप इस भाषाई और वैज्ञानिक साम्य को देखते हैं, तो क्या आपको भी मानवता की यह अंतर्निहित एकता महसूस होती है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

​(श्रृंखला के अगले भाग में हम जानेंगे: ‘नर + मादा = नर्मदा’ — नदियों का मानवीकरण और भूगोल का रोमांस)

किरंदुल वार्ड-05 में कथित अतिक्रमण: नागरिकों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की

न्यूज़ डेस्क/09/07/2026 — रिपोर्ट: रवि सरकार

किरंदुल नगर के वार्ड क्रमांक 05 में मुख्य मार्ग पर कथित अवैध कब्जा और निर्माण को लेकर स्थानीय नागरिकों और प्रभावित परिवारों में तीखी नाराजगी फैल गई है।

यहां के लोगों का कहना है कि गौरव पथ के निर्माण के दौरान जिन परिवारों के घर, दुकान और रोजगार प्रभावित हुए थे, वे पिछले 5–6 वर्षों से नगर पालिका परिषद व प्रशासन से सहायता और पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं। इसी पेंडिंग शिकायत के बीच अब वार्ड-05 में विवादित निर्माण की खबरें सामने आने से असंतोष और भी गहरा गया है।

जनता की मुख्य चिंताएँ
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उक्त स्थल पहले से आवागमन के रास्ते के रूप में उपयोग में आता था। यदि यह सत्य पाया जाता है तो निजी निर्माण से आम जनता की सुविधा प्रभावित हो सकती है।

सरकारी सुविधाओं पर प्रभाव:
लोगों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में आंगनबाड़ी, सरकारी राशन दुकान और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े निर्माणों के समय भी विवाद उठ चुके हैं।

गौरव पथ पीड़ितों की व्यथा:
जिन परिवारों ने भू-संपत्ति और आजीविका खोई, उन्हें अभी तक समुचित सहायता नहीं मिली है; इसी वजह से कोई भी नया निर्माण उनकी भावनाओं को और ठेस पहुंचाता है।

प्रशासनिक पारदर्शिता की मांग:
नागरिकों ने जमीन की वास्तविक स्थिति, दस्तावेजों की वैधता और दी गयी अनुमति से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करने की मांग की है।

पार्षद के बयान का सन्दर्भ
वार्ड पार्षद यशोदा चुन्नम के कथन को कुछ लोगों ने इस विवाद का संकेत माना है। पार्षद के बयान के अनुसार संबंधित भूमि को लेकर पहले भी मतभेद रहे हैं, जिसके कारण क्षेत्र में जनभावना और असंतोष प्रकट हो रहा है। नागरिकों का कहना है कि भूमि से जुड़े दावों की सत्यता का निर्णय राजस्व अभिलेख, नगर पालिका रेकॉर्ड और प्रशासनिक जांच के बाद ही किया जाना चाहिए।

स्थानीय नागरिकों की मांगें
विवादित भूमि की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराना। निर्माण अनुमति संबंधी दस्तावेजों और उनकी वैधता का सार्वजनिक परीक्षण।
यदि भूमि सरकारी या सार्वजनिक उपयोग की निकली तो नियमों के अनुसार कड़ी कार्रवाई।
गौरव पथ परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और राहत के लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण।

प्रभाव और आगे की राह
स्थानीय लोग इस मामले को केवल भूमि-निर्माण विवाद के रूप में नहीं देख रहे; वे इसे प्रशासनिक पारदर्शिता, न्याय और जनविश्वास से जुड़ा मामला मानते हैं। फिलहाल नगर पालिका परिषद या संबंधित प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक निर्णय या बयान सार्वजनिक नहीं हुआ है। क्षेत्र की जनता और प्रभावित परिवार निष्पक्ष प्रशासनिक जांच व तथ्यात्मक स्पष्टता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


विकसित भारत का संकल्प: SBI RSETI के निःशुल्क राजमिस्त्री प्रशिक्षण से ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार की नई राह

बेमेतरा/छत्तीसगढ़ -09/07/2026

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा संचालित ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI), बेमेतरा ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार कार्य कर रहा है। इसी क्रम में ग्राम गोपालभैना में 30 दिवसीय निःशुल्क राजमिस्त्री (मेसन) प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को चिनाई, ईंट जोड़ाई, प्लास्टरिंग, नक्शा एवं ले-आउट पढ़ने, निर्माण सामग्री के सही उपयोग, गुणवत्ता नियंत्रण और कार्यस्थल सुरक्षा की जानकारी दी गई। अनुभवी प्रशिक्षकों ने युवाओं को व्यवहारिक प्रशिक्षण देकर निर्माण कार्य की आधुनिक तकनीकों से भी अवगत कराया।
कार्यक्रम में वित्तीय साक्षरता पर भी विशेष जोर दिया गया। प्रतिभागियों को बैंकिंग सेवाओं, डिजिटल लेन-देन, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना तथा बचत और ऋण योजनाओं की जानकारी दी गई, ताकि वे स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकें।
समापन समारोह में राज्य नियंत्रक आरसेटी अरुण सोनी, मूल्यांकन टीम के सदस्य राम बासु, चंदन साहू, ग्राम गोपालभैना के जनप्रतिनिधि एवं संस्थान के अधिकारी उपस्थित रहे। इस अवसर पर सफल प्रशिक्षुओं को प्रमाण-पत्र एवं टूल किट प्रदान किए गए।
अरुण सोनी ने कहा कि ग्रामीण युवा यदि कौशल के साथ आगे बढ़ें, तो वे न केवल स्वयं के लिए बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित कर सकते हैं। श्री कृष्णा चौधरी ने बताया कि इस तरह के प्रशिक्षण ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को नई दिशा दे रहे हैं।

यह पहल ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और विकसित भारत के संकल्प को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

रायपुर उरला फैक्ट्री दुर्घटना : मृतक श्रमिको के परिजनों को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा

फैक्ट्री हादसा न्यूज/ 09 जुलाई 2026

प्रारंभिक जांच के आधार पर तथा श्रमिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता, 2020 की धारा 38(1)(ए) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर कारखाना परिसर में संचालित सभी विनिर्माण गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से आगामी आदेश तक प्रतिबंधित कर दिया गया है।

इस संबंध में कारखाने के प्रबंधन को प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया गया है।औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग द्वारा दुर्घटना के कारणों की विस्तृत जांच जारी है। जांच प्रतिवेदन एवं उपलब्ध तथ्यों के आधार पर नियमानुसार आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

ग्राम बेन्द्री, उरला औद्योगिक क्षेत्र, थाना उरला, जिला रायपुर स्थित मेसर्स 3-डी इनोवेशन कारखाने में कल एक गंभीर औद्योगिक दुर्घटना हुई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, कारखाने के फेरो एलॉयज डिवीजन में संचालित फर्नेस में लांसिंग कार्य के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर में अचानक भीषण विस्फोट हो गया। इस दुर्घटना में कार्यरत तीन श्रमिक — श्री अरुण पाण्डेय, श्री लाल सिंह एवं श्री कमल सिंह — की दुःखद मृत्यु हो गई।

दुर्घटना की सूचना मिलते ही औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग की टीम तत्काल घटनास्थल पर पहुँची और स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान विस्तृत परीक्षण कर आवश्यक साक्ष्य एकत्र किए गए। मौके से फोटोग्राफ एवं वीडियो ग्राफ लिए गए तथा कारखाना प्रबंधन और श्रमिकों से प्रारंभिक पूछताछ कर दुर्घटना के कारणों की जांच प्रारंभ की गई।

विभाग द्वारा यह भी निर्देशित किया गया है कि प्रतिबंधात्मक अवधि के दौरान कारखाने में कार्यरत सभी श्रमिकों को नियमानुसार देय वेतन एवं अन्य भत्तों का भुगतान समय पर सुनिश्चित किया जाए।

विभाग के प्रयासों से कारखाना प्रबंधन ने प्रत्येक मृतक श्रमिक के परिजनों को 30-30 लाख रुपये की तत्काल आर्थिक सहायता राशि देने पर सहमति व्यक्त की है।



जीवन एक यात्रा : अनुशासन के 90 दिन से खुद को बदलने की यात्रा शुरू करिए

लाइफ स्टाइल डेस्क/09 जुलाई 2026

आप समझते हो वही आप हो।अगर आप सच में बदलना चाहते हैं तो शुरुआत स्वयं से करें। अगले 90 दिन का ये अनुशासन सरल लेकिन शक्तिशाली है-
सुबह 5 बजे से पहले उठें, दिन में दो घंटे जिम में बिताएँ, हेल्दी खाना खाएँ, फास्ट/जंक फूड से परहेज रखें, अनावश्यक बहस न करें और मोबाइल व टीवी पर समय बर्बाद न करें।

इन 90 दिनों में कोई नई स्किल सीखें और खुद से कसम खा लें — परिवर्तन दिखेगा।

छोटे नियम, बड़ा बदलाव — अपनी ज़िंदगी बदलने का रास्ता
परिवर्तन का पहला कदम है आत्मज्ञान। श्रीगुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि — यहाँ “निज” का अर्थ है अपने अहंकार को त्यागकर अपने मन के शीशे को साफ़ करना। गुरु की शरण और भक्ति हमारे चित्त के दर्पण को परिशुद्ध करते हैं; जब शीशा साफ होगा तब ही असल चेहरा नज़र आएगा। दूसरे को समझना मुश्किल है, अपनी आत्मा को जानना अभी सबसे बड़ा ज्ञान है।

आत्मज्ञान से अनुशासन तक — खुद को बदलने की योजना
धर्म और अध्यात्म इस राह के मार्गदर्शक हैं। हनुमान चालीसा जैसे भजन-स्तोत्र आज की व्यस्तता और मानसिक दबाव में भी अंतर्मन की शांति और राहत देते हैं — कई बार मेडिकल राहत का अनुभव भी लोगों ने बताया है। रोज़ थोड़ी प्रार्थना, ध्यान या जप से मन की अशांति घटती है और नया अनुशासन टिकता है।

कसम खुद से — हर रोज़ एक बेहतर आप
याद रखें—बदलाव बड़े-बड़े संकल्पों से नहीं, रोज़ छोटे कर्मों से आता है। 90 दिन का नियम आपको एक रूपरेखा देता है; पर असली काम आपके निरंतर, ईमानदार प्रयास का है। आज से खुद को जानें, छोटे नियम अपनाएँ और हर दिन एक कदम आगे बढ़ें — आप बदलते हुए खुद को पायेंगे, और उस परिवर्तन में आनंद होगा।छोटे छोटे बदलाव ही जिंदगी को शिखर तक ले जाते हैं।बदलती दुनिया बदलते मौसम बदलते लोग तो आप क्यों नहीं बदलेंगे।


सरल जीवन, शांत मन और रोज़ का आभार,खुश रहने के हैं आधार

लाइफ स्टाइल डेस्क /09 जुलाई 2026

खुश रहना कोई जादू नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे नियमों का पालन है। ये छह नियम अपनाएँ और जीवन में सुकून और आनन्द भरता जाएगा।

हर दिन एक नया पन्ना है, कल की गलतियाँ आज की ताकत बन सकती हैं।
छोटी जीतों का जश्न मनाइए, बड़ी जीतें उन्हीं से बनती हैं।

कभी किसी से नफरत ना करें
नफरत मन को घायल करती है,दिल को जला राख धुंआ और राख पैदा करती है।दूसरों के प्रति दया और समझ रखिए,इससे मानसिक बोझ हल्का होगा और आप अंदर से हल्के महसूस करेंगे।

साधारण जीवन जियें, दिखावा ना करें
जो आवश्यक है वही चुनें। साधारण जीवन सीमित इच्छाओं और अधिक संतोष का रास्ता है। दिखावे से ऊर्जा बिखरती है, साधारणता से आनंद पनपता है।हमारा तो आदर्श वाक्य ही है सादा जीवन उच्च विचार।

कभी भी किसी चीज़ की ज़रूरत से ज़्यादा चिंता न करें — शांत रहें

चिंता का कोई लाभ नहीं है। चिंता मन की शक्ति को कमजोर करती है। वह बेवजह एक जाल बुनती है, कई सवाल खड़े करती है, और साथ ही अनेक शंकाएँ जन्म लेती हैं। समाधान चाहिए।
गहरी साँस लें, स्थिति पर विचार करें और कदम दर कदम कार्य करें। शांति बनी रहे तो बुद्धि साफ रहती है।

हर काम उम्मीद और खुशी के साथ करें
बिना लक्ष्य का जीवन नैया बिना पतवार के समान है।उम्मीद लक्ष्य देती है,खुशी प्रयास को सार्थक बनाती है। काम को बोझ न समझें—उसे सीखने और देने का माध्यम मानें। इससे मन का उत्साह बना रहेगा।

मुश्किलों में भी मुस्कुराते रहें
मुश्किलें आएँगी पर मुस्कान आपकी आंतरिक मजबूती दिखाती है। मुस्कान से शरीर में तनाव घटता है और समाधान के रास्ते खुलते हैं।मुसीबत में एक मुस्कान ला सको तो समझो जीवन को जीत लिए।मुस्कान सबसे सस्ती दवाई है—खुद पर और दूसरों पर प्रयोग करते रहो।
खुद से जुड़िए — रोज़ 15 मिनट आत्मचिंतन
हर रात 15 मिनट सिर्फ आप और आपकी डायरी,क्या अच्छा क्या बुरा। टीवी या मोबाइल नहीं। बुनियादी सवालों से शुरुआत करें—क्या अच्छा किया? कहाँ गलती हुई? कल क्या सुधारूँ? ईमानदारी से लिखिए; खुद पर कठोर न हों, आत्म-समझ अपनाएँ।जीवन उसी का है जो अच्छे और बुरे का पहचान रखता हो।

दैनिक क्रिया कलापों का आभार और सुधार
हर दिन तीन चीजें लिखें जिनके लिए आप आभारी हैं—छोटी चीज़ें भी गिनी जा सकती हैं। आभार मन को सकारात्मकता से भरता है और छोटी-छोटी खुशियों को बड़ा रूप देता है।

साप्ताहिक चिंतन समीक्षा:
आप खुद से एक मीटिंग करिए डायरी के साथ।हर सप्ताह अपने डायरी उत्तरों को पढ़ें। यह आपको बार-बार याद दिलाएगा कि आप आगे बढ़ रहे हैं,बदलाव छोटे-छोटे कदमों का परिणाम है।

ये नियम साधारण हैं पर नियमितता में शक्तिशाली बनते हैं। शुरुआत कठिन लगे तो एक नियम से शुरू करें—धीरे-धीरे बाकी जोड़ें। 90 दिन, या 30 दिन बाद, आप अपने भीतर के परिवर्तन महसूस करेंगे। खुश रहना एक अभ्यास है,रोज़ के छोटे निर्णय आपकी सबसे बड़ी ताकत हैं।

डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल किरंदुल के भारत स्काउट्स एवं गाइड्स ने दिया हरियाली का संदेश,

किरंदुल/बस्तर न्यूज – 08 जुलाई 2026

(रिपोर्ट रवि सरकार)

वृहत वृक्षारोपण अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का लिया संकल्प।

पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन तथा विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के उद्देश्य से भारत स्काउट्स एवं गाइड्स, छत्तीसगढ़ इकाई के अंतर्गत डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, किरंदुल में वृहत वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का नेतृत्व विद्यालय के प्राचार्य श्री एस.के. श्रीवास्तव ने किया।

इस अवसर पर विद्यालय परिसर हरियाली के संदेश से गूंज उठा और छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय परिसर में विभिन्न फलदार एवं छायादार पौधों के रोपण के साथ हुआ।

विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने मिलकर पपीता, अमरूद, आँवला, सहजन तथा नींबू सहित अनेक उपयोगी पौधे लगाए। इन पौधों का चयन इस उद्देश्य से किया गया कि भविष्य में ये न केवल पर्यावरण को शुद्ध बनाएंगे, बल्कि विद्यार्थियों को प्रकृति से जुड़ने तथा जैव विविधता के महत्व को समझने का अवसर भी प्रदान करेंगे।
इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य एस.के. श्रीवास्तव ने कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण केवल एक अभियान नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने विद्यार्थियों से अधिक से अधिक पौधे लगाने, उनकी नियमित देखभाल करने तथा अपने आसपास के लोगों को भी वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि एक पौधा भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है और यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम एक पौधे के संरक्षण का संकल्प ले, तो आने वाले वर्षों में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है।

कार्यक्रम में रेंजर लीडर श्रीमती तृप्ति श्रीवास्तव, गाइड कैप्टन सुश्री अनामिका एक्का, स्काउट मास्टर श्री नारायण प्रसाद, कब मास्टर श्री राकेश कुमार, गाइड कैप्टन श्रीमती सुरभी राव सहित विद्यालय के स्काउट्स-गाइड्स, रोवर-रेंजर एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता निभाई।

सभी ने पौधारोपण के साथ-साथ उनके संरक्षण एवं नियमित देखभाल का संकल्प भी लिया।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को वृक्षों के महत्व, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग के संबंध में भी जानकारी दी गई। शिक्षकों ने बताया कि वृक्ष न केवल ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि भूमि संरक्षण, वर्षा चक्र के संतुलन, प्रदूषण नियंत्रण तथा वन्य जीवों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह पर्यावरण संरक्षण के इस अभियान में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करे।

विद्यालय प्रबंधन ने बताया कि डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, किरंदुल में समय-समय पर पर्यावरण जागरूकता, स्वच्छता, जल संरक्षण एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि विद्यार्थियों में सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का विकास हो सके और वे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।

कार्यक्रम का समापन सभी उपस्थित विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं स्काउट्स-गाइड्स सदस्यों द्वारा हरित एवं स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण, लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल तथा अधिक से अधिक लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करने की सामूहिक शपथ के साथ हुआ। विद्यालय परिसर में लगाए गए पौधे आने वाले वर्षों में हरियाली के प्रतीक बनेंगे और पर्यावरण संरक्षण के इस संदेश को निरंतर आगे बढ़ाते रहेंगे।

भारतीय जनता मजदूर ट्रेड यूनियन काउंसिल ने विक्रम प्रताप सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया

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नई दिल्ली/रायपुर- 8 जुलाई 2026

भारतीय जनता मजदूर ट्रेड यूनियन काउंसिल (BJMTUC) ने संगठनात्मक विस्तार के तहत विक्रम प्रताप सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया है।

यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है।संगठन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आचार्य जी की अनुशंसा पर राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रजेश शर्मा ने विक्रम प्रताप सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है।

इसके साथ ही उन्हें ऑल इंडिया कैज़ुअल एंड कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर्स यूनियन सेक्टर का प्रभारी भी नियुक्त किया गया है। विक्रम प्रताप सिंह मूलतः उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के ग्राम गौरपार गांगुपार के निवासी हैं।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि विक्रम प्रताप सिंह संगठन द्वारा सौंपे गए सभी दायित्वों का अगले आदेश तक निर्वहन करेंगे। उनकी नियुक्ति की सूचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया तथा भारत सरकार के मुख्य श्रम आयुक्त को भी प्रेषित की गई है।

राष्ट्रीय नेतृत्व ने दी शुभकामनाएं

विक्रम प्रताप सिंह की नियुक्ति पर BJMTUC के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रजेश शर्मा, राष्ट्रीय महासचिव तारा पाठक, राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी दीपक पाण्डेय सहित संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारियों एवं विभिन्न राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों ने उन्हें बधाई देते हुए संगठन में स्वागत किया।

विक्रम प्रताप सिंह ने जताया आभार

नियुक्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए विक्रम प्रताप सिंह ने कहा कि संगठन ने जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ता पर भरोसा जताते हुए उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है।उन्होंने कहा कि संगठन में कार्य करने का अवसर मिलना उनके लिए सम्मान की बात है और वे मजदूरों के हितों की रक्षा तथा संगठन को मजबूत बनाने के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य करेंगे।

उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रजेश शर्मा, राष्ट्रीय महासचिव तारा पाठक तथा राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी दीपक पाण्डेय सहित संगठन के शीर्ष नेतृत्व का आभार व्यक्त किया।

हर घर जल – सूखते हैंडपंपों से सतही जल मॉडल तक, धमतरी की ‘सिर्री योजना’ ग्रामीण जल प्रबंधन की नई दिशा

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रायपर/छत्तीसगढ़ – न्यूज डेस्क 08 जुलाई 2026

हर घर जल’ केवल एक सरकारी लक्ष्य नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण विकास, जल संरक्षण और सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकता है।

गर्मियों में सूखते हैंडपंप, महिलाओं की लंबी जल-यात्राएं और दूषित भूजल से फैलने वाली बीमारियां इस संकट की गंभीरता को दर्शाती थीं। ऐसे समय में जल जीवन मिशन के तहत 130.40 करोड़ रुपये की सिर्री मल्टी विलेज स्कीम केवल एक पेयजल परियोजना नहीं, बल्कि ग्रामीण जल प्रबंधन की सोच में बदलाव का संकेत देती है।

धमतरी जिले के कुरूद विकासखंड में जल संकट केवल मौसमी समस्या नहीं था, बल्कि वर्षों से भूजल के लगातार दोहन का परिणाम था। क्षेत्र के ‘सेमी-क्रिटिकल जोन’ घोषित होने का अर्थ यह था कि पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भरता अब टिकाऊ नहीं रह गई थी।

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भूजल के बजाय नहर के सतही जल को पेयजल का स्रोत बनाती है। जल विशेषज्ञ लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि संकटग्रस्त क्षेत्रों में भूजल पर निर्भरता कम कर सतही जल का उपयोग ही स्थायी समाधान है। सिर्री योजना इसी सिद्धांत पर आधारित है।

इससे एक ओर ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मिलेगा, वहीं दूसरी ओर भूजल पर दबाव कम होने से जलस्तर के पुनर्भरण (रीचार्ज) की संभावना भी बढ़ेगी। यह जल संरक्षण और जल आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।

तकनीकी दृष्टि से भी यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक जल आपूर्ति प्रणाली का उदाहरण बन सकती है। नहर से पानी लेकर डांडेसरा स्थित सम्पवेल, आधुनिक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, मास्टर बैलेंसिंग रिजर्वायर और पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से 84 गांवों के लगभग 29,793 परिवारों तक शुद्ध पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।

चार जोनों में विभाजित वितरण प्रणाली यह सुनिश्चित करेगी कि अंतिम छोर के गांवों तक भी समान दबाव के साथ पानी पहुंचे। यह दर्शाता है कि योजना केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि संचालन और वितरण की व्यावहारिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इस परियोजना का सामाजिक प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट का सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है, जिनका बड़ा हिस्सा पानी लाने में व्यतीत होता है।

यदि घर-घर नियमित नल जल उपलब्ध होता है तो यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता में भी सकारात्मक बदलाव लाएगा।

साथ ही वैज्ञानिक तरीके से शुद्ध किए गए पानी की उपलब्धता डायरिया, पीलिया और अन्य जलजनित बीमारियों में कमी ला सकती है, जिससे ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

योजना की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका सामुदायिक प्रबंधन मॉडल है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों (VWSC) और ग्राम पंचायतों को संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपना इस बात का संकेत है कि सरकार केवल आधारभूत संरचना बनाकर नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक संचालन को भी स्थानीय भागीदारी से जोड़ना चाहती है।

यदि यह मॉडल प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो योजनाओं की स्थिरता और जवाबदेही दोनों मजबूत होंगी।

मगरलोड विकासखंड की प्रस्तावित मेघा मल्टी विलेज स्कीम को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। यदि दोनों परियोजनाएं समयबद्ध और प्रभावी रूप से संचालित होती हैं, तो धमतरी जिले का बड़ा हिस्सा जल संकट से स्थायी राहत की दिशा में बढ़ सकता है।

वृक्षारोपण पर जोर :उद्योगों के लिए अब सिर्फ उत्पादन नहीं, हरित जवाबदेही भी जरूरी

रायपुर न्यूज डेस्क – 08 जुलाई 2026

समीक्षा बैठक में सरकार ने अब स्पष्ट कर दिया है कि केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी जीवित रहने की दर सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है।

बैठक में उद्योगों को अपने परिसर के कम से कम 33 प्रतिशत क्षेत्र में ग्रीन बेल्ट विकसित करने, प्रति हेक्टेयर 2,500 पौधे लगाने और त्रि-स्तरीय पौधारोपण अपनाने के निर्देश इस बात का संकेत हैं कि सरकार अब प्रतीकात्मक वृक्षारोपण के बजाय वैज्ञानिक और स्थायी हरित विकास पर जोर दे रही है।

मानसून 2026 के दौरान छत्तीसगढ़ में उद्योगों द्वारा किए जा रहे वृक्षारोपण कार्यों की समीक्षा केवल एक नियमित प्रशासनिक बैठक नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि राज्य अब औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय जवाबदेही को भी समान प्राथमिकता देना चाहता है।

छत्तीसगढ़ जैसे औद्योगिक और खनिज संपदा से समृद्ध राज्य में उद्योगों का विस्तार लगातार हो रहा है। ऐसे में बढ़ते प्रदूषण और घटते हरित क्षेत्र के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

बैठक का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरणीय निगरानी प्रणाली को मजबूत करना भी रहा। उद्योगों को 24 घंटे ऑनलाइन उत्सर्जन निगरानी प्रणाली संचालित रखने और उसका नियमित कैलिब्रेशन कराने के निर्देश बताते हैं कि अब पर्यावरणीय अनुपालन केवल कागजी प्रक्रिया नहीं रहेगा, बल्कि तकनीकी निगरानी के माध्यम से उसकी लगातार समीक्षा की जाएगी। इससे प्रदूषण नियंत्रण की पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ सकती हैं।

बरगद, पीपल, नीम और आम जैसी स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाने पर दिया गया जोर भी महत्वपूर्ण है।

स्थानीय प्रजातियां न केवल बेहतर जीवित रहती हैं, बल्कि जैव विविधता, भूजल संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूत करती हैं। यह दृष्टिकोण केवल हरियाली बढ़ाने तक सीमित नहीं, बल्कि प्राकृतिक संतुलन को पुनर्स्थापित करने की दिशा में भी एक कदम है।

हालांकि, इन निर्देशों की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उद्योग इन्हें कितनी गंभीरता से लागू करते हैं और निगरानी एजेंसियां इनके पालन को कितना प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करती हैं।

यदि वृक्षारोपण केवल औपचारिकता बनकर रह गया तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे।

लेकिन यदि पौधों का संरक्षण, ग्रीन बेल्ट का विकास और उत्सर्जन की निगरानी नियमित रूप से होती रही, तो यह पहल औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रभावी मॉडल बन सकती है।