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Friday, June 5, 2026

वैश्विक तनाव की तपिश और भारत का खाद संकट(कीमत)

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नई दिल्ली | 29 अप्रैल, 2026

​वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भू-राजनीतिक अस्थिरता ने एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पश्चिम एशिया, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव ने न केवल वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित किया है, बल्कि भारत के कृषि क्षेत्र की जीवनरेखा यानी ‘खाद’ की कीमतों में भी आग लगा दी है।

सब्सिडी का बढ़ता बोझ और राजकोषीय दबाव

​ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत का खाद सब्सिडी बिल इस साल 20% तक बढ़ सकता है। बजट में जहां 1.71 लाख करोड़ रुपये का अनुमान था, वहीं अब इसके 1.86 लाख करोड़ रुपये के पार जाने की संभावना है। यूरिया, DAP और पोटाश की वैश्विक कीमतों में हुई लगभग दोगुनी बढ़ोतरी ने सरकार के खजाने पर भारी दबाव बना दिया है। चूंकि भारत अपनी यूरिया और DAP की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली हर हलचल का सीधा असर दिल्ली के गलियारों में महसूस किया जा रहा है।

अन्नदाता को राहत, पर कब तक?

​राहत की बात यह है कि सरकार ने खाद के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) को स्थिर रखने का निर्णय लिया है। यह कदम देश के करोड़ों किसानों के लिए एक बड़े संबल के समान है, क्योंकि खेती की लागत बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा सकती थी। सरकार इस बढ़ी हुई लागत का भार खुद वहन कर रही है, जो सराहनीय है।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता ही एकमात्र विकल्प

​हालांकि, यह स्थिति एक स्थायी चिंता की ओर भी इशारा करती है। भारत आज भी अपनी LNG जरूरतों का 50% और DAP की 30% आपूर्ति के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर है। शिपिंग रूट्स में व्यवधान होने से न केवल खाद बल्कि आम जनजीवन में महंगाई बढ़ने का खतरा भी मंडरा रहा है।

​”सरकार द्वारा सब्सिडी बढ़ाना एक सामयिक समाधान तो हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए हमें वैकल्पिक उर्वरकों और घरेलू उत्पादन में आत्मनिर्भरता की गति को और तेज करना होगा।”

आने वाला खरीफ सीजन सरकार की प्रबंधन क्षमता की वास्तविक परीक्षा होगा। यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि वैश्विक टेंडरों और बढ़ती लागत के बीच खाद की कमी खेतों तक न पहुंचे, ताकि देश की खाद्य सुरक्षा पर कोई आंच न आए।

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