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Friday, June 5, 2026

युद्ध की आग और महंगाई की मार – दोहरी चुनौती में फंसा आम आदमी

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नई दिल्ली, 21 मार्च, 2026

दुनिया के एक हिस्से में युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं, तो दूसरे हिस्से में आम आदमी महंगाई के बोझ तले कराह रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच गहराते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। इस संघर्ष की सीधी आंच अब भारत की रसोई और परिवहन तक पहुँच गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने घरेलू स्तर पर पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ा दिए हैं, जो आने वाले समय में एक बड़े आर्थिक संकट और उच्च मुद्रास्फीति (Inflation) की आहट दे रहे हैं।

तेल कंपनियों ने प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में ₹2.35 प्रति लीटर तक की वृद्धि की है, जिससे दिल्ली जैसे शहरों में इसकी कीमत ₹112 पार कर गई है। हालांकि, सबसे चौंकाने वाली वृद्धि इंडस्ट्रियल डीजल में हुई है, जिसके दाम में करीब 25 प्रतिशत यानी ₹21.92 प्रति लीटर का भारी इजाफा किया गया है। यह केवल एक संख्या नहीं है; इंडस्ट्रियल डीजल महंगा होने का सीधा अर्थ है कि बिजली उत्पादन, विनिर्माण और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिसका अंतिम बोझ उपभोक्ता की जेब पर ही पड़ेगा।

महंगाई का यह चक्र केवल ईंधन तक सीमित नहीं है।
मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण गैस आपूर्ति बाधित होने से एलपीजी के दाम पहले ही बढ़ चुके हैं।इसी बीच, डिजिटल इकोनॉमी के दौर में आम आदमी की जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी फूड डिलीवरी सेवा ‘जोमैटो’ ने भी अपने प्लेटफॉर्म शुल्क में 19 % की बढ़ोतरी कर दी है। अब प्रति ऑर्डर ₹14.90 का शुल्क उपभोक्ताओं को देना होगा। भले ही यह वृद्धि छोटी लगे, लेकिन रोजाना लाखों ऑर्डर्स के गणित में यह कंपनियों के लिए करोड़ों का मुनाफा और जनता के लिए अतिरिक्त आर्थिक चोट है।

चिंताजनक पहलू यह है कि कच्चा तेल $110 प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पूरी तरह बाधित होती है, तो वर्तमान राहत—जो कि नॉर्मल पेट्रोल और डीजल की स्थिर कीमतों के रूप में दिख रही है—ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी। सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह समय कड़े फैसले लेने का है। एक तरफ वैश्विक कूटनीति की चुनौती है, तो दूसरी तरफ घरेलू बाजार में बढ़ती लागत को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी। फिलहाल, आम आदमी के लिए स्थिति ‘करेला और नीम चढ़ा’ जैसी है, जहाँ युद्ध की तपिश उसे सीधे तौर पर न सही, लेकिन बढ़ते बिलों के रूप में झुलसा रही है।

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