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Saturday, October 31, 2026
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पंपों में इथेनॉल वाला पेट्रोल : अनिवार्य E-20 पर बवाल क्यों, और सरकार का जवाब क्या है?

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डिजिटल डेस्क/12 जुलाई 2026

अधिसूचना के मुताबिक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में BIS मानकों के तहत 20% इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल की ही सप्लाई होगी। सरकार का तर्क साफ है – तेल आयात घटाना, प्रदूषण कम करना और किसानों की आमदनी बढ़ाना। सरकार का अगला लक्ष्य इसे E85 और E100 तक ले जाना है ताकि गाड़ियां पेट्रोल के बिना भी दौड़ सकें।

पेट्रोल पंप पर अब आपके पास विकल्प नहीं बचा है। केंद्र सरकार ने 17 फरवरी 2026 की अधिसूचना के बाद 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में E20 पेट्रोल बेचना अनिवार्य कर दिया है। यानी अब सभी तेल कंपनियों को न्यूनतम 95 RON वाला, 20% इथेनॉल मिला पेट्रोल ही बेचना होगा।

फिर विवाद कहां से शुरू हुआ?
जैसे ही E20 अनिवार्य हुआ, सोशल मीडिया पर दो तरह की पोस्ट वायरल हो गईं:

लोगों की शिकायतें:
X, Facebook और Instagram पर हजारों यूजर्स ने दावा किया कि E20 डालने के बाद माइलेज 10-15% गिर गया, पुरानी बाइक-कार में स्टार्टिंग की समस्या, रबर पाइप और फ्यूल पंप खराब हो रहे हैं। कई मैकेनिकों के वीडियो में कहा गया कि 2015-2020 की गाड़ियां E10 के लिए बनी हैं, E20 के लिए नहीं।

बीमा को लेकर डर:
अफवाह उड़ी कि E20 से गाड़ी खराब हुई तो इंश्योरेंस कंपनी क्लेम रिजेक्ट कर देगी।

सरकार को इस पर दो स्तर पर सफाई देनी पड़ी।
PIB फैक्ट चेक ने आधिकारिक तौर पर कहा कि E20 से बीमा पॉलिसी पर कोई असर नहीं पड़ेगा, ये दावे पूरी तरह फर्जी हैं।

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी कहा कि E20 से वाहनों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, विवाद बेबुनियाद है।

नितिन गडकरी की सीधी चुनौती – “गाड़ी लाकर दिखाओ”

सबसे तीखा बयान केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का रहा। SIAM के सालाना सम्मेलन में उन्होंने कहा कि E20 को लेकर कोई तकनीकी समस्या नहीं है।

खबर सूत्रों के कथन पर
केंद्रीय मंत्री गडकरी ने आरोप लगाया कि उनके और सरकार के खिलाफ “पैसे देकर सोशल मीडिया कैंपेन चलाया जा रहा है, ये राजनीतिक रूप से प्रेरित है”।

उन्होंने दो टूक कहा कि एक “पेट्रोलियम लॉबी” जानबूझकर भ्रम फैला रही है कि E20 इंजन को नुकसान पहुंचाता है, जबकि भारत और दुनिया में इसका सफल प्रयोग हो चुका है।

प्राप्त खबर सूचना के आधार पर
एक अन्य कार्यक्रम में उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा – “अगर किसी की गाड़ी E20 से खराब हुई है, तो उसे सामने लाएं, सबके सामने टेस्ट कराएंगे।” यही बयान अब हेडलाइन बन गया है।

सरकार ने संसद में भी स्पष्ट किया था कि अप्रैल 2023 के बाद बनी सभी गाड़ियां E20 कम्पैटिबल हैं, और BIS और ऑटो इंडस्ट्री के टेस्ट में E20 से स्टार्टिंग या प्लास्टिक-मेटल पार्ट्स पर कोई बुरा असर नहीं मिला है।

जमीन पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या कहती है?

समर्थन में तर्क: किसान संगठनों और पर्यावरण समर्थकों का कहना है कि गन्ना, मक्का से इथेनॉल बनने से उन्हें सीधा फायदा होगा और कार्बन उत्सर्जन घटेगा।

विरोध में 3 बड़े सवाल:
पुरानी गाड़ियों का क्या? भारत में 60% से ज्यादा दोपहिया 2020 से पहले के हैं।
माइलेज: इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी पेट्रोल से कम है, इसलिए थ्योरी में माइलेज 2-6% कम हो सकता है, कंपनियां इसे मानती भी हैं।
विकल्प खत्म: पहले E10 और E20 दोनों उपलब्ध थे, अब सिर्फ E20 अनिवार्य होने से उपभोक्ता के पास चॉइस नहीं बची।

फिलहाल स्थिति यह है कि सरकार पीछे हटने के मूड में नहीं है। पंपों पर अब E20 ही मिलेगा, और सरकार इसे किसान हित और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का बड़ा सुधार बता रही है, जबकि सोशल मीडिया पर #E20Failed और #EthanolPetrol ट्रेंड के जरिए बहस जारी है।

जन चौपाल 36 की बात
आपको पंप पर E20 मिला तो आपकी गाड़ी में कोई फर्क लगा क्या? माइलेज या स्टार्टिंग में बदलाव देखा आपने?
जो भी है,, ईरान अमेरिका तनाव के बीच जो भी निर्णय देशहित में लिया जायेगा उसे सबको स्वीकार करना है।

(BNS)भारतीय न्याय संहिता के 2 साल पूरे: जानिए 5 बड़े बदलावों से आसान हुई न्याय प्रणाली

नई दिल्ली /रायपुर/ बेमेतरा 12 जुलाई 2026

उपलब्ध जानकारी के अनुसार (BNS)भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव को दो साल पूरे हो गए हैं। 1 जुलाई 2024 को अंग्रेजों के जमाने के IPC-CrPC की जगह लागू हुई BNS-BNSS-BSA, दो साल बाद जमीनी असर दिखने लगा है।

नई न्याय व्यवस्था के लिए देश भर में भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू किए गए थे, जिन्होंने 1860 के IPC और 1973 के CrPC जैसे औपनिवेशिक कानूनों की जगह ली थी।

शुरुआत में सवाल था कि क्या सिर्फ कानूनों के नाम बदलेंगे या सच में आम आदमी को फायदा होगा? दो साल के आंकड़े और जमीनी रिपोर्ट बताते हैं कि पुलिसिंग और शिकायत की प्रक्रिया में 5 बड़े बदलाव साफ तौर पर दिखे हैं।

1. e-FIR से थाने के चक्कर खत्म
BNSS की धारा 173 के तहत अब नागरिक ऑनलाइन FIR दर्ज करा सकते हैं। CCTNS पोर्टल पर शिकायत देकर 3 दिन के अंदर थाने में हस्ताक्षर करना होता है। इससे समय की बचत और पुलिस की जवाबदेही दोनों बढ़ी है।

2. Zero FIR: कहीं भी दर्ज कराएं शिकायत
अपराध कहीं भी हुआ हो, अब किसी भी थाने में FIR दर्ज होगी। पुलिस क्षेत्राधिकार का हवाला देकर लौटा नहीं सकती। बाद में केस को संबंधित थाने में ट्रांसफर किया जाता है। यह प्रावधान यात्रियों और महिलाओं के मामलों में सबसे ज्यादा मददगार साबित हुआ है।

3. क्राइम सीन की वीडियोग्राफी अनिवार्य
7 साल या उससे अधिक सजा वाले गंभीर अपराधों में अब घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फॉरेंसिक जांच अनिवार्य कर दी गई है। इससे सबूतों से छेड़छाड़ पर रोक लगी है और सजा की दर बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

4. महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सुरक्षा
नए नियमों में महिला पीड़िता का बयान महिला अधिकारी द्वारा ही दर्ज करने, और 15 साल से कम उम्र के बच्चे, 60 साल से अधिक के बुजुर्ग व दिव्यांगजनों का बयान उनके घर पर दर्ज करने का प्रावधान है।

5. नशे में अपराध पर और कड़ी सजा
BNS में 2026 में जोड़ा गया नया संशोधन धारा 24A कहता है कि स्वेच्छा से नशा करके किया गया गंभीर अपराध अब बचाव नहीं बनेगा। ऐसे मामलों में डेढ़ गुना तक अधिक सजा और 5 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।

क्या चुनौतियां अभी भी बाकी हैं?
केंद्र सरकार के अनुसार 8 लाख से ज्यादा पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी थानों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और पूरी ट्रेनिंग अभी भी बड़ी चुनौती है।

निष्कर्ष यही है कि भारतीय न्याय संहिता ने न्याय प्रणाली को आधुनिक, डिजिटल और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
(संक्षिप्त जानकारी पर आधारित)

नाम बड़ा या काम “क्या सूरज को पता है कि उसका नाम सूरज है?” अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग जिस सच को आधा छोड़ गए

डिजिटल डेस्क – 11जुलाई 2026

एक अनजान जिज्ञासु की विचार/ डायरी से…
आज हम सोशल मीडिया की एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ ज्ञान और तर्क नहीं, बल्कि सिर्फ़ पब्लिसिटी (प्रसिद्धि) का बोलबाला है। जब पूरी दुनिया सस्ती लोकप्रियता की होड़ में शामिल होकर डिजिटल पब्लिसिटी को ही सब कुछ मान बैठी है, तो क्यों न हम कुछ गूढ़ बातें करें? ताकि तथ्य और तर्कों के आधार पर, कम से कम इस मूढ़ता को कुछ गुढ़ता में बदला जा सके।

मान लीजिए, कल सुबह जब आप सोकर उठें और दुनिया के सारे इंसान यह भूल जाएं कि किस चीज़ को क्या कहते हैं। आपके सामने खड़ी एक गाय को देखकर आपके मुंह से कोई शब्द न निकले, आसमान में चमकते उस दहकते गोले को देखकर आप शांत रह जाएं।

तब क्या होगा? क्या वह गाय गायब हो जाएगी? क्या वह दहकता हुआ गोला रोशनी देना बंद कर देगा?
नहीं! वे सब वैसे ही रहेंगे जैसे आज हैं।

यहीं से वह तीखा और मौलिक सवाल पैदा होता है, जो आज के विकसित समाज की मान्यताओं का सार है—“क्या गाय को पता है कि उसका नाम गाय है? क्या सूरज जानता है कि इंसान उसे सूरज या सन (Sun) कहकर बुलाता है?”

जवाब है—बिल्कुल नहीं। पूरे ब्रह्मांड पूरी सृष्टि की किसी भी वस्तु का अपना कोई नाम नहीं होता। नाम तो इंसानी चेतना का वह ‘खेल’ है, जो हमने इस असीम संसार को अपनी छोटी सी बुद्धि में समेटने के लिए रचा है।

नामकरण का असली विज्ञान: नाम वस्तु का नहीं, ‘ध्वनि’ का है
आधुनिक विज्ञान (पदार्थ विज्ञान) जहाँ जाकर अपनी सीमाएं खत्म कर देता है, हमारे पूर्वजों का अध्यात्म और चेतना का विज्ञान ठीक वहीं से शुरू होता है। विज्ञान कहता है कि सामने टेबल पर रखी चीज़ ‘लकड़ी’ है, क्योंकि उसके मॉलिक्यूल्स (अणु) वैसे हैं। लेकिन अध्यात्म पूछता है कि उसे ‘लकड़ी’ या ‘Wood’ नाम किसने दिया?

जब इस धरती पर पहली बार इंसानी चेतना ने होश संभाला, तो उसने ब्रह्मांड से आने वाली तरंगों को डिकोड करना शुरू किया।

ध्वनि तरंगों का रहस्य:
हमारे ऋषियों ने समझा कि ब्रह्मांड में सब कुछ ‘कंपन’ (Vibration) है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में एक विशेष चेतना पैदा होती है। उस चेतना को व्यक्त करने के लिए गले से जो हवा निकली, उसने एक ‘ध्वनि’ (Sound Wave) का रूप लिया।

सूरज और नाम का दर्शन:
हमने उस आग के गोले को देखा, उससे निकलने वाली ऊर्जा को महसूस किया और हमारी चेतना ने एक ध्वनि चुनी—‘सूर्या’। यह नाम उस गोले का नहीं है, यह नाम उस गोले को देखकर हमारे भीतर पैदा हुई ‘अनुभूति की ध्वनि तरंग’ का है।

विज्ञान जहाँ रुकता है, अध्यात्म वहाँ रास्ता खोलता है
आज के महान वैज्ञानिक क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics) में उलझे हुए हैं। वे कहते हैं कि “जब तक कोई देखने वाला (Observer) नहीं होता, तब तक पदार्थ का अस्तित्व तय नहीं होता।”
यही बात तो हमारा दर्शन सदियों से कह रहा है! नाम वस्तुओं के भीतर नहीं छिपा है, नाम उसे ‘देखने वाली चेतना’ (इंसान) के भीतर है। अगर इस धरती से सारे इंसान गायब हो जाएं, तो नाम की यह पूरी मायावी दुनिया एक सेकंड में ढह जाएगी।

प्रकृति फिर से अपने उस मौन और आदिम रूप में आ जाएगी, जहाँ न कोई ‘गाय’ होगी, न ‘सूरज’, न ‘ईश्वर’ और न ‘शैतान’। वहाँ सिर्फ एक अनंत, बिना नाम की ऊर्जा होगी।

जिज्ञासु का निष्कर्ष: शब्दों के जाल से बाहर निकलिए
हम इंसानों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने चेतना द्वारा बनाए गए ‘नामों’ और ‘शब्दों’ को ही अंतिम सत्य मान लिया। हम नामों पर लड़ रहे हैं, हम भाषाओं पर दीवारें खींच रहे हैं, हम प्रतीकों के पीछे एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हैं।

जबकि सच यह है कि जिसे आप ‘गाय’ कहकर पूज रहे हैं या जिसे विज्ञान ‘बॉस इंडिकस’ (Bos indicus) कह रहा है, वह इन सारे शब्दों से परे प्रकृति की एक मूक, मासूम और पवित्र चेतना है। नामकरण का यह विज्ञान हमें यह सिखाता है कि ब्रह्मांड की हर चीज़ आपस में एक अदृश्य ध्वनि और चेतना की डोरी से जुड़ी हुई है।

जनचौपाल36 का तीखा सवाल:
जब आप शब्दों और नामों के इस भ्रमजाल को हटाकर दुनिया को देखते हैं, तो क्या आपको ब्रह्मांड का वह मौन सत्य सुनाई देता है? क्या आज का विज्ञान सचमुच इस चेतना को कभी नाप पाएगा? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें और इस वैचारिक क्रांति का हिस्सा बनें।

कोटा को फिर मिलेगी खोई हुई पहचान, 80 करोड़ से संवरेगा ऐतिहासिक चम्बल गार्डन, ओम बिरला करेंगे शिलान्यास

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डिजिटल/न्यूज – 11 जुलाई 2026

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज के माध्यम से इस ऐतिहासिक धरोहर के कायाकल्प का ऐलान किया है।जीवनदायिनी माँ चम्बल कोटा की आत्मा है और उसी के किनारे बसा ऐतिहासिक चम्बल गार्डन एक बार फिर अपनी खोई हुई चमक पाने जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब 80 करोड़ रुपये की लागत से चम्बल गार्डन का समग्र पुनर्विकास किया जाएगा। नगर निगम कोटा दक्षिण द्वारा विशेषज्ञों की सलाह से इसकी विस्तृत डीपीआर तैयार की जा चुकी है। कल, 11 जुलाई को इसके पुनर्विकास कार्य का विधिवत शिलान्यास किया जाएगा।

ओम बिरला ने विश्वास जताया है कि दो वर्ष बाद जब पर्यटक यहाँ आएंगे, तो चम्बल गार्डन केवल घूमने का स्थान नहीं रहेगा, बल्कि आधुनिक शहरी विकास, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम बनकर उभरेगा। योजना के तहत 20 मीटर चौड़ा भव्य हेरिटेज प्रवेश द्वार, नया टॉय ट्रेन स्टेशन, स्मार्ट ऑक्सीजन पार्क, ओपन जिम और पर्यटन सुविधाओं का विकास किया जाएगा। यह परियोजना कोटा के 2000 करोड़ के समग्र विकास पैकेज का हिस्सा है।

उन्होंने स्वीकार किया कि समय के साथ आधुनिक सुविधाओं के अभाव और बदलती आवश्यकताओं के कारण इस ऐतिहासिक गार्डन की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ती गई। फव्वारे बंद हो गए, टॉय ट्रेन थम गई, झूले टूट गए और गेट जर्जर हो गए। लेकिन अब इस विरासत को फिर से जीवंत करने का संकल्प लिया गया है।

ओम बिरला ने अपनी भावुक पोस्ट में लिखा है कि चम्बल गार्डन केवल एक उद्यान नहीं, बल्कि कोटा ही नहीं पूरे हाड़ौती अंचल की पहचान हुआ करता था। एक दौर था जब बाहर से आने वाला हर अतिथि सबसे पहले चम्बल गार्डन देखने की इच्छा रखता था। बच्चों की छुट्टियाँ हों, परिवार के साथ बिताई गई सुनहरी शामें हों, स्कूलों की पिकनिक हो या पर्यटकों का भ्रमण, चम्बल गार्डन हर किसी की यादों का अभिन्न हिस्सा रहा है। इस उद्यान से कोटा की कई पीढ़ियों की भावनाएँ और अनगिनत स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं।

निश्चित रूप से यह कोटा वासियों के लिए गर्व का क्षण है कि उनकी यादों का चम्बल गार्डन फिर से नई पहचान के साथ लौट रहा है।

हरिद्वार कांवड़ यात्रा 2026 की तैयारियां तेज, मुख्य यात्रा 30 जुलाई से

हरिद्वार/मुजफ्फरनगर, 11 जुलाई 2026

हरिद्वार की मुख्य कांवड़ यात्रा 30 जुलाई 2026 से ही शुरू हो रही है, क्योंकि सावन मास इस साल 30 जुलाई, गुरुवार से प्रारंभ हो रहा है। आज की खबर कांवड़ यात्रा का ट्रैफिक प्लान और सुरक्षा तैयारियों का ट्रायल है।

शिवभक्तों के लिए महत्वपूर्ण सूचना। इस वर्ष 2026 में पवित्र सावन माह और कांवड़ यात्रा की आधिकारिक शुरुआत 30 जुलाई 2026, गुरुवार से होगी। सावन की शिवरात्रि पर जलाभिषेक के साथ यात्रा अपने चरम पर होगी।
कई मीडिया रिपोर्ट्स में 11 जुलाई से यात्रा शुरू होने की बात कही जा रही है, जो वस्तुतः यात्रा के लिए लागू किए जा रहे यातायात प्रतिबंधों और प्रशासनिक तैयारियों की शुरुआत की तिथि है।

प्रशासन ने यात्रा से करीब 20 दिन पहले ही कमर कस ली है। मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जारी आदेश के अनुसार, 11 जुलाई से दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग और गंगा नहर मार्ग पर भारी वाहनों के लिए ट्रायल के तौर पर रोक शुरू की गई है, ताकि 30 जुलाई से शुरू होने वाली मुख्य यात्रा के दौरान किसी प्रकार का जाम या अव्यवस्था न हो।

दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे पर 19 जुलाई की रात से भारी वाहनों की एंट्री बंद करने का प्रस्ताव है, जो 30 जुलाई के बाद पूरी तरह सख्त हो जाएगा।

कमिश्नर मेरठ मंडल ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि 30 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा-2026 के लिए शिविर, पेयजल, शौचालय, प्रकाश और चिकित्सा की संपूर्ण कार्ययोजना समय से पहले तैयार कर ली जाए।

हरिद्वार में 9 से 17 जुलाई तक जो डायवर्जन की खबर है, वह कांवड़ियों के आगमन से पहले सड़क मरम्मत और अतिक्रमण हटाने के लिए किया गया अस्थायी प्रबंधन है।

अतः श्रद्धालुओं से निवेदन है कि भ्रमित न हों। गंगाजल भरने के लिए हरिद्वार प्रस्थान की सही तिथि 30 जुलाई से ही मान्य होगी।

बिजली बिल में करंट – महंगाई की मार के बीच बिजली का एक और झटका

संपादकीय लेख 11 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ विद्युत पावर वितरण कंपनी ने छत्तीसगढ़ की जनता को झटका देते हुए जुलाई माह में ही बढ़ते बिल का भारीपन दिखा दिया।जुलाई माह का बिजली बिल हाथ में आते ही छत्तीसगढ़ के आम घरों में एक ही चर्चा है – बिल फिर बढ़ गया।

छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग का 15 जून का आदेश भले ही कागजों पर पुराना हो, लेकिन उसका असली दर्द अब 1 जुलाई से लागू होने के बाद जनता की जेब पर दिखने लगा है। औसतन 6.23 प्रतिशत की यह बढ़ोतरी, जिसे सरकार 24 प्रतिशत की मांग के मुकाबले राहत बता रही है, जमीनी हकीकत में राहत नहीं, बल्कि बोझ ही है।

आम जनता पहले से ही बढ़ती महंगाई से त्रस्त है। आटा, दाल, तेल, सब्जी से लेकर बच्चों की किताबों तक हर वस्तु के दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे समय में जब सरकार से उम्मीद थी कि वह घर के बुनियादी खर्चों को नियंत्रित करेगी, बिजली जैसी मूलभूत आवश्यकता पर दाम बढ़ाकर सरकार ने घरों पर एक और बोझ लाद दिया है। औसत दर 6.71 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच जाना छोटे परिवारों, किसानों और दिहाड़ी मजदूरों के लिए सीधा मासिक बजट बिगाड़ने वाला फैसला है।

सरकार का प्रयास बिजली बिल को रोकने या वैकल्पिक राहत देने की ओर कहीं दिखाई नहीं दे रहा। वितरण कंपनी की 24 प्रतिशत की मनमानी मांग को खारिज करना कोई उपलब्धि नहीं है, क्योंकि 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी तब अन्याय है जब आय नहीं बढ़ रही। अस्पतालों और आदिवासी अंचलों में रियायत की बात कहकर पूरे प्रदेश के मध्यम वर्ग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आज जरूरत इस बात की थी कि सरकार सौर ऊर्जा, बिजली चोरी पर रोक और प्रशासनिक खर्चों में कटौती कर उपभोक्ताओं को राहत देती। लेकिन आसान रास्ता अपनाते हुए सीधे जनता की जेब पर हाथ डाला गया। यदि हर महीने इसी तरह महंगाई का करंट लगता रहा, तो छत्तीसगढ़ का आम आदमी बचत क्या, अपना घर चलाएगा कैसे?

‘नर + मादा = नर्मदा’ — नदियों का मानवीकरण और भूगोल का रोमांस

विचार डेस्क – 10 जुलाई 2026 (भाग 2)

एक अनजान जिज्ञासु की विचार/ डायरी से…
पिछले लेख में हमने देखा था कि कैसे इंसान की उत्पत्ति और उसके नामकरण के पीछे एक ही वैश्विक विज्ञान काम कर रहा था। आज हम अपनी जिज्ञासा की सुई को एक नए अध्याय की तरफ मोड़ते हैं। जब हम भारत के भूगोल को देखते हैं, तो यहाँ नदियों को केवल ‘पानी का बहता हुआ स्रोत’ नहीं माना गया, बल्कि उन्हें जीवित, महसूस करने वाली और भावनाएं रखने वाली चेतना के रूप में पूजा गया है।

बचपन से हम सबने अमरकंटक के पठार से निकलने वाली नर्मदा और शोणभद्र (सोन नदी) की एक पौराणिक प्रेम कहानी सुनी है।

कहानी कहती है कि दोनों का विवाह होने वाला था, लेकिन शोणभद्र के झुकाव किसी और नदी (जुहिला) की तरफ देखकर नर्मदा ने क्रोध में अपनी दिशा बदल ली और आजीवन अकेले बहने का फैसला किया।

लेकिन जब एक जिज्ञासु की नजर से मैंने इस लोककथा और भूगोल के नक्शे को एक साथ रखकर देखा, तो मुझे इसके पीछे प्राचीन विचारकों का एक बेहद गहरा दार्शनिक और वैज्ञानिक खेल समझ आया।

जल स्रोतों का मानवीकरण: ऋषियों की अनूठी तरकीब
ज़रा सोचिए, प्राचीन काल में जब हमारे पूर्वज—जिन्हें हम ऋषि-मुनि या उस दौर के वैज्ञानिक कह सकते हैं—इस धरती के भूगोल का अध्ययन कर रहे थे, तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी। वे जानते थे कि अगर वे आम जनता को केवल सूखी भौगोलिक भाषा में समझाएंगे कि
“मैकाल पर्वतमाला की ढलान और चट्टानों की संरचना ऐसी है कि यहाँ से पानी दो विपरीत दिशाओं में बहेगा,”
तो लोग इसे केवल एक सूचना की तरह पढ़ेंगे और भूल जाएंगे।

इंसान जिस चीज़ से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता, वह उसका सम्मान करना बंद कर देता है। इसलिए, उस दौर के महान चिंतकों ने जल स्रोतों का ‘मानवीकरण’ (Personification) कर दिया।

उन्होंने प्रकृति के इस अनोखे भौगोलिक विभाजन को एक अमर प्रेम कहानी का रूप दे दिया, ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इन नदियों को केवल ‘पानी के पाइप’ की तरह न देखें, बल्कि उनके प्रति एक आदर और जुड़ाव महसूस करें।

‘नर + मादा’ का संतुलन और अमरकंटक का भूगोल
नर्मदा नदी के नामकरण को लेकर जब हम अपने विचार को विस्तार देते हैं, तो एक बहुत ही सुंदर और तार्किक कड़ी सामने आती है: नर + मादा = नर्मदा।
यह कोई काल्पनिक बात नहीं, बल्कि एक भौगोलिक सत्य है।

सांख्य दर्शन कहता है कि यह पूरी सृष्टि दो मूल तत्वों के संतुलन से चलती है—’पुरुष’ (चेतना/नर) और ‘प्रकृति’ (ऊर्जा/मादा)। अमरकंटक के पठार पर यह दर्शन जीवंत हो उठता है:

शोणभद्र (सोन): भारतीय संस्कृति में बहुत कम नदियों को ‘नद’ यानी पुरुष का दर्जा मिला है, सोनभद्र उनमें से एक है (नर)।

नर्मदा: जिसे आदि-शक्ति और आनंद देने वाली नदी (मादा) माना गया है।

भौगोलिक सत्य: वैज्ञानिक रूप से देखें तो अमरकंटक से निकलते ही शुरुआती कुछ किलोमीटर तक ये दोनों जलधाराएं एक ही पठार पर बेहद पास-पास, मानो साथ-साथ बहती हैं। इसके बाद सोनभद्र उत्तर-पूर्व की ओर मुड़कर गंगा में विलीन होने चला जाता है, और नर्मदा पश्चिम की ओर मुड़कर बिल्कुल स्वतंत्र राह पकड़ लेती है।

प्राचीन लेखक ने इसी शुरुआती साथ को ‘प्रेम’ और फिर दोनों के अलग होने को ‘राहें जुदा होना’ कह दिया। यह ‘नर और मादा’ का ऐसा संतुलन है जो भारत के दो विशाल भूभागों को जीवन देता है। अगर ये दोनों नदियां एक ही दिशा में बह जातीं, तो देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्यासा रह जाता।

नर्मदा: स्वतंत्र चेतना का प्रतीक
दुनिया की लगभग हर नदी किसी न किसी बड़ी नदी में मिलकर अपनी पहचान खो देती है या अंत में सागर के सामने घुटने टेक देती है। लेकिन नर्मदा का स्वभाव अलग है। उसे सनातन संस्कृति में ‘कंवारी’ या ‘अविनाशी’ कहा गया है।

वह विंध्य और सतपुड़ा की कठोर चट्टानों को चीरती हुई, बिना किसी की सहायक नदी बने, सीधे अरब सागर में जाकर समाती है।

यह इस बात का प्रतीक है कि जब प्रकृति या जीवन की ऊर्जा अपने शुद्धतम रूप में होती है, तो वह अपनी राह खुद चुनती है। वह किसी के बंधन को स्वीकार नहीं करती।

जिज्ञासु का निष्कर्ष: प्रकृति से संवाद का विज्ञान
आज का आधुनिक विज्ञान नदियों को केवल हाइड्रो-पावर (बिजली) बनाने या सिंचाई का साधन मानता है। नतीजा हमारे सामने है—नदियां दूषित हो रही हैं और सूख रही हैं। लेकिन हमारे पूर्वजों का विज्ञान ‘विशिष्ट’ था। वे जानते थे कि जब हम नदी को ‘माता’ या एक ‘प्रेमी हृदय’ के रूप में देखेंगे, तो हम उसे गंदा करने से पहले सौ बार सोचेंगे।

‘नर और मादा’ के इस मिलन और अलगाव की कहानी को रचने वाले उस प्राचीन लेखक की सोच को मेरा नमन है, जिसने भूगोल को रोमांस में बदलकर हमारे भीतर प्रकृति के प्रति सम्मान का बीज बो दिया।

जन की जीवनधारा और हमारा कर्तव्य:
आज जब वर्षा ऋतु अपनी पूरी रंगत में है, तब हमें यह सोचना होगा कि हमारे पूर्वजों ने हर नदी का नामकरण करके उन्हें ‘माँ’ का दर्जा क्यों दिया था। माँ इसलिए, क्योंकि वे केवल पानी नहीं देतीं, बल्कि इस देश के जन-जीवन को पालती हैं।

आज देश के कई हिस्सों में गर्मियों में बूंद-बूंद पानी के लिए हाहाकार मचता है। इसका कारण यही है कि हमने नदियों और पानी से अपना वह भावनात्मक रिश्ता तोड़ लिया है जो हमारे पूर्वजों ने कहानियों के जरिए जोड़ा था।

(श्रृंखला के अगले भाग में हम टटोलेंगे: ‘गाय को नहीं पता उसका नाम गाय है’ — नामकरण, ध्वनि और चेतना का गहरा दर्शन)

बेमेतरा में कांग्रेस का उग्र प्रदर्शन: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का फूंका प्रतीकात्मक पुतला

लोकतंत्र की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता: आशीष छाबड़ा

बेमेतरा/छत्तीसगढ़ -10 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज के निर्देशानुसार, जिला कांग्रेस कमेटी बेमेतरा के तत्वावधान में आज नगर के सिग्नल चौक पर एक विशाल विरोध प्रदर्शन किया गया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने केंद्र एवं राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री का प्रतीकात्मक पुतला दहन किया।

विपक्ष की आवाज़ दबाने की हो रही कोशिश
इस अवसर पर जिला कांग्रेस कमेटी बेमेतरा के अध्यक्ष और पूर्व विधायक आशीष छाबड़ा ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा:

“केंद्र और राज्य की सरकारें लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर विपक्ष की आवाज़ को दबाने का प्रयास कर रही हैं। कांग्रेस नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला है। जनविरोधी नीतियों के माध्यम से जनता के अधिकारों का लगातार हनन हो रहा है।”

उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध की आवाज़ को कुचला नहीं जा सकता। कांग्रेस पार्टी इन तानाशाही प्रवृत्तियों का पुरजोर विरोध करती है और जनता के हितों, संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सड़क से लेकर सदन तक अपना संघर्ष जारी रखेगी।

वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की रही भारी मौजूदगी
इस गरिमामय और आक्रामक विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस के स्थानीय पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और भारी संख्या में कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लेकर लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित रहे: मंगत साहू, कविता साहू, प्रांजल तिवारी, राजू साहू, मिथलेश वर्मा, अश्वनी अनंत, रश्मि मिश्रा, देवेंद्र साहू, रीता पाण्डेय, शकुंतला साहू, विजय बघेल, सनत धर दिवान, बहल वर्मा, रवि रजक, ऋषि वर्मा, ललित विश्वकर्मा, मनोज शर्मा, जावेद खान, मोहित वर्मा, निलेश ठाकुर, मोंटू तिवारी, अजय राज सेन, शिव वर्मा, जोगेंदर छाबड़ा, जनता साहू, योगिता साहू, प्रतीक दुबे, ऋतिक तिवारी, वतन मिश्रा, भीखम साहू, प्रकाश ठाकुर, टोकेश्वर साहू, रामसजीवन, चितरेन वर्मा, महानंद यादव, राम ठाकुर, मनीष परिहार, राजा साहू, विकास चौबे, संजय वर्मा, महेंद्र साहू, सीताराम यदु, प्रकाश साहू, संस्कार शर्मा, निलेश वैष्णव, कृपा राम वर्मा, जयप्रकाश राज, कोमल पुरी गोस्वामी, राहुल जोशी, शुभम सोनी, राजेश नवरंगे, घनश्याम देवांगन सहित सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता।

ARTO अधिकारी के घर विजिलेंस का छापा; नोट गिनने की मशीनें मंगानी पड़ीं, करोड़ों के हीरे-जवाहरात और नकदी बरामद

डिजिटल डेस्क लखनऊ -10/07/2026

समाचार उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। सतर्कता अधिष्ठान (Vigilence Department) की टीम ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में लखनऊ के एक एआरटीओ (ARTO) अधिकारी के आवास पर तड़के छापेमारी की। इस कार्रवाई में जो बेहिसाब संपत्ति मिली है, उसे देखकर खुद जांच अधिकारी भी दंग रह गए।

​अलमारियों से निकला ‘कुबेर का खजाना’

​विजिलेंस टीम जब तड़के अधिकारी के वीआईपी इलाके में स्थित आवास पर पहुंची, तो शुरुआती तलाशी में ही बेहिसाब दौलत का खुलासा होने लगा। सूत्रों के मुताबिक, घर के अंदर छुपाकर रखे गए लॉकरों और गुप्त अलमारियों से करोड़ों रुपये मूल्य के सोने-चांदी के बिस्कुट, बेशकीमती हीरे के जवाहरात और भारी मात्रा में नकदी (कैश) बरामद की गई है।

​नोट गिनने के लिए मंगानी पड़ीं मशीनें

​बरामद की गई नकदी इतनी ज्यादा थी कि हाथ से गिनना असंभव हो गया। इसके बाद विजिलेंस अधिकारियों ने पास के बैंक से संपर्क कर नोट गिनने की तीन मशीनें मंगवाईं। देर रात तक चली इस नोटों की गिनती में करोड़ों रुपये की नकदी सामने आने की बात कही जा रही है।

​बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज भी जब्त

​नकदी और गहनों के अलावा, टीम को अधिकारी के घर से कई बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज, लग्जरी गाड़ियों के कागजात और लखनऊ सहित अन्य महानगरों में करोड़ों के फ्लैट व जमीनों की रजिस्ट्रियां मिली हैं।

​विजिलेंस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “अधिकारी के खिलाफ लंबे समय से भ्रष्टाचार और काली कमाई की शिकायतें मिल रही थीं। पुख्ता सबूतों के आधार पर कोर्ट से वारंट लेकर यह कार्रवाई की गई है। जब्त की गई संपत्ति का आधिकारिक मूल्यांकन किया जा रहा है और आरोपी अधिकारी के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के तहत मुकदमा दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”

BSNL ने लॉन्च किया सैटेलाइट फोन :बिना मोबाइल नेटवर्क के भी होगी बात, जानें कीमत और नियम

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नई दिल्ली-10/07/2026

सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) ने भारतीय बाजार में एक नया और बेहद शक्तिशाली सैटेलाइट फोन लॉन्च कर दिया है। यह फोन विशेष रूप से उन दुर्गम और दूरदराज के इलाकों के लिए गेम-चेंजर साबित होगा, जहाँ पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क (टावर) पूरी तरह फेल हो जाते हैं या पहुँच ही नहीं पाते। जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, यह फोन सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से कनेक्ट होकर काम करता है।

दिग्गज कंपनी Inmarsat के साथ पार्टनरशिप
BSNL ने आधिकारिक तौर पर जानकारी दी है कि इस एडवांस हैंडसेट को ग्लोबल सैटेलाइट नेटवर्क प्रोवाइडर Inmarsat के साथ मिलकर डेवलप किया गया है। इस साझेदारी की वजह से यूज़र्स को दुनिया के सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित सैटेलाइट नेटवर्क की कनेक्टिविटी मिलेगी।

रग्ड डिज़ाइन और दमदार बैटरी लाइफ
चूँकि इस फोन का इस्तेमाल बेहद कठिन परिस्थितियों में होना है, इसलिए कंपनी ने इसके डिज़ाइन और बिल्ड क्वालिटी पर खास ध्यान दिया है:

ड्यूरेबल और रग्ड बॉडी: यह फोन ऊंचाई से गिरने पर भी आसानी से नहीं टूटेगा। इसे धूल, मिट्टी और खराब मौसम को झेलने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है।

लंबी बैटरी लाइफ: आपातकालीन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसमें बेहद दमदार बैटरी दी गई है, जो बिना चार्ज किए लंबे समय तक चलती है।

आम जनता के लिए नहीं है यह फोन, इन सेक्टर्स को होगा बड़ा फायदा
BSNL इस फोन को किसी आम स्मार्टफोन की तरह आम जनता के लिए मार्केट नहीं कर रही है। कंपनी के मुताबिक, यह सैटेलाइट फोन निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त और जीवन रक्षक साबित हो सकता है:
रक्षा बल (Defense) और आपदा प्रबंधन (Disaster Management)
समुद्री क्षेत्र (Maritime) और माइनिंग (Mining)
रिमोट ऑपरेशन्स और एडवेंचर ट्रैवलर्स (Trekking/Expeditions)

⚠️ बेहद जरूरी कानूनी चेतावनी:
खरीदने से पहले जान लें यह नियम भारत में बिना अनुमति के सैटेलाइट फोन रखना या उसका इस्तेमाल करना पूरी तरह से गैरकानूनी है। अगर आप इस फोन को खरीदने का मन बना रहे हैं, तो आपको सबसे पहले भारत सरकार के संबंधित विभाग से इसके लिए आधिकारिक परमिशन (Licence/Permission) लेनी होगी। बिना अनुमति के इस फोन को खरीदना या अपने पास रखना आपको बड़ी कानूनी मुश्किलों और जेल की हवा खिला सकता है।

कीमत और कहाँ से खरीदें?
सरकारी कंपनी के इस हाई-टेक सैटेलाइट फोन की कीमत 1,34,166 रुपये तय की गई है। अगर आपके पास सरकार की वैध अनुमति है, तो आप इसे अपने नजदीकी BSNL ऑफिस पर जाकर जरूरी दस्तावेज़ जमा करके खरीद सकते हैं।