जब चारा ही दुश्मन बन जाए — महादेव की 70 भेड़ें, एक रात में सब खत्म
महाराष्ट्र/अकोला -16 जून 2026
महाराष्ट्र के अकोला जिले के तांदली शिवार में चरवाहे महादेव शिंगाडे अपनी 150 भेड़ों को लेकर निकले थे — रोज की तरह, उसी जमीन पर, उसी उम्मीद के साथ।
लेकिन उस दिन खेत में उगे नए अंकुरों ने धोखा दे दिया। भेड़ों ने जो चारा खाया वो चारा नहीं, जहर था। देखते ही देखते एक-एक कर 70 भेड़ें तड़पकर मर गईं। बची हुई भेड़ों की हालत भी गंभीर है।
महादेव के हाथ में अब सिर्फ सरकार से मदद की गुहार बची है। 70 भेड़ें यानी 10 से 12 लाख रुपये — एक चरवाहे की पूरी जिंदगी की कमाई, एक दोपहर में राख।
एक खबर, एक सवाल
यह सिर्फ महादेव की त्रासदी नहीं है।
यह उस धरती की कहानी है जो बदल रही है — चुपचाप, अंदर से।
सदियों से चरवाहा उसी जमीन पर चला। उसी मिट्टी को पहचाना। उसी हरियाली को जाना। लेकिन आज वही धरती पहचान में नहीं आ रही।
क्योंकि हमने उसे बदल दिया।
रसायन उसकी मिट्टी में उतर गए। कीटनाशक उसकी जड़ों में घुल गए। जो अंकुर कभी जीवन का प्रतीक था — वही आज मौत का द्वार बन गया।
आदमी ने धरती की नैसर्गिकता छीन ली और उस पर प्लास्टिक का आवरण चढ़ा दिया। अब धरती माँ नहीं रही — एक अजनबी हो गई है।
और उस अजनबीपन की सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है — वो इंसान जो आज भी उस पर भरोसा करके जीता है।
भेड़ें मरीं जहर से — लेकिन जहर किसने बोया? यह सवाल महादेव से नहीं, हम सबसे पूछा जाना चाहिए।
यह खबर नहीं, एक चेतावनी है।
वही धरती जो सदियों से पालती आई, आज वही जान ले रही है। चरवाहा पीढ़ियों से उसी जमीन पर चलता रहा — लेकिन आज उसी जमीन का चारा जहर बन गया।
क्यों?
क्योंकि धरती बदल रही है। रसायन उसकी मिट्टी में उतर गए। कीटनाशक उसकी वनस्पति में घुल गए। जो अंकुर कभी जीवन देता था, आज वही मौत का कारण बन रहा है।
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